जीवन आज भी है संघर्ष

आँख में आँसू
मीठे-खारे
जीवन में अवमूल्यन सारे
नहीं हो सकते आदर्श
जीवन आज भी है संघर्ष।
संझा मैली गठरी लेकर
पीर के आंगन आती है
मेहनत से खा-पीकर फिर भी
कुछ तो बचा के लाती है
बैठ मुंडेरे चिंतित पाँखी
कल क्या होगा गुन रही
और चकोरी चाँद मिलन को
तड़प-तड़पकर गाती है
चैन की वंशी
सुख का सितारा
रोटी के आगे सब है बिसारा
भुला मन हँसी-खुशी अमर्ष।
जगह-जगह है गंगा ठहरी
मार के अपनी चाह
ताक़त औ तकनीक से मानव
बना रहा नया राह
धरा-धाम की बात तो छोड़ो
अंतरिक्ष नहीं छोड़ा
फल-फूल रहे हैं मंदिर-मस्जिद
मानवता लापरवाह
हो-हो पराजित
फिर भी न हारा
जीवट मानव चाहता सारा
नित नव करे उत्कर्ष।
कोने बैठी खाट पर मैया
जोड़ रही पैबंद
जानती सब है किस धागे से
जुड़ते हैं सम्बन्ध
मधुर-मधुर सपनों सी बातें
आकर बोले कौन
नहीं रहे जो मृदुल भाव तो
टूट पड़े सब छन्द
गुड़गुड़ हुक्का की
गंध है बासी
दम नहीं लेने देती खाँसी
फिर भी जी रहे हैं सहर्ष।
आँख में आँसू
मीठे-खारे
जीवन में अवमूल्यन सारे
नहीं हो सकते आदर्श
जीवन आज भी है संघर्ष।
——–
– केशव मोहन पाण्डेय

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