अम्मा

बहुत पुरानी कहावत है कि पूत कपूत हो सकता है, माता कुमाता नहीं हो सकती। कहते हैं कि माँ का हृदय दुष्टता से दूर होता है। जिस स्त्री का मन दुष्प्रवृति से भर जाए वह माँ हो ही नहीं सकती। माँ तो चिलचिलाती जेठ की दोपहरी में अपने पल्लू से माथे पर छाया कर के स्कूल से आने वाली डगर को एकटक देखती रहती है। माँ तो आम के बगीचे में कैरियाँ बटोरने वालों में अपने जिगर के टूकड़े को पहचानती रहती है। बरसात की सावनी फुहार हो या भादो की सदानिरा दिवा-रात्रि, बिना किसी छाते के ही, अपने बच्चे का छाता बनने को आतुर माँ तो माँ ही होती है। वह कीचड़ भरे राह में खड़े होकर अपने लाल को कीचड़ से बचाने का उपाय सोचते हुए पता नहीं कहाँ खोयी रहती है। माँ अगहन और पूस की ठिठूरन भरी संध्या को अपनी संतान को कभी विद्यालय से तो कभी खेलकर, सखा-मीतों के साथ घूमकर जल्दी आने की राह देखा करती है। – ‘कहाँ गया यह शैतान? कहीं झाड़ियों में तो नहीं छिप गया? हे भगवान, पता नहीं कितने साँप-बिच्छू रहते हैं उस बेहाये में? इतनी ठंड! कहीं काँपता तो नहीं आ रहा है?’ पूत की चिंता में पल-पल माता का हाथ-पाँव फूल जाता है।
सुधीर की आँखें आज छलछला आईं। लबालब आँसू भरे आखों को पोंछता पूजाघर में गया और आज सच्चे मन से ईश्वर को धन्यवाद दिया। फिर आकर अपनी सोई हुई माँ रोहिणी को निहारने लगा। निहारते समय रोहिणी जी कोई देवांगना लग रही थीं। वह देवांगना, जिसके रोम-रोम से ममता और आशीष का सौरभ प्रस्फुटित हो रहा हो। सुधीर किसी प्यासे बावले राही की तरह से निढाल हो गया था, जैसे कई दिन से रेगिस्तान में यात्रा करने के उपरांत कोई समृद्ध सराय मिल गया हो। निहारते-निहारे वह अपने बचपन में चला गया। अब वह सातवीं में पढ़ने वाला सुधीर हो गया था ………..।
…………… सभी दोस्तों से स्कूल से आते हुए रास्ते में ही यह बात पक्की हो गई थी कि घर पहुँचते ही उस पीपल के पास वाले पक्के कुँए के पास जुम जाना हैं। आज कबड़डी के नए दाँव के साथ एक-दूसरे को आजमायेंगे। या तो रोहन की टीम जितेगी या सुधीर की। ….. यहीं हुआ भी। बारामदे में बैग पटककर सब पक्के कुँए के लिए फुर्र हो गए। ……. रोहिणी से सुधीर को स्कूल से आते हुए दूर से ही देख लिया था। उसे तो बस दरवाजे पर पहुँचते ही खाना चाहिए। हाथ-पाँव धोने का भी शउर नहीं रखता है तब। …. बेचारी बेटे को आते देख रसोई में चली गईं। खाना लाईं तो सुधीर नदारद। – ‘बड़ा शरारत करता है यह लड़का। …. कहाँ गया रे? ……. सुधीर! ….. अरे, बाथरूम का दरवाजा तो खुला ही है। …. पतंग पकड़ने छत पर गया होगा। …… यहाँ भी नहीं। …. नीचे कोठरी में कपड़े चेंज कर रहा होगा। ……यहाँ भी ……….।’
बेचैन रोहिणी पुनः छत पर गईं तो देखीं कि पक्के कुँए पर बच्चू कबड्डी जमाये हैं। …. ‘आये आज इसकी अच्छी तरह खबर लेती हूँ। नाक में दम कर दिया है शैतान ने। … अरे, अरे, …. आ…आहा! कैसा जोर लगा के पकड़ लिया पट्ठे ने! …. वो देखो, …. छू कर भी चला आया। ….. शाबाश मेरे शेर। ….. अरे, उसके पैर पर लाल क्या रेंगने लगा? …… सीधे क्यों नहीं चल रहा? …… कहीं चोट तो नहीं लग गई? …. एक ताक शरीर में जान नहीं और ऊपर से ये कबड्डी का खेल। …… हाय रे, न जाने मेरे बच्चे को क्या हो गया?’
