मणिकर्णिका की ओर हिंदुस्तान

ना ऊह ना आह था उसका हाथ तुम्हारे पीठ पर या कंठ पर थपथपाया जा रहा था या टेटूआ दबाया जा रहा था जब शब्द और अर्थ का संबंध तोड़ा जा रहा था कविताओं के मायने बदले जा रहे थे तब तुम कभी कहां थे ? अलगाए जा रहा था जब हिंदुस्तानी गर्भाशय से अंडाणु – शुक्राणु अच्छा बताओ तब तुम हिंदू बने या मुसलमान वो गिनती में कितने थे जिसे देख पा रही थी…

"मणिकर्णिका की ओर हिंदुस्तान"

दयाराम

बेशक तुम जश्न मनाओ, खुशियाँ बाँटो, बागों में , पहाड़ो में, पर तुम्हें पता है, नालियाँ साफ करते -करते , दम घूँट कर, नाली में मर गया, दयाराम। बेशक तुम जश्न मनाओ ,खुशियों बाँटो, बागों में पहाड़ों में, पर तुम्हें पता है, तुम्हारी साल भर पेट भरने के लिये, और अपने लिए दो दाने की जुगत में, ठंड से ठिठुर कर खेत में मर गया – दायराम। मगर उसके मुँह से मिला यूरिया , बयां…

"दयाराम"

सांसो बा हमार उधार

सांसो बा हमार उधार के कुछो बचल बा का खुलल आँखे लूटा गइनी शोर मचल बा का एक साँझ में हम रईस से फकीर हो गइनी कुछ रद्दी रहे बाचल तबो जेब कटल बा का जिन्नगी के किताब के पन्ना उ पलट देहलें लोग ताकता की पनन्वा बीचे फटल बा का उहे साज कहीं दूर से बाज रहल बा शायद जवन गीत रहे उ भइल आज गजल बा का कुछ ठंडा बयार देख बस चलल…

"सांसो बा हमार उधार"

साहित्यिक संस्था ‘भोजपुरी संगम’ की आनलाइन काव्यगोष्ठी संपन्न

  गोरखपुर।  साहित्यिक संस्था ‘भोजपुरी संगम’ से जुड़े रचनाकारों ने आनलाईन काव्यगोष्ठी करके इस सच्चाई को उस समय अंजाम तक पहुंचाया जब समूचा देश कोरोना महामारी से निपटने के लिए सोशल डिस्टेन्स का पालन कर रहा है। कहा जाता है कि मनुष्य की सोच यदि सकारात्मक है तो बड़ी से बड़ी आपदा भी उसके मार्ग का रोड़ा नहीं बन सकती। विकट से विकट परिस्थितियों से किस तरह निपटा जाए उसकी राह बनने में वक्त नहीं…

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सर्व भाषा ट्रस्ट द्वारा चौथी ऑनलाइन कवि गोष्ठी का आयोजन

रविवार की शाम को 6.30 से 7:50 तक सर्व भाषा ट्रस्ट द्वारा चौथी ऑनलाइन कवि गोष्ठी का आयोजन किया गया। यह गोष्ठी केवल भोजपुरी भाषा के लिए समर्पित थी। गोष्ठी की अध्यक्षता सर्व भाषा ट्रस्ट के अध्यक्ष श्री अशोक लव ने किया तथा संचालन ट्रस्ट के समन्वयक केशव मोहन पाण्डेय ने किया। कवि गोष्ठी में देश के विभिन्न अंचलों, अहमदाबाद, दिल्ली, गोरखपुर, कुशीनगर, गाज़ियाबाद, तिनसुकिया (असम), सिवान, वाराणसी के अतिरिक्त सऊदी अरब से साहित्यकारों से…

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‘सर्व भाषा ट्रस्ट’ द्वारा तीसरी ऑनलाइन कवि-गोष्ठी का आयोजन

