घर के भीतर घर

कामकाजी पुरुष घर का हाल रिटायर्ड होने पर ही समझ्ा पाता है। यशोधन बाबू भी वैसे ही जीव थे। जब उनका सानिध्य मिला तब मेरी धारणा और दृढ़ हो गई।

यशोधन बाबू के अनुज सुयोधन इसी महानगर के दफ्तर में सचिव हैं। अच्छी कमाई है। नीचे की भी, ऊपर की भी। संयोग इतना अच्छा कि झ्ाूठ बोलने की समस्या ही नहीं आती। बड़े-बड़े लोग भी शीघ्रता से अपना काम कराने के लिए बड़ी याचना और दीनता पूर्वक लक्ष्मी को सेवा में प्रस्तुत करके स्वयं को कृतार्थ करते थे। उनका घर लक्ष्मी का भण्डार रहा है, वस्तुतः वे वहाँ आदर पाती हैं। आवश्यकता पड़ने पर प्राण न्योछावर करके भी लक्ष्मी की रक्षा का संस्कार है यहाँ।

देश के स्वतंत्र होने के कुछ वर्ष बाद ही परिवार-नियोजन की चर्चा आरम्भ हो गई थी। यशोधन बाबू शिक्षित होने के साथ ही शीलवान और इस गायत्रीपुरम् के आदर्ष पुरुष भी थे। अतः चाह कर भी आदर्श रक्षा के लिए न केवल संयुक्त परिवार ही बनाए रहे, बल्कि ‘हम दो हमारे दो’ पर भी अमल किए। उनका बेटा धीरेन्द्र, पढ़ लिख कर सड़क छाप। एकदम बाप की कमाई पर गुलछर्रे उड़ाने की प्रथा वाला। चेहरा बे्रड पर मक्खन के समान है, जिस पर अभी-अभी तेज की गई कैंची जैसी जुबान की अहम भूमिका है। बेटी प्रज्ञा भी सुन्दरता की सभी कोणों पर आकर्षक व्यक्तित्व की धनी। धीरेन्द्र और प्रज्ञा भाई-बहन से अधिक मित्रता के रिश्ते को जीते हैं। यशोधन बाबू की पत्नी तो काली अक्षर को भैंस की हीं संज्ञा देती हैं, परन्तु जब भी अपनी संतानों के परस्पर प्रेम को देखती हैं तो दोनों हथेलियों में आँचल को समेट कर आयास ही भगवान को धन्यवाद देने के लिए ऊपर उठा लेती हैं।

सुयोधन और धीरेन्द्र में उम्र का लम्बा अंतराल नहीं है। अतः सुयोधन की शादी के चार वर्ष पश्चात् ही धीरेंद्र की भी बहुरानी आ गई। रुचिका अपने पति सुयोधन की मोटी कमाई पर जहाँ प्रसन्न थी, वहीं धीरेंद्र की पत्नी निहारिका अपने अकर्मण्य पति पर दुखी। उसे यशोधन बाबू पर खिन्नता होती जो राज्य सरकार में सचिव रहकर भी अपने बेटे को नौकरी न दिलवा सके। छोटे बड़े कई नेताओं के संपर्क में रहने के बाद भी बेटा बेरोजगार रह गया। भले वे स्वयं को सीधा हो, मगर वह सीधापन नहीं, उल्लूपन है। न कोई गाड़ी, न बंगला, न बैंक बैलेंस।  . . . यह कौन-सा सीधापन है जी? मोक्षदायिनी गंगा सीधी नहीं बह पाती तो मानव क्यों यह भ्रम पाल लेता है?

