आदमी होने के नाते

मैं बियाबान में भी
लेकर चलता हूँ
अपना परिवार
गाँव अपना
शहर और देश के साथ ही
दुनिया अपनी
आदमी होने के नाते।
और भीड़ में भी
मैं नहीं सिमट पाता
अपने आप में
निरंतर कोशिश करता हूँ
परिवार से जुड़े रहने का
नहीं उजड़ता गाँव
ना ही शहर और देश को जलाता हूँ
किसी और दुनिया के लिए
आदमी होने के नाते।
मेरा आदमी होना उतना ही महत्त्वपूर्ण है
जितना कि रहना इस धरती पर
और कहलाना
जीता-जागता
आदमी।
अगर मैं काम पर जाकर भी
थकने-हारने का बहाना लेकर
नहीं करता कुछ और
किसी और के लिए,
घर में आकर
रोटी ठूस
सो जाता हूँ
फिर सुबह के लिए
तो आदमी इतना ही नहीं होता,
इतना होना
मशीन या जानवर की पहचान है।
आदमी होने के नाते
मुझे और भी कुछ करते रहना है
यथा-संभव
दूसरे की पीड़ा हरते रहना है
और हर हाल में
बना रहना है गतिशील भी
सोने के पहले तक
आदमी होने के नाते।

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केशव मोहन पाण्डेय

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