तपन बिन सूरज हुआ अधीर

तपन बिन सूरज हुआ अधीर।।

हवा बावली शीत लहर सी
वसनहीन पर टूटी कहर सी
अलाव ठोंके ताल खैनी का
बनकर कुशासन का नज़ीर।।

कथा कहता कौआ सच्चा
ज़िद्द पर बैठा पूरब बच्चा
रवि-फल का सब बाट अगोरे
ओढ़े घने कोहरे का चीर।।

साँस को रोके सिसके कुँआ
साँस से निकले मुँह भर धुँआ
मूली-मिर्च के सउना-गंध से
दोपहरी बन बैठी गंभीर।।

कारण बिन कोई कार्य न होए
सांध्य-सुबह सब मिलकर रोए
सद्भाव बने सब आग जोहते
मिट रहा पाखंडी का लकीर।।
——
– केशव मोहन पाण्डेय

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