पूजा तेरे रूप की

(दौहिक गीतिका)

चाहे कितना भी रखो, फूँक-फूँक के पाँव।
बने खिलाड़ी खेलते, सारे अपना दाँव।।

छल-छद्म-वैमनस्य सब, घर-घर बसते आज।
शहरों से भी हो गए, खतरनाक अब गाँव।।

रोटी ही जिसका खुदा, उसको क्या आराम।
भूख से जब व्याकुल हुए, भूलते धूप-छाँव।।

पूजा तेरे रूप की, करता मैं दिन-रात।
पागल मन को प्यार में, मिलता मरहम-घाव।।

मानव का है एक सच, बाकी सारा रोग।
फिर भी इस संसार में, मन का नहीं लगाव।।

**** केशव मोहन पाण्डेय ****

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