छाती पीटती रोहिणी जी नीचे आयीं तो देखती हैं कि सुधीर दरवाजे तक पहुँच चुका है। दाहिने घुटने पर कट गया है। लहू की एक पतली धारा रेंग रही है। वह पसीना से तर-ब-तर है। रोहिणी जी ने न कुछ पूछा, न सोचा, लगातार अनगिनत थप्पड़ गिराने लगीं। सुधीर माँ के इस व्यवहार पर काठ बना रहा। यह देखकर अपनी खैर मनाते हुए राजू, बंटी, सोहन, परा गए। कुछ पल बाद रोहिणी जी स्वयं रोने लगीं। ध्यान मेज पर रखे खाने की ओर गया तो बोल उठीं, – ‘खाकर गया होता तो यह हालत नहीं होती न, …… ताकत बढ़ी होती न!’ – आँचल के कोर से बेटे का चेहरा पोंछते बोलीं, – ‘ हाथ-पैर धो लो। मैं पट्टी बाँध देती हूँ। खाना खा लो। ….. देखो तो, तेरे लिए लाल मोहन मँगवाया है। …. पूड़ी भी गर्म ही है अभी। ये देखो ब्वायल आलू की सूखी सब्जी। दही।…. अच्छा, एक मिनट रूको।’ – झट से रसोई में घूसीं और गरमागरम पकौड़े बना लायीं। पकौड़े तो सुधीर की कमजोरी हैं और उसके लिए माँ द्वारा प्रयोग किया जाने वाला अचूक बाण। टूट पड़ा खाने पर।
उस समय भी पिताजी घर हों या बाहर, ध्यान रोहिणी जी ही रखती थीं। सुधीर जब बीस का हुआ तब लीवर-कैंसर से पिताजी स्वर्ग सिधार गए। बी.ए. करने के बाद सुधीर अब एक पी.सी.ओ. बूथ पर आॅपरेटर का काम करता है। खेती से रोटी का काम चल जाता है और अपनी कमाई से साग-भाजी भी मजे से मिल जाता। सुधीर से वृद्धा रोहिणी जी की सहायता और मन लगाने के लिए अपनी मौसी की बेटी प्रिया को बुला रखा है। पिताजी के जाने के बाद उसकी माँ जैसे दोगुने रफ्तार से वृद्धा हो रही हैं। पिताजी को गुजरे दस वर्ष हो चुका, तब से प्रिया यहीं रहती है। पास के स्कूल में पढ़ने जाती है और रोहिणी जी की सहचरी बनी रहती है। बढ़ते उम्र की तेज रफ्तार और इस अवस्था में जीवन-साथी के साथ छूटने से रोहिणी जी का व्यवहार चिड़चिड़ हो गया है। किसी भी बात को उल्टा समझना, किसी भी बात का उल्टा उŸार देना, बड़बड़ाते रहना आदि अब उनकी असाध्य बीमारियाँ हैं। कई बार तो छोटी-छोटी बात पर माँ-बेटे में ठन जाती है। सुधीर भी तो अब बड़ा हो गया है। वह भी सहन नहीं कर पाता। दोनों दुनिया को अपनी-अपनी नज़र से देखते हैं। एक की नज़र आज की गुजरे समय से तुलना करती है तो दूसरे की नजर आने वाले पल पर है। दोनों की बहस इतनी बढ़ जाती है कि लगता है दोनों में सौतेलेपन का व्यवहार है। दोनों रोज-रोज मरने-जीने की बातें करते रहते हैं। बगल की श्रीवास्तवा आण्टी कई बार रोहिणी जी को समझा चुकी हैं, – ‘आपका अब चलने का वक्त आ गया है, शांत रहा कीजिए। …. जो मिले खाइए, रूचि हो तो ईश्वर आराधना कीजिए, या पड़े रहिए।’
‘क्यों बहन जी? …… वह मेरी औलाद है कि मैं उसकी जनी हूँ? …. मैं सलाह नहीं दूँ, मैं राह नहीं चेताऊँगी, तो क्या मुहल्ले के लोग आयेंगे? ….. देखती नहीं है कि एक शब्द मुँह से निकला नहीं कि जवाब देता है – ‘तुम चुप रहो।’ ….. बड़ा हो गया है न, अब बात क्यों मानेगा? ….सुहाग उजड़ गया, जैसे अछूत हो गई मैं। …. अब तो जानता है कि कितना भी थूकेगा, कहीं और तो जा नहीं सकती मैं। एक वहीं है तो उसी के पास ही रहूँगी न। ….. भगवान उठाता ही नहीं। सुहाग ले लिया, जैसे अमर कर दिया मुझे।’
