जड़

मेरे भीतर
बहती है एक नदी
तुम्हें देखकर
तरल भावों की
कलकल
निर्मल
निरंतर
और तुम
हमेशा ही
मौन होकर
जड़ बना देती हो।
*****

– केशव मोहन पाण्डेय

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