आज आदर्श स्थापना की इच्छा मूर्खता नहीं तो और क्या है? . . राम, कृष्ण, गांधी, गौतम . . . ये दो-चार लोग आदर्श स्थापना के लिए ही तो जन्म लिए थे। फिर आज का मनुष्य क्यों व्यग्र हो? आज तो मानव का उद्देश्य जीवन का भेग होना चाहिए। यशोधन बाबू इस विचार से पूर्णतः सरल मना थे। सुयोधन आधुनिक मानवीय गुण संपन्न पुरुष। दफ्तर में खुब जमी थी। मानो लक्ष्मी अब सिर्फ इन्हें ही पहचानती हैं। दाये-बायें की जेब भर जाने के बाद सुयोधन जी बेग की सेवा लेने में भी कुजूसी नहीं करते थे। लेकिन दफ्तर में खिड़की से चलने वाले सुयोधन जी घर में प्रवेश करते ही सीधी सड़क के बटोही हो जाते थे। भाई लंबी पहुँच वाले हैं, सीधापन से प्रसन्न होकर कोई ऊँची कुर्सी दिलवा दें, की तमन्ना में वे भाई के समक्ष एकदम सीधा बने रहते थे। रुचिका की प्रतिक्रिया सुयोधन पर प्रभावहीन थी।

बेटी प्रज्ञा को छोड़कर सबका घर बस गया था। रिटायर्ड होकर घर आने पर यशोधन बाबू पर जब अपने कुनबे की शृंगार-कला देखते तब अपने द्वारा किए गए परवरिश पर गर्व होता।

पुराने घर में विज्ञापनी परिवार को जब दिक्कत होने लगी, तब ऊपर दो कमरा बनवाया गया। एक को स्टोर नाम दिया गया और दूसरा पुत्र धीरेंद्र को प्रस्तुत किया गया। सामान्य से परिवर्तन के बाद नीचे के कमरों में से एक ड्राइंग और एक गेस्ट रूम के विशेषण से सुशोभित किए गए। भोजनालय के सामने का सबसे बड़ा कमरा यशोधन बाबू की सेवा में पेश किया गया। सुयोधन और प्रज्ञा को भी एक-एक कमरे दिए गए। पास-पड़ोस और परिचित लोग यशोधन बाबू के इस परिवार संचालन पर न जाने कैसी-कैसी टिप्पणियाँ करते हैं। सच्चाई तो यह है कि यशोधन बाबू कुछ करते नहीं, सब हो जाता था। यह सब तो उनके पद, प्रतिष्ठा और पैसे का कमाल था।

आज जब यशोधन बाबू रिटायर्ड होकर आए, तब तक उनके चार-पाँच दाँत स्वाहा हो चुके थे। शारदा जी को अपने एक तिहाई गुजर चुके दाँतों का अधिक क्षोभ था, क्योंकि कड़वे पथ्य का उन्हें अधिक अनुभव था। रुचि के अनुकूल ईश्वर ने आवाज भी कड़वी दे रखी थी। यशोधन बाबू से वे कभी-कभी तीव्रतर स्वर में अपनी पीड़ा व्यक्त करते हुए प्रस्तर-दंत की व्यवस्था की सिफारिश किया करतीं। यशोधन बाबू का पक्ष मजबूत होने पर भी पत्नी की अदालत में उन्हें परास्त ही होना पड़ता। घर के अन्य सदस्य गवाही देने के बदले मूक-बधिर दर्शक बने रहते। शारदा जी गुस्से का प्रहार करती, वे प्रतिष्ठा-रक्षार्थ नेह का फूहार छोड़ते।

एक बार तो उपालंभ की इन्हीं बातों ने इस प्रकार अपनी औकात दिखाया कि तब से एक ही कमरे में दो बिस्तर लगाए जाते हैं। आज भी उस क्रिया में एकरूपता बनी हुई है। एकरूपता के साथ-साथ अब तो प्रतिदिन कुछ-न-कुछ चमत्कार होता रहता है। यशोधन बाबू मौन रहते हैं। उन्हें चमत्कार से विस्मय भी नहीं होता। अब प्रतिदिन उनकी जेब या अलमारी से पैसों का अपहरण हो जाया करता है या गड्डियाँ बलात्कार की शिकार हो जाया करती हैं। सहनशीलता की बाँध टूटने पर शोर होता हे। अत्याधुनिक मंत्रोचार भी। बीच-बचाव करने वालों की खैर नहीं। शारदा जी की सबसे बड़ी शत्रु प्रज्ञा है। एक तीब्र स्वर सुनी नहीं कि कमरे में टपक पड़ती है, – ‘माँ, धीरे बोलो ना!’