वैश्विक महामारी कोरोना के कारण लॉकडाउन में भी सकारात्मकता बनाए रखने के उद्देश्य से ‘सर्व भाषा ट्रस्ट’ द्वारा ऑनलाइन कवि-गोष्ठी का आयोजन किया जा रहा है। 11 अप्रैल को शाम 6 : 30 से 7 : 40 तक तीसरी ऑनलाइन कवि-गोष्ठी का आयोजन किया गया। ऑनलाइन कवि-गोष्ठी की अध्यक्षता सर्व भाषा ट्रस्ट के अध्यक्ष श्री अशोक लव ने किया जबकि संचालन केशव मोहन पांडेय ने किया। ऑनलाइन कवि-गोष्ठी की शुरुआत कैथल की कवयित्री मधु गोयल…

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‘भोजपुरी साहित्य में महिला रचनाकारन के भूमिका’ पर परिचर्चा का आयोजन

अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस की पूर्व संध्या पर काशी हिंदू विश्वविद्यालय के ‘भोजपुरी अध्ययन केंद्र’ कला संकाय के राहुल सभागार में केंद्र के समन्वयक प्रो० श्रीप्रकाश शुक्ल जी की अध्यक्षता में भोजपुरी पुस्तक ‘भोजपुरी साहित्य में महिला राचनाकारन के भूमिका’ नामक पुस्तक के लोकार्पण व सह परिचर्चा का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम का आयोजन शोध संवाद समूह व सर्व भाषा ट्रष्ट नई दिल्ली के संयुक्त तत्वावधान में किया गया था। सर्वप्रथम कार्यक्रम का सुभारम्भ प्रेरणास्रोत…

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भव्यता से मनाया गया सर्व भाषा ट्रस्ट का दूसरा वार्षिकोत्सव

भाषा, साहित्य, कला और संस्कृति के संरक्षण-संवर्धन के लिए समर्पित संस्था सर्व भाषा ट्रस्ट का दूसरा वार्षिकोत्सव बड़े ही भव्य तरीके से गांधी शांति प्रतिष्ठान में आयोजित किया गया। वार्षिकोत्सव में देश के विभिन्न अंचलों से लगभग 24 भाषाओं के साहित्यकारों, भाषाविदों, चित्रकारों व अन्य विभूतियों को सम्मानित किया गया। वार्षिकोत्सव में बतौर मुख्य अतिथि महामंडलेश्वर मार्तण्ड पुरी ने अपने वक्तव्य में कहा किसाहित्य संन्यास होता है और साहित्यकार संन्यासी। साहित्यकार राग-दोष से मुक्त समाज…

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हिन्दी में आदिवासी लेखन का परिदृश्य

संस्कृत के काव्यशास्त्रीय प्रतिमानों से होते हुए मुक्त छंद में रच बस चुकी हिन्दी कविता आज भी अपने कला-रूप  को लंेकर सजग है। आज भी दलित लेखकों की प्रभावी कविता को वह जगह नहीं मिली जिसकी वह हकदार है। बिम्ब, प्रतीक, वाग्मिता, छंद-लय की माँग आज भी हिन्दी  कविता में अपेक्षित है। किन्तु हिन्दी के वर्तमान पर विमर्शात्मक विविध स्वरों की दस्तक हो चुकी है। दलित चिंतन को आधार बनाकर लिखने वाले कवियों ने स्वतंत्रता,…

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माँ

थके हारे तन मन को गोदी में लिटा सहला दूँ l माँ ! आ , आज लोरी गाकर तुझे , मैं सुला दूँ l तेरी चिन्ता ,दुख – सुख काँधे का बोझ अपने काँधों पे उठा लूँ आ , तुझे मैं सुला दूँ l सुनती नहीं बिल्कुल भी करती अपने मन की डाँट लगा चुप करा दूँ आ ! तुझे मैं सुला दूँ l तेरे चेहरे की झुर्री को काँपती धुरी को जीवन बिन्दु से…

"माँ"