प्यार का रंग

उसकी साँवली सूरत भी बेहद आकर्षक थी। प्रौढ़ावस्था में भी उसके चेहरे के पानी से यौवन का आकर्षण सहज ही समझा जा सकता था। साँवले रंग पर गोल पानीदार लुभावना चेहरा। चेहरे के लुभावनेपन का तीन कारण था। होठों पर अक्षय मुस्कुराहट। बड़ी-बड़ी काली आँखें। आँखों की अस्थिरता। कद-काठी ऊँची नहीं थी, पर शरीर भारी हो गया था। अपनी ही धून में चलती और नजर मिलने पर दो-चार पावन मुस्कुराहट छिड़क देती।
सरोज अपने काम से काम रखती और काम पूरा कर लेने के बाद जीने पर बैठकर वीणा के चाय की प्रतीक्षा करने लगती। कई बार चाय में विलंब होने पर पूछती भी। ……. करीब पच्चीस साल से इस घर में है। पहले सारा काम करती थी, अब केवल झाड़ू-पोंछा तक सीमित किया गया है। दक्षिण भारतीय इस लड़की ने अपने आप वर का चयन किया था और किसी मंदिर में शादी कर के यहाँ आ गई थी। आज वीणा मालकीन हैं, तब तो वे आयी भी नहीं थीं। तब अम्मा यानि शुभदा देवी ही सबकुछ देखती थीं। तब शुभदा देवी को भी एक घरेलू सेविका की आवश्यकता थी। घर में कोई था नहीं। बेटा राजीव बिलायत पढ़ता था और पति राघवचंद्र को अपने आॅफिस के काम से ही काम था। इतने बड़े घर में शुभदा देवी अकेली पड़ी रहतीं और किसी न किसी के आगमन की चाहत ली रहतीं। सरोज मिली तो उनके सूने दिल को षुकून मिल गया। सरोज का पति गणेशन पढ़ा-लिखा भी था और ड्राइविंग जानता था। शुभदा देवी ने अपने अफसर पति राघवचंद्र जी को समझाया तो वे भी पहली बार पत्नी की बुद्धि की दाद देने लगे।
अनाश्रित सरोज और गणेषन को आश्रय ही नहीं मिला, रोटी की भी व्यवस्था हो गई और रहने के लिए एक कमरा भी दे दिया गया। भले ही कभी समय की गति कम नहीं हुई, मगर सरोज की जिन्दगी में कोई प्रगति नहीं हुई। उसका कोख बंजर पड़ा रहा। संतति चर्चा पर कई बार उसके स्वच्छ काली आँखों में तैरते जल-राशि को देखकर शुभदा देवी समझाया करतीं, – ‘तो क्या हुआ? ….. देख न, बेटा तो बेटा है, फिर भी कहाँ कोई मेरे साथ रहता है? …. समझ लो तुम्हारी संतान भी कहीं है।’
तब अश्रु-वेग में उलझी आँखों की पुतलियाँ बहुत ही धीरे से उठती और गिरतीं, मगर आवाज तो चटकती अग्नि सी थी, – ‘मैं सब जानती अम्मा। …. आप मुझे हिम्मत देती। … मेरे को भी मालूम है कि होने और समझने में कितना डिफरेंस है।’
‘हाँ भाई, तू बहुत बुद्धिमान है। ….. तो बता ना, इतनी बुद्धिमान है, फिर भी रोती है? ….. धत् पगली।’
‘हाँ-हाँ! …. मैं बुद्धू, मैं पागल। …. पर अम्मा, मुझे बगाना नहीं, …. मुझे इदर ही रखना।’
सरोज के स्वर की दाब इतनी उच्च होती कि शुभदा देवी को अपनी हँसी रोकने के लिए आँचल दाँत से दबाना पड़ता। सरोज की ऐसी भावात्मक बातें भी तेज आवाज में होती थीं। बल्कि यह कहिए कि आवाज और तेज हो जाती। आवाज और षब्द संप्रेषण ऐसे होती कि तब उसका आग्रह भी आदेश लगता।
स्वास्थ्य की दृष्टि से समय के साथ संयम न हो तो मनुष्य के शरीर का कसाव ढीला होने लगता है। सरोज के शरीर का कसाव तो वैसे ही था पर शरीर भारी होता जा रहा था। सरोज अपने भारी षरीर के साथ ही स्वभाव के कारण भी हर काम में कुछ धीमी पड़ गई थी। काम में धैर्य और स्वर में तीब्रता ही अब उसकी पहचान बन गई थी। कई बार स्वर से कठोर और मन से मुलायम लगती तो कई बार कुछ समझ ही नहीं आती। कई बार कई प्रश्नों का उत्तर देने की आवश्यकता पर भी मौन बनी रहती और कई बार बेवजह बोलती रहती। कई बार उसका बोलना शुभदा जी के साथ ही घर के अनय सदस्यों को खिला देता तो कई बार खलने लगता। जब वीणा आयी तो पहली बार ही सरोज से मिलकर उसे कुछ अच्छा न लगा। बहुत हद तक भयभीत हो गई। कैसा स्वभाव है इसका? ….. चल पाएगा कि नहीं?