पढ़ लिखकर भी एकदम गँवारू है प्रज्ञा! शारदा जी की आवाज तो अच्छी लगती नहीं, आधुनिक संगीत कया खाक सुनेगी? बहू तो आती नहीं। पति-पत्नी की बात में कूदना वह तो मूर्खता ही समझती है। वह जानती है कि परिवार में रहकर भी एक दंपति का एक पृथक जीवन होता है। ऊपर से झाँक कर देखने का प्रयास मात्र करती है। सास की चढ़ी त्योंरियों में उसे भाखड़ा-नांगल नजर आता है। शारदा जी के नेत्र से जब विक्टोरिया प्रपात फूट पड़ता है तब धीरेंद्र निहारिका के कान में धीरे से बुदबुदाता, – ‘नारी सुभाव ढारहि आँसू।’

अश्रुधार के साथ जब शारदा जी का स्वर भी करुण हो जाता तब बेचारा धीरेंद्र अपनी अयोग्य समीक्षा पर ग्लानि करने लगता। वह तुरंत माँ के पास जाना चाहता है कि निहारिका की घूरती आँखें उसके पैरों में बेड़ी डाल देती हैं।

संवादहीनता ने इस प्रकार दूरी बढ़ाई कि धीरेंद्र और निहारिका अपने कमरे तक ही सिमट कर रह गए। धीरेंद्र कभी हिम्मत करके डांट कर भेजता, तब निहारिका रसोई में जाती। वहाँ खाना पका रही रुचिका चाची से बड़े नेह भरे स्वर में कहती, – ‘किसके लिए खाना निकालना है चाची जी?’

चाची रुचिका अपनी तपती आँखों से पहले निहारिका को देखती, फिर पलटते हुए कमरे के दरवाजे पर भोजन की प्रतीक्षा में खड़े, दफ्तर जाने को तैयार सुयोधन को देखती। तब आँखों से ही गाली बकती रुचिका मधुर व्यंग्य में कहती, – ‘अपने लिए निकाल लो बेटी। तुम्हें भूख लगी होगी!’

यह रुचिका के मन का भड़ास भी होता और सुयोधन के सीधेपन के अभिनय पर एक तमाचा भी। इधर चाची के स्नेह का गुणगान करती निहारिका तैयार थाली लेकर अपने कमरे में चली जाती।

एक दिन निहारिका की यहीं अटखेलियाँ गजब कर गईं। अनुनय-विनय की भाषा न समझने वाली निकाहरिका को जलधि-जड़ समझकर धीरेंद्र ने थप्पड़ की भाषा समझाना चाहा। तब से दोनों में वार्तालाप खत्म हो गया। अब विचित्र स्थिति होती है। कमरा-बिस्तर एक होने के बाद भी दोनों एक नहीं होते।

सवनी फुहार का मस्ती भरा मौसम था। आकाश रसीला था। हवा शरीर को छू कर एक ठंडी सनक पैदा कर रही थी। सड़कों पर किचड़ों की महामारी का बिखराव था। प्रज्ञा ऊपर स्टोर में थोड़ी जगह खाली करके लटकती कड़ियों के सहारे झूला डाल रखी थी। दिन भर झूलती रहती। झूले पर भी, विचारों में भी।

रस्सी से लटकता हुआ वह झूला अब सौहार्द्र बढ़ाने का यंत्र हो गया था। शारदा जी, रुचिका ओर निहारिका भी आने लगे थे। स्त्री मन किल्लोल कर रहा था। धीरेंद्र कमरे के दरवाजे पर खड़ा बातें सुन रहा था। बड़ा फूहड़ है वह! क्योंकि स्त्रियों की बातें सुनने से अधिक फूहड़पन और क्या हो सकता है? प्रज्ञा झूले पर बैठी थी। निहारिका धक्का दे रही थी। अपनी भाभी को छेड़ते हुए प्रज्ञा ने कहा, – ‘भाभी, इस बार रक्षाबंधन में मुझे क्या मिलेगा?’

