पारंपरिक भोजपुरी गीतों में वैवाहिक-विधान

हिन्दू धर्म में सद्-गृहस्थ की, परिवार निर्माण की जिम्मेदारी उठाने के योग्य शारीरिक, मानसिक परिपक्वता आ जाने पर युवक-युवतियों का विवाह संस्कार कराया जाता है। समाज के संभ्रान्त व्यक्तियों की, गुरुजनों की, कुटुम्बी-सम्बन्धियों की, देवताओं की उपस्थिति इसीलिए इस धर्मानुष्ठान के अवसर पर आवश्यक मानी जाती है कि दोनों में से कोई इस कत्तर्व्य-बन्धन की उपेक्षा करे तो उसे रोकें और प्रताड़ित करें। पति-पत्नी इन संभ्रान्त व्यक्तियों के सम्मुख अपने निश्चय की, प्रतिज्ञा-बन्धन की घोषणा करते हैं। यह प्रतिज्ञा समारोह ही विवाह-संस्कार है। भारत में भाषायी और सांस्कृतिक वैषम्य होते हुए भी अपने-अपने लोक-पक्ष की विशिष्टता है। अपनी लोक-संस्कृति से भी लगाव है। उसकी अपनी मर्यादा है। अपनी पहचान है। कठिन परिस्थितियों में लोक-जीवन सरसता भरने का नाम है। ज्ञान की गरिमा का यशगान करने का नाम है। इन दिनों चारों ओर वैवाहिक कार्यक्रमों की धूम है। आधुनिक सूचना तकनीक के इस युग में बारात से लेकर विवाह समारोह तक में इस्तेमाल होने वाली कई चीजें हाइटेक हो गई हैं। इन सबके बीच विवाह में जिस एक पक्ष की लोकप्रियता व जादू हमेशा की तरह बरकरार है, वह है हमारा पारंपरिक गीत।
संपूर्ण भारत में कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा को गोवर्धन-पूजन किया जाता है। भोजपुरिया संस्कृति में गोबर से मनुष्य की प्रतिमा बनायी जाती है। वह प्रतिमा इंद्र की प्रतिकृति होती है। उस प्रतिमा को फूल-मालाओं से सुसज्जित किया जाता है। उस दिन बहने भैया-दूज मनाती हैं। इस क्षेत्र में गोवर्धन-पूजन के साथ ही विवाहोत्सव का लग्न प्रारम्भ होता है। उसके लिए गोवर्धन-पूजन के बहाने ही लग्नदेव को उठाया जाता है। सोये हुए लग्नदेव को जगाने के लिए स्त्रियाँ गा उठती हैं –
उठहू ए देव उठहू ए
सुतले भइले छव मास,
तहरा बिना बारी ना बिअहल जाय
बिअहलइ ससुरा न जाय।।
हिंदू धर्म में सोलह संस्कारों की बात कही जाती है। ये सभी संस्कार मनुष्य को मनुष्य बनाने की प्रक्रिया के निमित्त होते हैं। मानव जीवन में विवाह सबसे प्रसिद्ध और मुख्य संस्कार माना जाता है। विवाह से अधिक महत्ता किसी अन्य संस्कार का नहीं है। उस अवसर वर और वधू दोनों के घर वैवाहिक गीत गाए जाते हैं। कन्या के यहाँ से तिलक ले जाने की तैयारी का एक चित्र देखिए –
केइएँ रंगेला हांडा
केइएँ पीअर धोती
अवध जइहें तिलक।
राम हमारे लोक-संस्कृति के महानायक हैं। वे वैवाहिक गीतों में वर का प्रतिनिधित्व करते हैं तथा सीता कन्या का। इसका प्रमाण हमारे यहाँ गाए जाने वाले वैवाहिक गीतों में समय-समय पर मिलता रहता है। तिलक जब वर के द्वार पर पहुँचता है तब सुहागिनें गा उठती हैं –
तिलक आए रघुवर के
राम लछुमन के
भरत शत्रुघन के
अवधपुर भारी है।
आजकल हिंदू समाज में सामान्य तौर पर विवाह का जो रूप प्रचलित है, वह ब्रह्म और दैव विवाह का मिश्रण है। इस विवाह पद्धति में तिलक और विवाह में कुछ दिनों का अंतराल रहता है। इस अंतराल में दोनों घरों में शगुन उठता है। एक गीत –