बात भी तो सही थी। सरोज की आवाज में घंटी की ध्वनि थी। सुनने वालों को उसकी आवाज मंदिर की पावन घंटी की तरह नहीं, स्कूल की घंटी की तरह लगती थी। वह भी गणित के पीरियड आने वाली घंटी जैसी। वीणा का स्वभाव भी बहुत शांति-प्रिय तो नहीं था, पर वह शांति चाहती थी। सबसे पहले तो उसने पति राजीव से बात किया फिर अपनी सास और श्वसुर से भी। उसका मानना था कि बात से बात खुलती भी है और निर्णय भी पारदर्शी होता है। इसी से तो विश्वास को मजबूती मिलती है। बात करने के बाद निर्णय लिया गया कि सरोज को ऊपर का एक कमरा दे दिया जाए।
अब सरोज की सीमा निर्धारित कर दी गई थी। राघवचंद्र जी रिटायर्ड थे, पर गणेशन उनके साथ ही रहता था। सरोज के लिए अब सिर्फ काम से ही काम था। अब हर बात में आदेशात्मक राय देना बंद कर दिया गया था। बस चैका-पोंछा, झाड़ू-बरतन। किचेन के लिए वीणा ने दूसरी मेड को बोल दिया था। सरोज को इस बात का रंज नहीं था कि पच्चीस साल से जिस घर में अपने घर की तरह दखल करती रही, उसी घर में उसके लिए लक्ष्मण-रेखा खींच दी गई थी, दुख तो इस बात की थी कि उसे किचेन से दूर कर दिया गया था।
वीणा का मानना था कि – ‘ये केरल वाले हर व्यंजन में नारियल घुसाते हैं। कहीं नारियल का बुरादा तो कहीं नारियल का तेल। ….. इनका चले तो सुबह-सुबह चाय के बदले नारियल-सूप बनाकर परोसें। ….. नारियल भी कोई रोज-रोज खाने की चीज है? … कभी पूजा-पाठ में प्रयोग कर लिया, प्रसाद के रूप में खा लिया, सो अलग बात है। अधिक-से-अधिक कभी खुशियों को सेलेब्रेट करने के लिए नारियल के लड्डू बना लिए। लेकिन, ओ गाॅड! …. ये तो बस नारियल ही खायेंगे। वो तो भला हो नेचर का कि इतना लंबा और पतला पेड़ बना दिया, नहीं तो इनका चलता तो नारियल पर ही घर बसा लेते।’
शुभदा जी ने हँसी रोकने के लिए आँचल मुँह में दबा लिया। सरोज समझ गई। खिलखिला उठी। वीणा को लगा कि उसकी सामान्य-ज्ञान वाली इन तर्कों पर सरोज की हँसी ने असमय पानी डाल दिया। अपनी अपेक्षाकृत छोटी पुतलियों वाली आँख तरेरकर बोली, – ‘शरम कर! …. बड़ी आयी सफेद दाँत दिखाने वाली।’ – और अंदर चली गई।
सरोज ने शुभदा जी की ओर देखा। वे निष्कंप बनी हुई थीं। क्रिया और ध्वनि, दोनों से मौन। मौनं स्वीकार लक्ष्णम् का भावार्थ समझकर सरोज को बहुत ग्लानि हुई। रोने लगी। रोते-रोते ऊपर चली गई।
वीणा ने अपने लिए शुद्ध कश्मीरी नून-चाय बनाया। आज वीणा का मन इस नून-चाय को पीने से अधिक नारियल से अधिक प्रभावशाली सिद्ध करना भी था। उस गुलाबी कलेवर की चाय की गंध पूरे घर में फैल गई। वीणा चाय के छलकते मग के साथ आयी तो पूर्ववत् रंगत में थी, इधर-उधर देखी। सरोज को नहीं देखकर शुभदा जी के पास गई – ‘आपके लिए भी लाऊँ मम्मी?’
