दयाराम

बेशक तुम जश्न मनाओ, खुशियाँ बाँटो,
बागों में , पहाड़ो में,
पर तुम्हें पता है,
नालियाँ साफ करते -करते ,
दम घूँट कर, नाली में मर गया,
दयाराम।

बेशक तुम जश्न मनाओ ,खुशियों बाँटो,
बागों में पहाड़ों में,
पर तुम्हें पता है,
तुम्हारी साल भर पेट भरने के लिये,
और अपने लिए दो दाने की जुगत में,
ठंड से ठिठुर कर खेत में मर गया –
दायराम।
मगर उसके मुँह से मिला यूरिया ,
बयां कर रहा है कुछ और ही।

बेशक तुम जश्न मनाओ ,खुशियां बाँटो ,
बागों में ,पहाड़ों में,
पर तुम्हें पता है ,
तुम्हारे नेता का टेंट बनाते  हुए ,
बाँस से दबकर मर गया था ,
दयाराम ।
पर न जाने कैसे ,पर गया था शरीर उसका काला ।
आज मिलकर आया हूँ ,
700 रुपये पेंशन पाती उसकी बूढ़ी माँ ,
विधवा पत्नी,
सड़क के चौराहे पर पकौड़ा तलते हुए बेटे,
और दो जवान अविवाहित बेटियों से ,
और वहीं मिला एक दूसरा दयाराम ,
बताया कि,
बिजली के तार को छूकर मरा था वो,
दयाराम।

छोड़ो यार मरने दो मरता है जितना दयाराम ।

बेशक तुम जश्न मनाओ , खुशियों बाँटो ,
बागों में ,पहाड़ों में ,
पर तुम्हें पता है ,
वो जो मुझे देती थी,
पल- पल दयाराम के मौत की खबर ,
वो आज हो चुका है खुद दयाराम।
अब वो कह नहीं पाता ,
अब वो दिखा नहीं पाता,
अब वो छाप नहीं पाता,
अपने मन का ।
अब उसे करना पड़ता है –
हिन्दू -मुस्लिम , गाय-भैंस ,
अब उसे दिखाना पड़ता है ,
तुम्हारे नेताओं के बड़े -बड़े भाषण ,
और उनकी हवाई वादे ।
उन्हें दी जाती है –
नोटों की मोटी-मोटी गड्डियाँ ,
सर्फ-साबुन , नमक -तेल , गंजी – जाघिया ,
आदि दिखाने के लिए ,
इन सबों के बीच दब जाता है कई –
दयाराम।

हाँ  तुम जश्न मनाओ ………..

जब अ, आ सीखने वाले बच्चे ,
कूड़े बीनकर पेट भरने लगे,
जब कागज की कश्ती चलाने वाले बच्चे,
नाव चलाने  लगे ,
जब भाइयों -बापों के हाथ,
बहन-बेटियों के जिस्म पर चलने लगे ,
जब संसद सिर्फ शोरगुल करने लगे,
और जिस हिंदुस्तान में कलम डरने लगे ,
तब वो हिंदुस्तान हिंदुस्तान हो नहीं सकता,
इतने बदले , चलो बदले एक और नाम,
हिंदुस्तान को अब से कहें 
‘ दयाराम ‘

-आदित्य राज

( स्नातकोत्तर छात्र- काशी हिंदू विश्वविद्यालय )

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