झूले पड़े फुहार के

झूले पड़े फुहार के, बादल दल के बाग।
कजरी कोयल गा रही, बढ़ा रही अनुराग।।1

धरती धानी हो गई, सावन का पा प्यार।
प्रियतम अंबर कर रहे, बार-बार मनुहार।।2

सावन सुख की गागरी, धन का ले भण्डार।
लहराती वर्षा लिए, आया धरती द्वार।।3

सावन आने से बने, जीवन सुख-सौगात।
सुभग सलोना दिन लगे, रसिक हो गई रात।।4

धरती विहसी देख के, सावन लगा फुहार।
सुखद हो गई जिंदगी, पाकर माँ का प्यार।।5
——
– केशव मोहन पाण्डेय

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