किसी वृद्धा की दुखीयारी आँखें जल्द बरस पड़ती हैं। उनमें अनुभव और संघर्ष का ठहराव तो होता है, परन्तु धैर्य का बाँध नहीं होता। भावों से भरी आँखें शीघ्रता से जल-पूरित हो जाती हैं। झुर्रियों से घिरी एक माँ की आँखें जब बरसती हैं तो कंठ अवरूद्ध हो जाता है। स्वर मर जाते हैं। वेदना का घाव खुल जाता है। तब सामने वाले पर अधिक प्रभाव पड़ता है। कोख से उपेक्षा अनुभव करती नारी के घाव शीघ्रता से खुलते हैं। पुरुष तो शिव होता है। पीड़ा के विष को कंठ में ही अटका लेता है। ……. श्रीवास्तवा आण्टी माँ के आँसुओं से पराजित होकर मुझे पराजित करने आयीं। मैं पहले ही सोच लिया था कि सौ बोलने वाले को एक शांत-स्वभाव पराजित कर देता है। चुप ही रहूँगा।
उन्होंने मुझे समझाना चाहा, – ‘माँ, माँ होती है। बेचारी रोहिणी बहन ने बहुत दुख भोगा है बेटा। अपने सुहाग का जाना अभी नहीं भूली हैं। पढ़े-लिखे होकर माँ से छोटी-छोटी बातों पर लड़ना ठीक तो नहीं हैं ……..।’
‘कौन भूला है पिताजी की मृत्यु? …. मैं तो जब अम्मा को देखता हूँ, तब वे अधिक याद आते हैं। मैं भी तो रोज देखता हूँ कि किराना का हिसाब नहीं दिलाया, दूध का पैसा देना है, एक बार बहनों के यहाँ चले जाओ, निमंत्रण में ये करो-ये मत करो। …… मुझे पता है आण्टी कि इसी सोच में अम्मा अपना शरीर गलाती जा रही हैं। अब तो उन्हें भगवान-भजन में मन लगाना चाहिए। दुनियादारी का दिन गया उनका। …… अब मैं क्या-क्या बताऊँ कि मैं गृहस्ती की गाड़ी कैसे चलाता हूँ। अब सबसे रोता रहूँ, तभी सब ठीक माना जाएगा क्या? …. आण्टी, रही लड़ने की बात, तो दूसरा कौन है मेरा जिससे सवाल-जवाब करूँ? …. दिनभर काम करने के बाद मैं आराम करना चाहता हूँ। आण्टी मैं ……।’
आज की घटना ने तो हद कर दी। सुधीर किराने का सामान लेकर निकला ही था कि नवीन मिल गया। चाय-वाय में घंटा गुजर गया। मण्डी में नहीं जा पाया। चैराहे पर ही सब्जी खरीदने के लिए रूका। अभी नेनुआ ही तौलवाया था कि पीछे से एक रिक्षा पार होते देखा। जी धक् से रह गया। बरसात की अधियारी रात। शहर में बिजली भी नहीं थी। सब्जी की दुकान से मोमबत्ती की पिलपिलाती रौशनी आ रही थी जिसपर कीटों ने धावा बोल दिया था। पहचानते-पहचानते रिक्शा आगे निकल चुका था। बीच में सफेद साड़ी में एक वृद्धा बैठी थीं। ‘कहीं मेरी माँ तो नहीं?’ इधर एक युवती – ‘कहीं प्रिया तो नहीं। हाँ, प्रिया ही थी। वैसी ही मोटी थी वह लड़की। और उधर? …… उधर के औरत का सिर्फ बाल ही दिखायी दिया। खिचड़ी बाल। श्रीवास्तवा आण्टी जैसा …..।’
सुधीर के चेहरे का रंग उड़ गया। धड़कन की गति तेज हो गई। चेहरे पर पसीना तैरने लगा। ‘अब अम्मा को क्या हो गया? आगे बढ़कर देखूँ क्या?’