सरोज आँसू पोंछते आयी और सहजता से बोली, – ‘मुझे भी अपनी चाय पीलाओ ना बीवी जी।’
वीणा का मन तो किया कि पूरा मग उसके मुँह पर फेंक दे, मगर एक तो सरोज की बाल-सुलभ स्वाद-सुख पाने की जिज्ञासा देखकर और दूसरी बात कि अपनी नून-चाय की वरिष्ठता सिद्ध करने का मौका देखकर थूक निगलती और किचेन में चली गई। अब ट्रे लेकर निकली। ट्रे में वीणा के मग के साथ दो प्याली भी थी। प्यालियों की गरदन तक गुलाबी झाग भरा हुआ था। सरोज ने सबसे पहले प्याली उठायी और पहली बार इतनी पास से उस चाय की रूप-रंग को देखकर चीखी, – ‘ये क्या है बीवी जी???’
‘खून नहीं है किसी का। …. इतना क्या चीख रही हो? … नून-चाय है नून-चाय।’
‘नून चाय??’
‘हाँ जी मैडम। …. यह नारियल पानी से नहीं बनाया जाता, ना ही चीख-चिल्लाकर बनाया जाता है, …. प्यार से बनाया जाता है, प्यार से। …. प्यार का रंग पता है न? … पिंक होता है, मतलब गुलाबी। इस नून-चाय को पिंक-टी भी कहते हैं मैडम।’
वीणा ने शुभदा जी को प्याली दिया और सोफे पर फैलते हुए बैठकर चाय पीने लगी। सरोज ने चाय की पहली चुस्की ली। डरते-डरते। …. पता नहीं कैसा स्वाद है? मँहक तो लुभावनी थी। पहली चुस्की के बाद ही उसकी बड़ी आँखें आश्चर्य से और बड़ी हो गईं। पहली चुस्की से ही उसके तन-बदन में जैसे किसी चमत्कार की झनक दौड़ पड़ी। पिस्ता-बादाम की स्वाद वाली उस चाय से सरोज का रोम-रोम खिल गया। चिल्लाते हुए अंदर गई, – ‘बीवी जीऽऽऽ!’
वीणा ने तेज आवाज में रोका, – ‘वही रूको।’
सरोज ठिठकी, फिर चिल्ला उठी, – ‘बहोत बढ़िया टेस्ट है चाय की। ये चाय है या पिस्ता-बादाम का जूस?’
शुभदा जी फिर दाँतों से आँचल दबाकर हँसी छुपाने लगीं। वीणा की नजर मिली तो पहले दोनों ने सरोज को देखा, फिर एक-दूसरे को, और फिर ठहाका गुँज उठा। सरोज सकपका गई। वह अपने आगे-पीछे बेचैनी से देखने लगी। उसे लगा कि उसके तन से कुछ अकल्पनीय चीज चिपक गयी है। कई प्रयास करने के बाद भी सास-बहु के हँसने का अर्थ नहीं समझ पायी तो अपनी अज्ञानता पर झेंप गई। फर्ष पर ही पालथी मारकर बैठ गई, – ‘बीवी जी, आपकी चाय बहोत अच्छी है। आप चाय बनाया करना, बाकी काना मैं बनाएगी।’
वीणा खड़ी हो गई, – ‘नहीं। हमें नहीं खाना तुम्हारी नारियल की बास वाला काना। …..’