केइएँ रे शगुनवा राम गइले
सीता के लेई अइलें
कोसिला मनवा हरषित।
बीनवा के देखुएँ मछरिया लिहले
अमवा मोजरिया लिहले
गोदीया बलकवा लिहले
ओही रे शगुनवा राम गइले
सीता के लेई अइलें
कोसिला मनवा हरषित।
बारात सजने का अलग ही आनन्द होता है। बारात का सजना घर-परिवार, हित-रिश्तेदार, गाँव-पड़ोसी, स्त्री-पुरुष, सबका सजना होता है। बारात जब वर के घर से निकलता है तो टोला-मुहल्ले के बाहर स्त्रियाँ वर का परिछावन करती हैं। माँ भी परिछावन करती है। माँ तो माँ होती है। विवाह करने जाने वाले बालक की माता सोचने लगती है कि दूध के बिना कही बेटे का मुँह सूख न जाए। इसका उल्लेख परिछावन गीतों में अधिकता से होता है। मैं तो सोचता हूँ कि शायद इसी वजह से परिछावन के समय माता वर को ‘स्तन-पान’ कराती है।
वैवाहिक गीत कन्या पक्ष में ही अधिक होते हैं। इसका कारण एक यह भी है कि समस्त वैवाहिक विधान कन्या के घर पर ही सम्पन्न होते हैं। वर तथा कन्या के घरों में गाए जाने वाले गीतों में पार्थक्य हो जाता है। जहाँ वर पक्ष के गीतों में उत्साह की प्रचुरता रहती है, वहीं कन्या पक्ष के गीत बड़े ही करुण और मर्मस्पर्शी होते है। इनका उदाहरण हम ‘द्वार-पूजा’ के गीतों से ही देख सकते हैं। विवाह हेतु बारात जब द्वार पर आती है, तो सर्वप्रथम वर का स्वागत-सत्कार किया जाता है। वर के द्वार पर आते ही कन्यादाता वर सत्कार के सभी कृत्य करते हैं। जब वैवाहिक-व्यवस्था से थके पिता सो जाते हैं तब उन्हें कन्या जगाती है। उसे भी चिंता है कि पिता के सो जाने पर द्वार पर आए बारात का आव-भगत कौन करेगा? इस तरह पिता का मान-मर्दन हो जाएगा। वह कहती है –
कोठा के ऊपर कोठरिया ए बाबा
केतना सुतेनी निरभेद
सजन लोगवा भीड़ अइले।
द्वार-पूजा के बाद कन्या-निरीक्षण में वर के अग्रज एक तरह से कन्या को अधिगृहित करने जाते हैं। परम्परानुसार अग्रज बन्धु द्वारा दुल्हन का पूर्वावलोकन और सांकेतिक प्रथम और अंतिम स्पर्श करता है। उस समय अग्रज द्वारा दुल्हन को वस्त्र, आभूषण और उपहार भेंट किया जाता है। उसके बाद आजीवन वह कभी उसका स्पर्श नहीं कर सकता। उस वातावरण में कन्या पक्ष की स्त्रियों द्वारा उनके साथ हास-परिहास होता है। उनके लिए स्वागत गीत गाया जाता है। एक दृष्टान्त देंखे –
एही बड़ भसुर जी के आरती उतारीं हे
भूषन बसन लाये बहुत सम्हारी हें।
जहाँ पारिवारिक स्तर के परम्परागत विवाह आयोजनों में मुख्य संस्कार से पूर्व द्वारचार (द्वार पूजा) की रस्म होती है, वहाँ यदि हो-हल्ला के वातावरण को संस्कार के उपयुक्त बनाना सम्भव लगता है तो स्वागत तथा वस्त्र एवं पुष्पोपहार वाले प्रकरण उस समय भी पूरे कराये जाते है। पारिवारिक स्तर पर सम्पन्न किये जाने वाले विवाह संस्कारों के समय कई बार वर-कन्या पक्ष वाले किन्हीं लौकिक रीतियों के लिए आग्रह करते हैं। विवाह-संस्कार का नवम चरण कन्यादान होता है। इसी