गुरदयाल सिंह का साहित्य जीवन-संघर्ष का उपन्यास

                                        
पंजाबी साहित्यकार गुरदयाल सिंह से मेरा परिचय बहुत पुराना नहीं है। जब मैं हिंदी शिक्षण करने लगा तब उनकी संस्मरणात्मक कथा ‘सपनों के से दिन’ के माध्यम से उनके साहित्यकार रूप से मिला। मिला तो वे अपने लगने लगे। अपने लगे तो कभी लगा ही नहीं कि वे पंजाबी लेखक हैं। अपनी इस बात की पुष्टि मैं ‘सपनों के से दिन’ के आधार पर ही करता हूँ। उस लेख में ही स्पष्ट पता चल जाता है कि कोई भी भाषा आपसी व्यवहार में बाधा नहीं बनती। लेखक अपने संस्मरण में बताते हैं कि उनके बचपन के आधे से अधिक साथी हरियाणा, राजस्थान आदि के थे। सब अलग-अलग भाषा बोलते थे, परन्तु खेलते समय सब की भाषा सब समझ लेते थे। मुझे भी उनकी भाषा समझ आने लगी थी। जिन पंजाबी शब्दों का अर्थ समझ में नहीं आता था, उन्हें अपने पंजाबी छात्रों से बेहिचक पूछ लेता था। इस प्रकार धीरे-धीरे गुरदयाल सिंह की लेखनी से मेरा मन मिल गया। मन मिला तो अपने से लगे। वे ठेंठ पंजाबी होकर भी हिंदी के लगते रहे हैं। उनके साहित्य से मेरा लगाव यह था कि उनकी भाषा में सहजता के साथ-साथ पारदर्शिता थी।
सपनों के से दिन’ की पृष्ठभूमि दुनिया के हर बच्चे को जोड़ती है। उसमें लेखक ने अपने उस हर छोटे-बड़े क्रियाकलापों को व्यक्त किया है जिन्हें हम हमेशा नज़रअंदाज कर देते हैं। उन्होंने अपने उस संस्मरण को बहुत ही साधारण और सरल भाषा में असाधारण शैली में प्रस्तुत किया है। ‘सपनों के से दिन’ के माध्यम से लेखक अपनी बात कहने में पूर्णतः सफल रहा है। मैं इससे गुरदयाल सिंह को लेखक से कम गुरु अधिक मानता हूँ। वे उस भारतीय मान्यता को स्थापित करने में सफल रहे हैं जहाँ ‘गुरु गोविंद’ में ‘गुरु’ को प्रथम स्थान दिया जाता है। विद्यालय वह स्थान है जहाँ विद्यार्थी आकार और रुप पाता है। उसके उज्ज्वल भविष्य की नींव पड़ती है। उन्होंने उस जीवन के हर पक्ष की चर्चा करके सबको आइना दिखाने का काम किया है।
गुरदयाल सिंह मूलतः एक पंजाबी साहित्यकार थे। उनके उपन्यास और उनकी कहानियाँ खासा लोकप्रिय हैं। उन्हें 1999 में ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। उनकी पहली कहानी ‘भागों वाले’ साहित्य मैगजीन ‘पंज दरिया’ में प्रकाशित हुई थी। उनके लेखन से पंजाबी औपन्यासिक साहित्य में बुनियादी परिवर्तन दिखायी देता है। उनके उपन्यास ‘मढ़ी दा दीवा’, ‘अंधे घोड़े का दान’ अनेक भाषाओं में में अनुवाद हो चुका है। इन कहानियों पर फिल्मों का भी निर्माण हो चुका है। वास्तविकता तो यह है कि गुरदयाल सिंह आम आदमी की बात कहने वाले पंजाबी भाषा के विख्यात कथाकार थे। वे ‘सपनों के से दिन’ में ही लिखते हैं कि ‘वे परिवार के पहले लड़के थे जो स्कूल जाने लगे थे।’ वे लिखते हैं कि ‘स्कूल मेरे लिए ऐेसा जेलखाना था जिसके बारे में यही सोचता कि यहाँ से कभी रिहाई मिल जायेगी।’