‘मैं सबकुछ बनाती है बीवी जी। …. अम्मा, बोलो ना।’
‘अच्छा! …. सबकुछ बनाती हो? तो राजमा-गोआग्ज़ी की रेसिपी बताओ। …. बताओ।’
‘बीवी जी, मेरा गणेशन नन्बूदरी ब्राह्मण है। ….. हम शाकाहारी हैं। मैं ओलम बनाती है, पाल्प्रदामन बनाती है, …. नेंदारंगाई चिप्स बनाती है, …. अवियल पुलिस्सेरी, पचड़ी, किचड़ी, सब बनाती है …. बस मांस छोड़कर। हाँ बीवी जी, मैं कदाला करी के साथ पुत्तु भी बनाती है।’ – जीभ काटकर दोनों कान पकड़ते हुए बोली, – ‘आपने जो बोला, …. हम लोग नाम भी नहीं लेते।’
शुभदा जी को हँसी आ रही थी और वीणा आपे से बाहर हो रही थी। जब उसने अपनी सास को देखा तो गुस्सा पीने लगी। नून-चाय का एक बड़ा घूँट गले में उतारकर अपने आप को शांत किया। अब सरोज भी अपनी काली पुतलियों वाली बड़ी-बड़ी आँखों को मटकाकर इस अद्भूत चाय का आनन्द लेने लगी थी। शुभदा जी दोनों को देखतीं, दोनों से आँखें मिलातीं और अपनी हँसी रोकने के लिए आँचल दाँत से दबातीं, नून-चाय का आनन्द लेतीं।
वीणा की कोई प्रतिक्रिया न देखकर सरोज का साहस बढ़ा। उसे लगा कि उसके प्रस्ताव को मान्यता दे दी गई है। वह खाना बना सकती है। बीवी जी केवल छेड़ रही थीं उसे। जब सबके चाय की चुस्कियाँ शांत हो गईं सरोज ने फैले बरतनों को समेटते हुए शुभदा जी से पूछा, – ‘आज ब्रेकफास्ट में क्या बनाऊँ अम्मा?’
‘तुम्हारे पास जरा भी अकल नहीं है क्या? ….. कोई बात एक बार में नहीं समझ सकती?’ – वीणा ने सरोज का रास्ता रोककर समझाना शुरू किया, – ‘नहीं समझ में आती तो बादाम, …. नहीं-नहीं, नारियल पिलाओ अपने दिमाग को।’ – वीणा ने एक लंबी साँस खींचकर छोड़ा – ‘तुम आज से सिर्फ वही करोगी, जो कहा गया है। चैका, झाड़ू-पोंछा, बरतन, बस। खाना बनाने के लिए दूसरी मेड आएगी।’
अब जाकर सरोज को समझ आया कि बात गंभीर है। यह बीवी जी वह चट्टान है, जो टस से मस नहीं होगी। फिर भी मन नहीं मान रहा था। तब उसे गणेशन की याद आने लगी। उससे सरोज का पहला मिलन याद आने लगा। याद आने लगा कि गणेशन उसके हाथ के बने खाने की कितनी तारीफ करता है। कि गणेशन को तो सरोज के हाथ से बने खाने की आदत सी लग गई है। …. विवाह के बाद कभी दूर रही नहीं। हमेषा उसका ही बनाया हुआ खाने को मिलता रहा। गणेशन भी बहुत आदर करता है उसके खाने की। कभी साहब के साथ बाहर जाता तो सिर्फ चाय-नाश्ता पर ही गुजार लेता। खाना तो सिर्फ सरोज के हाथ का ही खाता। चाहे दक्षिण-भारतीय रेसिपी हो या उत्तर-भारतीय, उसके लिए तो सरोज के हाथ में जादू है जैसे। ….. अब, जब सरोज खाना नहीं बनाएगी तो गणेषन का क्या होगा? …. सोच-सोच कर सरोज की आँखें भर आयीं। उसने एक पल के लिए वीणा को आहत नजरों से देखा और बरतन धोने चली गई।
