कैसे-कैसे लोग हैं

कैसे-कैसे लोग हैं, कैसी उनकी बात।
सौंपे कोई सब यहाँ, कोई करता घात।।1

सारी दुनिया ढूँढती, खुशियों का अम्बार।
सारी दुनिया भूलती, अपना ही घर-बार।।2

फैला सारे जगत में, छल-छद्म-व्यभिचार।
लगता सारे जगत में, संजीवन सा प्यार।।3

संबंधों के दीप में, हो यह दिव्य प्रकाश।
अँधियारा छल का मिटे, विकसित हो विश्वास।।4

संबंधों की भीड़ से, अच्छे हैं दो-चार।
वैसे तो सारा जगत, है अपना परिवार।।5

———

– केशव मोहन पाण्डेय

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