सब्जीवाले ने पूछा, -‘और क्या चाहिए?’
‘कुछ नहीं। आज इतना ही।’ – सुधीर बदहवास सा कूदकर साइकिल पर चढ़ा। पैंडिल पाने के लिए पैर घूमाने लगा। बड़ी मुश्किल से पाया। ….. सड़क टूटी हुई थी। बरसात का कीचड़ छितराया हुआ था। ढाले के दोनों पार दो-दो ब्रेकर हैं। सामने से मोड़ है। मोड़ के दोनों तरफ गड्ढा है। रास्ते में कुŸाों का साहसी दल। सुधीर को सबसे अधिक कुत्ते ही डराते हैं। …… आज किसी का ख्याल नहीं रहा। बस पश्चाताप था कि मैं चाय क्यों पीने लगा। कभी तो नहीं पीता हूँ। आज भी मना कर देना चाहिए था। ….. मैं ही नालायक हूँ। अम्मा की छोटी-छोटी बातों पर उन्हें चुप रहने को कहता रहता हूँ। आवाज कड़वी भी होती है। कहीं मेरी बातें ही मन में घाव कर दी होंगी। …… पैसा तो घर था नहीं, कहाँ से आया होगा? …. आण्टी ने दिया होगा। मैं मूरख, ऐसी आपात स्थितियों के लिए भी कुछ बचाकर नहीं रखता हूँ। ….. हे भगवान, यह सिर्फ मेरे बुरे मन का बुरा ख्याल ही निकले! अम्मा ठीक हों। घर में ही हों। हे प्रभु! हे ईश्वर। …. आप सब मेरी अम्मा की रक्षा करना। ….. आज घर पहुँचने में इतना समय क्यों लग रहा है। सड़क लंबी क्यों हो गयी है? रोज तो मैं इतनी दूरी पाँच मिनट में नाप लेता हूँ। जी क्यों थक रहा है? मेरे जैसा मोटा-ताजा युवक….। अरे ओ अमीन भाई। …. रूको पूछता हूँ। अरे, वे तो मुड़ गये। हाँ, घर तो आ गया। …. अरे, दरवाजे पर तो रौषनी ही नहीं है। हे भगवान, सच में रिक्षा पर अम्मा ही थीं क्या? ….. भीतर कौन गुनगुना रहा है? …. बारामदे में सोया कौन है? अरे, ये तो अम्मा ही हैं। ….. ये ईश्वर, तेरा लाख-लाख धन्यवाद।
साइकिल अंदर करते हुए सुधीर ने पूछा, – ‘बाहर अंधेरा क्यों है प्रिया?’
‘केरोसीन नहीं हैं।’ – प्रिया सामान लेकर अंदर चली गयी।
सुधीर अपने शरीर का पसीना भूल गया। उसकी आँखें आज छलछला आईं। लबालब आँसू भरे आखों को पोंछता पूजाघर में गया और आज सच्चे मन से ईश्वर को धन्यवाद दिया। फिर आकर अपनी सोई हुई माँ रोहिणी को निहारने लगा। चिंतित सुधीर सोचने लगा कि कही सच में अम्मा की तबीयत खराब तो नहीं हो गया है और वे सोये-सोये ……। प्रिया रसोई में थी। रोहिणी के पैर को हिलाते हुए बोला, – ‘अम्मा! अम्मा!!’
प्रिया ने भीतर से ही निर्देशित किया, – ‘अभी उनकी नींद कच्ची है। सोने दीजिए।’
‘पागल। कच्ची नींद है कि …….।’ सुधीर पुनः पैर हिलाकर जगाने लगा। – ‘अम्मा! अम्मा!!’
रोहिणी जी उठीं तो बहाना करते पूछा, – ‘खाना तैयार है क्या?’
‘प्रिया से पूछ लो।’ – रोहिणी जी ने करवट बदला।
भयभीत सुधीर का अंग-अंग अब मुस्कुरा रहा था।
……….
– केशव मोहन पाण्डेय

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *