कृषि-कार्यों से प्रेरित है नागपंचमी

    जब भी कोई पर्व-त्योहार, पूजा-पाठ का अवसर आता है तो मुझे बचपन की यादें आने लगती हैं। सावन में माँ की याद आते ही बिल्व-पत्र पर चंदन के लेप से राम-राम लिखकर शिव जी की पूजा करना, सावनी सोमवार का व्रत और फिर श्रावणी शुक्लपक्ष की पंचमी को नामपंचमी। नागपंचमी का कुछ अलग ही उत्साह होता था तब। सुबह ही गाय के गोबर और पीले सरसों से घर के चारों ओर घेरा बनाया जाता था और फिर दरवाजे पर नाग की प्रतिकृति बनाई जाती थी। कटहल के पत्तों का दोना बनाकर उसमें धान और लावा (भूना धान) और दूध चढ़ाकर नाग देवता की पूजा की जाती थी। उस पूजा में अक्षत और सफेद फूल का विशेष ध्यान रखा जाता था। तब भी और आज भी भारतीय संस्कृति के प्रति अनायास ही सिर नत हो जाता है।
    भारत की संस्कृति बड़ी अल्हड और बहुरंगी है। हमारी संस्कृति ने कदम-कदम पर पशु-पक्षी, वृक्ष-वनस्पति, पर्वत-नदी, सूर्य-चन्द्रमा, सबके साथ आत्मीय व मानवीय अस्तित्व का संबंध जोड़ने का प्रयत्न किया है। हमारे यहाँ पेड़ों की पूजा होती हैं। नदियों की पूजा होती है। इतना ही नहीं, हमारे यहाँ गाय की पूजा होती है। वृषभोत्सव के दिन बैल का पूजन किया जाता है। वट-सावित्री जैसे व्रत में बरगद की पूजा होती है। आँवला एकादशी के दिन आँवले की पूजा होती है, परन्तु जब हम नाग पंचमी जैसे दिन नाग का पूजन करते हैं, तब तो हमारी संस्कृति की विशिष्टता पराकाष्टा पर पहुँच जाती है। विषधर की पूजा भारतीय संस्कृति की पराकाष्ठा ही है। सोचिए ना, नाग हमारे किस उपयोग में आता है, उल्टे यदि काटे तो राम नाम सत्य है। परंतु, नाग को देव के रूप में स्वीकार करने में आर्यों के हृदय की विशालता का हमें दर्शन होता है। ‘कृण्वन्तो विश्वमार्यम्’ के साथ आगे बढ़ते हुए आर्यों को भिन्न-भिन्न उपासना करते हुए अनेक समूहों के संपर्क में आना पड़ा होगा। वेदों के प्रभावी विचार उनके पास पहुँचाने के लिए आर्यों को अत्यधिक परिश्रम करना पड़ा होगा।
    श्रावण शुक्ल पंचमी के दिन ‘नागपंचमी का पर्व’ परंपरागत श्रद्धा एवं विश्वास के साथ मनाया जाता है। इस दिन नागों का पूजन किया जाता है। इस दिन नाग दर्शन का विशेष महŸव है। इस दिन साँप मारना मना है। पूरे श्रावण माह विशेष कर नागपंचमी को धरती खोदना निषिद्ध है। यह तो सभी जानते हैं की भारत एक कृषि-प्रधान देश है। यहाँ आज भी 80 प्रतिशत लोग कृषि से जुड़े है। साँप को क्षेत्र-पाल कहा जाता है। साँप खेतों का रक्षण करता है। जीव-जंतु, चूहे आदि जो फसल को नुकसान करने वाले तत्त्वों हैं, उनका नाश करके साँप हमारे खेतों को हराभरा रखता है। नागपंचमी के दिन पूजा में दूध-लावा चढ़ाना कृषि-प्रधान पूजा का ही तो संकेत है। निसंदेह नागपंचमी की पूजा कृषि कार्यों से प्रेरित है। साँप हमें कई मूक संदेश भी देता है। साँप के गुण देखने की हमारे पास गुणग्राही और शुभग्राही दृष्टि होनी चाहिए। भगवान दत्तात्रय की ऐसी शुभ दृष्टि थी, इसलिए ही उन्हें प्रत्येक वस्तु से कुछ न कुछ सीख मिली। साँप को चक्षुश्रवा भी कहते हैं। माना जाता है कि वह अपनी आँखों से ही देखकर हमारी आवाज सु लेता है।
यह भी सत्य है कि साँप सामान्य तौर पर किसी को अकारण नहीं काटता। उसे परेशान करने वाले को या छेड़ने वालों को ही वह डंसता है।  साँप को सुगंध बहुत ही भाती है। चंपा के पौधे को लिपटकर वह रहता है या तो चंदन के वृक्ष पर वह निवास करता है। केवड़े के वन में भी वह फिरता रहता है। भारत की धरती पर सुगन्धित पौधे अकसर मिल जाते हैं और वहाँ साँप भी मिल जाता है। इसलिए भारतीय संस्कृति को वह प्रिय है। प्रत्येक मानव को जीवन में सद्गुणों की सुगंध आती है, सुविचारों की सुवास आती है, वह सुवास हमें प्रिय होनी चाहिए।
देव-दानवों द्वारा किए गए समुद्र मंथन में साधन रूप बनकर वासुकी नाग ने दुर्जनों के लिए भी प्रभु कार्य में निमित्त बनने का मार्ग खुला कर दिया है। दुर्जन मानव भी यदि सच्चे मार्ग पर आए तो वह सांस्कृतिक कार्य में अपना बहुत बड़ा योग दे सकता है और दुर्बलता सतत खटकती रहने पर ऐसे मानव को अपने किए हुए सत्कार्य के लिए ज्यादा घमंड भी निर्माण नहीं होगा। दुर्जन भी यदि भगवद् कार्य में जुड़ जाए तो प्रभु भी उसको स्वीकार करते हैं, इस बात का समर्थन शिव ने साँप को अपने गले में रखकर और विष्णु ने शेष-शयन करके किया है।
समग्र सृष्टि के हित के लिए बरसते बरसात के कारण निर्वासित हुआ साँप जब हमारे घर में अतिथि बनकर आता है। तब उसे आश्रय देकर कृतज्ञता से उसका पूजन करना हमारा कर्तव्य हो जाता है। इस तरह नाग पंचमी का उत्सव श्रावण महीने में ही रखकर हमारे ऋषियों ने बहुत ही औचित्य दिखाया है। नागपंचमी के दिन सफेद कमल पूजा में रखा जाता है। इस दिन नागदेव के दर्शन अवश्य करना चाहिए। नागदेव के निवास स्थान की पूजा करना चाहिए। नागदेव पर लावा और दूध चढ़ाना चाहिए। नागदेव की सुगंधित पुष्प व चंदन से ही पूजा करनी चाहिए क्योंकि नागदेव को सुगंध प्रिय है। और ‘ओम् कुरुकुल्ये हुं फट् स्वाहा’ का जाप करने से सर्प दोष दूर होता है।
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– केशव मोहन पाण्डेय

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