विधि में पिता द्वारा अपनी पुत्री का ‘कन्यादान’ किया जाता है। कन्यादान का अर्थ अभिभावकों के उत्तरदायित्वों का वर के ऊपर, ससुराल वालों के ऊपर स्थानान्तरण होना है। अब तक माता-पिता कन्या के भरण-पोषण, विकास, सुरक्षा, सुख-शान्ति, आनन्द-उल्लास आदि का प्रबंध करते थे, अब वह प्रबन्ध वर और उसके कुटुम्बियों को करना होगा। कन्या नये घर में जाकर विरानेपन का अनुभव न करने पाये, उसे स्नेह, सहयोग, सद्भाव की कमी अनुभव न हो, इसका पूरा ध्यान रखना होगा। कन्यादान स्वीकार करते समय पाणिग्रहण की जिम्मेदारी स्वीकार करते समय, वर तथा उसके अभिभावकों को यह बात भली प्रकार अनुभव कर लेनी चाहिए कि उन्हें उस उत्तरदायित्व को पूरी जिम्मेदारी के साथ निबाहना है। तत्पश्चात ‘सिंदूरदान’ का कार्य सम्पन्न होता है। हमारे समाज की विडंबना और व्यवस्था देखिए कि सिंदूरदान के बाद मात्र चुटकी भर सिंदूर को माँग में भरकर एक कन्या नारीत्व को धारण कर लेती है। उसके बाद कन्या के यहाँ का संपूर्ण वातावरण करुण हो जाता है। उस करुण वातावरण को हास्यपूर्ण बनाने के लिए ‘कोहबर’ की विधि होती है। कोहबर के गीतों में संभोग श्रृंगार की अधिकता होती है। उन गीतों का वर्णन आज के व्यवसायिक गीतों के मुखड़ों से भी कई मीटर ऊँचे परम्परा और शील के शिखर विराजमान नजर आते हैं। देंखे –
झोंपा-झोपारी कि फरेला सुपारी
तरे नरियरवा के डारी
तेही तले सेजिया सजावेली कवन देई
केहू आवे ना केहू जाई।।
इस समूचे चक्र के बाद दुल्हन बनी कन्या अपने परिजनों से विदा होकर सिर्फ एक रिश्ते से पूरी दुनिया सजाने परजनो को अपना बनाने चल देती है।
नगरों-महानगरों में अपनी यह वैवाहिक परंपरा आज समय के साथ बदलाव का वास्ता दे कर जहाँ मोटरों और भीड़ के षेर में दब कर सिसकियाँ ले रही हैं, वहीं आज भी बहुत से लोग अपने आंगन से मदिर के प्रांगण तक ही सही, इसे हृदय से चिपकाए हुए हैं। लोक रीतियों का यह वैवाहिक संस्कार कभी-कभी न्यायालयों के प्रांगण में वकीलों के पाण्डित्य से ही चंद तहरीरों के माध्यम से भी फेरा लेकर पूर्ण हो जाता है।
हमारे परंपराओं का, संस्कारों का वास्तविक आनन्द गाँवों-देहातों में मिलता है। गाँवों में अधिकांश घर कच्चे होते हुए भी लिपे-पुते और सुन्दर होते हैं। उन घरों पर लहराती लौकी, तरोई और कद्दू की लताएँ मानव मन को बरबस आकृष्ट कर लेती हैं। गेरु और चूने से दीवारों पर की गई नक्कासियाँ भी पुकारती हैं कि अतिथि देव आइए! . . . इस घर में तिलक है या व्याह है। . . . आइए, आपका स्वागत है।
इस यथार्थ चक्र को प्रतिवर्ष गोवर्धन-पूजा या भैया-दूज या यम द्वितीया या देव उठान से प्रारंभ कर छह माह की यात्रा पूरी की जाती है। लग्न देव थक कर विश्राम करने लगते हैं। पुनः-पुनः प्रतिवर्ष ‘उठहू ए देव’ गा-गाकर जगाया जाता है और भोजपुरिया माटी मँहकायी जाती है।
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– केशव मोहन पाण्डेय

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