परवरिश

एक सामान्य परिवार से होकर भी उद्भव जी ने अपने कर्मों से खूब नाम, यश, प्रतिष्ठा कमायी। क्षेत्र क्या, पूरे मंडल में कोई सामाजिक, साहित्यिक या बौद्धिक कार्य हो रहा हो, तो उसमें उद्भव जी निश्चित ही रहते हैं। उनकी महति भूमिका भी होती है।
उद्भव जी ने शहर में रहकर बेटे प्रेम और बेटी प्रभा को उच्च शिक्षा दी। बेटी को एक एन आर आई इंजीनियर से व्याह दिया। अब बेटी भी अमेरिका में अपने पति-बच्चों के साथ बस गई है। एक बैंक में मैनेजर है।
बेटा भी एम बी ए कर के ऑस्ट्रेलिया गया। जब उसने वहीं की नागरिकता ले ली और फोटो के साथ पिता को सन्देश भेजा, जब उद्भव जी को अपने द्वारा दी गई शिक्षा पर क्षोभ होने लगा। पत्नी बेटे की तरक्की पर प्रसन्न थी। बोलीं – ‘ईश्वर करें कि सबके बेटे ऐसे ही आगे बढ़ें।’
उद्भव जी ने अनुभव किया कि उनकी आँखें नहाने लगीं हैं। पत्नी और आँखों को बहलाते हुए बोले – ‘चलो अब गाँव चलते हैं। वहाँ कोई बोल-बतियाने वाला तो मिल जायेगा।’
ट्रेन का सफर जल्दी से समाप्त ही नहीं हो रहा था। दोनों शहर से सबकुछ लूटाकर जा रहे थे। पत्नी ने पूछा, – ‘एक बात बोलूँ जी? बेटे का फोटो देखकर मन खुश होने के बदले खाली लगने लगा। जैसे मेरे बेटे को दौलत-देवी ने ठग लिया।’
गाँव क्या, पूरे क्षेत्र के लोगों को उद्भव जी के प्रति संवेदना हो गई थी। सब उनके बेटे कोसते थे। मगर आज दो साल बाद उनका बेटा अपनों से मिलने आया तो पूरे सप्ताह उसे मिडिया वाले घेरे रहे। हर जगह उसका सम्मान होता रहा। उद्भव जी ने पत्नी को ओर देखा और आँखों को नहाने दिया। कोई बहाना भी नहीं बनायें। लगा कि उन्होंने बच्चों के परवरिश में कोई कमी न की।
——- केशव मोहन पाण्डेय ———-

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