‘मैं क्या जानू, अपने भैया से पूछना।’

‘मैं तो जेवर लूँगी। आपकी पाजेब जैसी पाजेब।’

प्रज्ञा की स्नेहिल बातों ने निहारिका के हृदय पर घातक चोट किया। उसका टेंप्रेचर बढ़ा। गति भी बढ़ी। वह झाट से उठी और अपनी पाजेब प्रज्ञा के आगे फेंकते हुए बोली, – ‘लो! आँख लगी है न तेरी!’

जब प्रज्ञा सफाई देते-देते हार गई, तब अपने कमरे में भागी। चार माह हो गए। किसी से एक शब्द भी नहीं बोलती। अब उसका कमरा ही उसका संसार हो गया है।

कैसी रीति है? परिवार की छोटी-छोटी बातंे भी महाभारत का निमिŸा बन जाती हैं। यशोधन बाबू ने इस घर की प्रतिष्ठा के लिए धन को अहम न समझा। एक जोड़ी धोती से वर्ष काटने का आदर्श प्रस्तुत किए। आज उनका घर कई घरों में बँट गया था।

समूचे घर में संवादहीनता का साम्राज्य था। ठंड अपनी जवानी पर थी। यशोधन बाबू घर और घर के लोगों की स्थिति से दुखी थे। आज चार दिन से चली आ रही बुखार ने भी परेशान कर दिया था। उम्र के साथ दमा ने भी असर दिखाना प्रारंभ कर दिया था। घर की चिंता है ही, खाँसी जाती नहीं। कफ सूख गया है। बेचारे जाड़े की इन रातों में अधिक परेशान हो जाते हैं।

रात्रि भोजन के बाद सभी के कमरे बंद हो गए थे। रात कुहासे में ठिठुरी हुई थी। यशोधन बाबू खाँसी से परेशान थे। रजाई से मुँह निकालकर शारदा जी ने कहा, – ‘वृद्धा आश्रम बूढ़ों के लिए ही न खोली है सरकार ने! घर में तो आदमी चैन से सो भी नहीं पाता!’

पत्नी की यह बात सुन कर तह तक आहत हो गए यशोधन बाबू। उनका घर उनके ही ऊपर हँसता सा नजर आ रहा था। कितना बदल गया है सबकुछ! सब कुछ समर्पित करने वाली पत्नी भी वृद्धावस्था में पति को बोझ समझने लगी है। वे सोचने लगे ‘कल ही वृद्धाश्रम चला जाऊँगा।’ . . किसी से कुछ नहीं कहूँगा। . . बस एक तोलिया ओर एक गिलास।  . . .

यशोधन बाबू चिंतन में ही रमे थे कि खाँसी की एक लहर आई। उठे, पानी पीए। खाँसी नहीं रूकी। दोनों हथेलियों से मुँह को दबाए कि आवाज बाहर न निकले। शारदा की नींद न टूटे। अंत में पास में ही रखी तौलिया से खाँसी रोकने लगे।

सुबह जागते ही शारदा जी ने देखा कि यशोधन बाबू नीचे फैले हुए हैं। आँखें फटी-फटी हैं। मुँह में तौलिया है। नाक से खून की एक रेखा निकली है, जो अब सूख गई है। एकाएक शारदा जी पछाड़ खाने लगीं। घर के अन्य सदस्य सहमे-सहमे कदम से जब कमरे में पहुँचे तब शारदा जी ने विलाप करते हुए कहा, – ‘अब इन्हें बाहर निकालो जी! . . .लाश को घर में नहीं रखते।’

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– केशव मोहन पाण्डेय

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