कई बार

कई बार
बिना वजह रोने का मन करता है
अपने आप से ही
खोने का मन करता है
मन करता है
उदास चेहरों पर हँसी खिलाने का
बिछड़े जोड़ों को
अंतर तक मिलाने का
मन तो करता है
उड़ता जाऊँ आकाश में
जब भी मन उदास होता
कई बार
आना चाहूँ माँ
तेरे ही पास में।
कई बार
एकाएक मुस्कुरा उठता हूँ
अपनी बेवकूफी से
जब मैं रूठता हूँ
तुम जैसा
कोई नहीं हक़ जताने आता
माँ तुम जैसा
कोई नहीं बार-बार मानाने आता।
—–
– केशव मोहन पाण्डेय

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