‘सपनों के से दिन’ को पढ़ने-पढ़ाने के सफर में मैं व्यक्तिगत रूप से स्वयं को उनके करीब पाता गया। उनके बारे में पढ़ता गया। उनकी जीवटता से परिचित होता गया। उनके ठानने को मानने लगा। तब पता चला कि परिवार की प्रतिकूल परिस्थिति के कारण उन्हें स्कूल छोड़कर अपने पारिवारिक कार्य बढ़ई के धंधे में वह अपने पिता की मदद करना पड़ा। दिन-रात मेहनत-मजदूरी करने के कारण समय ने उन्हें बचपन में ही बड़ा बना दिया। अपने एक लेख में सूरज प्रकाश जी लिखते हें कि ‘बचपन में बारह-बारह घंटे बढ़ई काम काम किया। मजदूरी की। घर वालों से पढ़ाई के सवाल को लेकर अनबन हुई तो एक ही छत के नीचे पिता और ताऊ से अलग रह कर काम किया। दिन रात लगकर ठेके पर पानी की टंकिया बनायीं। कई बार बेरोजगार रहे। गलियों में आवाजें दे कर अपना बनाया सामान बेचा। टीबी के मरीज हुए तो कसौली गये। बाद में वहाँ भी दो-ढाई रुपये की दिहाड़ी मजदूरी करते रहे। सोलह-सत्रह बरस की उम्र में एक बच्ची के पिता बन गये थे। तब भी कम पढ़े लिखे बेरोजगार थे।’
श्री गुरदयाल सिंह का जन्म 10 जनवरी 1933 में हुआ। उनके तीन भाई और एक बहन थी। आर्थिक, पारिवारिक, मानसिक और वैचारिक संघर्षों में बचपन गुजारते हुए उन्होंने कड़ी मेहनत करके उच्च विद्या हासिल करके विश्वविद्यालय में प्राध्यापक हुए। उनका बलवंत कौर के साथ विवाह हुआ और एक बेटी और एक बेटा से उनका घर गुलजार हुआ। पद्मश्री और ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित गुरदयाल सिंह वैसे तो 16 अगस्त 2016 को इस संसार से विदा हो गए मगर निश्चय ही चिरंतन काल तक उनका अक्षर-ब्रह्म उनकी उपस्थिति का दर्ज कराता रहेगा। गुरदयाल सिंह के शुरुआती जीवन को देखें तो वे तब केवल शारीरिक मेहनत मजदूरी करने वाले कारीगर ही बन कर रह गये थे। लेकिन उनका जीवन लगातार संघर्ष, धीरज, कठोर मेहनत और जीवन के प्रति आस्था का रहा है। वे कई बार टूटे मगर अपनी जीजिविषा के कारण बार-बार टूटकर भी जुटते रहे। उन्हें पद्मश्री और ज्ञानपीठ के अतिरिक्त 1975 में साहित्य अकादमी पुरस्कार, 1989 में पंजाब साहित्य अकादमी पुरस्कार, 1986 में सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार तथा 1992 में शिरोमणि साहित्यकार पुरस्कार भी प्राप्त हुए हैं।
गुरदयाल सिंह का पहला उपन्यास ‘मढ़ी दा दीवा’ 1966 में प्रकाशित हुआ। उस उपन्यास में लेखक ने एक दलित और एक विवाहित जाट महिला के मौन प्रेम को बड़ी ही नाटकीयता के साथ प्रस्तुत किया है। कथाकार के रूप में उनका शिल्प इतना समर्थ है कि ‘परसा’ में उन्होंने अपने नायक के जीवन के अप्रत्याशित उतार-चढ़ावों का विस्तृत और सफलतापूर्णक निरूपण किया है। वे अपने आसपास के यथार्थ को प्रमाणिकता और विलक्षण कलात्मकता के साथ प्रस्तुत करने में सिद्धहस्त थे। पंजाबी उपन्यास के बेताज बादशाह गुरदयाल सिंह का कथा-प्रस्तुति से बहुत ही नजदीकी नाता रहा। ‘अंधे घोड़े का दान’ साधारण होते हुए भी एक असाधारण उपन्यास है। उपन्यास में सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक एकाकार रूप खुद-ब-खुद परत-दर-परत खुलते चले जाते हैं। अगर कहा जाए कि यह उपन्यास ‘व्यक्ति’ से ‘समष्टि’ तक के संबंध की व्याख्या है तो मिथ्या नहीं है। इसकी कथा गाँव से संबंधित है। गाँव, जहाँ जीवन का दूसरा नाम संघर्ष ही है और जीवन का आधार भी संघर्ष है।
गुरदयाल सिंह को मिट्टी से जुड़ा साहित्यकार कहा जाता है। ग्रामीण मिट्टी, ग्रामीण गंध और ग्रामीण परिवेश का अपना ही आकर्षण होता है। अपनी मिट्टी, अपने लोग और अपनेपन के ताने-बाने के बीच पसरे उनके सुख-दुख, भय-साहस, हार-जीत, प्रेम और घृणा के अनुभवों को कहानी और नीतिबोध बनाने का काम तो शब्द साधना करनेवाले रचनाकार ही करते आये हैं। गुरदयाल सिंह वैसे ही रचनाकार थे। जन-जीवन उनकी रचनाओं की आत्मा है। उनकी रचनाओं में इतिहास का दर्प, वर्तमान का प्रतिबिंब और भविष्य की आहटें पढ़ता-सुनता है और इसी कारण ऐसी रचनाओं और उनके रचनाकार को दिल में बसा लेता है। वे ऐसे रचनाकार थे जो एक दलित और उसके प्रेम को नायक का गुण बनाकर ‘मढ़ी दा दीवा’ का ताना-बाना बनाते हुए एक पिता की तीन संतानों के तीन राह पर जाने की गाथा सुनाता है। उसी गाथा के बहाने आजाद हिंदुस्तान की मनोभूमि की टोह लेनेवाली कृति ‘परसा’ को पृष्ठभमि देता है। उनकी सभी रचनाओं की आत्मा पंजाबी जनजीवन की जीवन-शैली की ऐसी सच्चाई है जो अमूमन समाज-विज्ञान के औजारों से पकड़ में नहीं आ पातीं।
गुरदयाल सिंह भारतीय साहित्य की यथार्थवादी परंपरा के साहित्यकार रहे हैं। वे उस परंपरा को जीते हुए पूरी दुनिया में पंजाबी उपन्यास और कथा साहित्य को एक अलग पहचान दिलाए। वीणा भाटिया अपने एक लेख में कहती हैं कि ‘विश्व साहित्य में इन्हें प्रेमचंद, गोर्की और लू शुन के समकक्ष माना जाता है। …………. यह अलग बात है कि ज्ञानपीठ पुरस्कार उन्हें निर्मल वर्मा के साथ साझे में मिला, पर साहित्य में उनका जो योगदान है, उसके आगे बड़े-से-बड़े पुरस्कार का कोई महत्त्व नहीं रह जाता है।’ बात भी सही है। वैसे तो पंजाबी में यथार्थ के कालीन पर अपनी साहित्य को सजाने वाले एक से बढ़कर एक रचनाकार हुए, मगर गुरदयाल सिंह का स्थान कुछ अलग रहा है। आप उनके जीवन और उनके साहित्य का कोई भी छोर पकड़िये, आपको कहीं भी कोई बनावट नहीं दिखायी देगा। वास्तविकता की स्निग्ध धारा से आपके हाथ तर हो जायेंगे। इसी तरावट के कारण उनके जीवन और लेखन में पूरा साम्य रहा है। उन्होंने अपनी लेखनी सेे पंजाब के ग्रामीण जीवन के यथार्थ को सामने लाने का काम किया है। यह भी कहा जाता है कि गुरदयाल सिंह का लेखन समकालीन इतिहास का जीवंत दस्तावेज है। समकालीन ग्रामीण जीवन का इतिहास उनके लेखन को अलग करके नहीं लिखा जा सकता। उनको जानने के बेशक कहा जा सकता है कि गुरदयाल सिंह का जीवन संघर्ष भी एक बृहद उपन्यास है।
अपने जीवन के प्रारंभिक वय में भले ही गुरदयाल सिंह जीने के लिए हर स्तर पर संघर्ष करते रहे, मगर आज जब उनकी लेखनी थम गई है, उनका पार्थिव स्वरूप समाप्त हो गया है, तब भी मैं जब भी अपने छात्रों को ‘सपने के से दिन’ पढ़ाता हूँ तो उनका पूरा जीवन एक चलचित्र की भाँति सामने उभर आता है। उभर आता है तो मन में यह विश्वास होता है कि भले ही इस लेखक से जुड़ी सारी स्मृतियों पर नया रंग चढ़ा दिया जाय, मगर पाठकों पर चढ़ा इनका रंग कभी उतरने वाला नहीं। आज भी पाठकों को उनका जाना कचोटता है। कचोटने के कई कारण हैं। यह भी कि मिट्टी से जुड़े एक वृक्ष का उखड़ना। यह भी कि वृक्ष को अपने लिए मिट्टी तैयार करना। यह भी कि मिट्टी को केवल और केवल अवनी जीवटता की खाद से तैयार करना। यह भी कि उसके बाद साहित्य उपन्यास, कहानी, नाटक आदि का एक रोचक और आकर्षक बाग तैयार करना। मैं भाषिक अज्ञानता के कारण भले ही उनके बाग में नहीं विचरण कर पाता, मगर उनके बाग के विषय में जानने का प्रयास करता रहता हूँ। पढ़ता रहता हूँ और उनके साहित्य में एकाकार होता रहता हूँ। यह लेख भी तो उसी का परिणाम है।
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                                                -केशव मोहन पाण्डेय

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