चलते जाना है

उठा-पटक यह जीवन है।
अभिलाषा क्या
सरल पथ की ?
खुद खींचना है
चलाना है,
है सारथी-शून्य
यह रथ भी।
शापित-शून्य होकर भी
धस जाता पहिया
दलदल में,
सुनना होता है गीता
समय-कृष्ण से
हर पल में।
कुछ कठिनाई-द्यूत
द्रौपदी-निष्ठा को
निर्वस्त्र जो करने लगते हैं,
शकुनी रिश्ते बन जाते है
दुर्दिन-दुर्योधन के भाग्य जगते है।
गंधारी-ज्ञान,
पट्टी से अंधी हो
जब स्वार्थ-सिद्धि में जीती है,
कुंती-कर्म
कठोर हो-होकर
शील के पैबंद को सीती है।
जब होता है
एक महा युद्ध,
सब छिन्न-भिन्न हो जाता है,
तब शीलहीन पछताता है
कर्मवीर विजयी हो जाता है।
उठा-पटक इस जीवन में
अगर कभी कुछ पाना है,
खोने को भूलते जाना है-
और अविरत
चलते जाना है।।
——————
– केशव मोहन पाण्डेय

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