नदी हत्यारिन होती जा रही है

उफनती आस ले पानी
और गतिशीलता विश्वास तोड़ने सी
सोच जंगल उजाड़ने सी
संघर्ष पेड़ काटने सी
सोच में डूबी
प्रदूषण सी आकण्ठ
नदी
हत्यारिन होती जा रही है
और बदले की आग में
नहीं पहचान रही है
दोषी और निर्दोषी कौन।
यूँ ही नहीं बदलती नदी
अपना स्वरुप
बदलती रहती है
बहती नदी
मानवीय चरित्र सी
अपना रूप
और समझ नहीं पाते हम
कि नदी भी
हमारे साथ
राजनीति करती है
आने वाले समय के लिए
मानवीय विपक्ष से डरती है।
पहाड़ों में दुबकी
गरीबी सी विवश नदी
अवसर पाते ही
अपना सामर्थ्य दिखा देती है
मनुष्य हो जाये
चाहे लाख वैज्ञानिक
उसे उसकी औक़ात बता देती है।
प्रयोगधर्मी मानव के कारण
कई जगह तो
अपना अस्तित्व खोती जा रही है
आज भी
अपमानित होती नारीत्व की भाँति
डरी हुई/डराती हुई नदी
हत्यारिन होती जा रही है।
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– केशव मोहन पाण्डेय

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