अब घर के हर कोने में सन्नाटा का साम्राज्य विस्तार ले चुका था। वीणा सोफे पर लेटी सी बैठकर एक चिकित्सकीय पत्रिका पलटने लगी। पत्रिका की पृष्टों को पलटते हुए बार-बार सरोज की क्रियाओं का भी निरीक्षण किया करती। वह अशांत मन और शांत भाव से बरतन धोने में लगी थी। जैसे खतरनाक लकड़बग्घे को इंजेक्शन देकर शांत कर दिया गया हो। शक्ति तो है पर असहाय। …. शुभदा जी फिर मौन थीं। निर्विकार। इस समय वे दोनों को देख रही थीं और आँचल पकड़कर बैठी थीं। वे जैसे इस वातावरण का आकलन कर रही थीं। इस प्रकार पिछले पच्चीस सालों में कभी भी इस घर में सन्नाटा नहीं फैला था। उन्हें आश्चर्य भी था। कोफ्त भी था। वे आहत भी थीं और किंकर्तव्यविमूढ़ भी। वे मौन और मुखरता के बीच में खड़ी थीं। कोई न उनके हृदय का शोर सुन रहा था और ना ही आँखों का मौन पढ़ रहा था।
सरोज बरतन धो-पोंछकर ऊपर अपने कमरे में चली गई। ब्रेकफास्ट बना। वह नहीं आयी। गणेशन आया। प्लेट में रखी वेज सेंडविच की गंध ही उसे नहीं रूचि। किसी तरह सलाद का एक-दो टुकड़ा खाकर मिक्स फ्रूट का जूस लिया। शुभदा जी ने पूछा तो पेट में फूड प्वाइजन का बहाना बनाकर मुक्ति पा लिया। सरोज ऊपर से सुन रही थी। गणेशन बहाने बना रहा था और सरोज तड़प रही थी। वह वीणा को खूब भला-बुरा कहना चाह रही थी। उसी के कारण तो पिछले पच्चीस वर्शों में उसका प्यार ठीक से नाष्ता तक नहीं कर पाया था। उसने खाने के लिए कभी भी गणेशन को ऐसे बहानेबाजी करते नहीं पाया था। ना ही कभी करने दिया था। आज उसे बहुत कुछ याद आने लगा। वह दुखी थी। उसने गणेशन से शादी करने के लिए अपने परिवार से सारे रिश्ते तोड़ दिए, तो कोई दुख नहीं था, मगर आज तो सरोज पर दुख का पहाड़ ही टूट पड़ा था। उसे अपनी असली गलती समझ में नहीं आ रही थी। उसे समझ में नहीं आ रहा था कि उसका केरल का होना गलत है कि नारियल की अधिकता वाला खाना बनाना गलत है कि तेज आवाज में बातें करना??
चाहे कोई जिद्द कहे या मूर्खता, सरोज ने दृढ़ निश्चय कर लिया कि जब तब गणेशन मन से नहीं खाएगा, वह एक बूँद पानी तक गले में नहीं डालेगी। तभी वीणा ने आवाज दी, – ‘सरोज, आकर नाश्ता कर लो।’
सरोज उठी और जाकर औंधे मुँह बिस्तर में धँस गई। घर के सभी पुरुष अपने-अपने काम से बाहर जा चुके थे। अब शुभदा जी की आवाज आयी, – ‘सरोज! …. बेटा नाश्ता तैयार है।’
सरोज का मन तो किया कि अभी जाकर दोनों का पैर पकड़ ले, परन्तु उसके निर्णय का अटल टीला टस-से-मस नहीं हुआ। वह शुभदा जी की ममता भरी आवाज को सुनकर फफक पड़ी। वीणा और शुभदा जी ने सरोज की ओर से कोई उत्तर न पाकर उसके कमरे में जाने का निर्णय लिया। शुभदा जी दरवाजे पर खड़ी थीं। वीणा ने सरोज को उठाया। अब वह स्वयं पर संयम न रख सकी। कमर पकड़कर रोने लगी, – ‘बीवी जी, मेरा गणेशन बीमार पड़ जाएगा। … आपने देखा न, … मेरा गणेशन कुच नहीं काया। … उसको मेरे आथ का काना अच्छा लगता है। …. उसको मेरे काने के कारण ही मुझसे प्यार हुआ था। ….. बीवी जी, मैं कान पकड़ती, आज के बाद अपने गणेशन को छोड़कर किसी के काने में नारियल नहीं डालूँगी। …. अपने गणेशन की कसम काती हूँ ….. अब तेज बोलेगी भी नहीं। …. बस, मुझे ही काना बनाने दीजिए।’
रोते-रोते सरोज की साँस चढ़ गई थी। अब वीणा के समझ में भी आ गया था कि ‘गणेशन ने ठीक से नाश्ता क्यों नहीं किया? कि सरोज इतना दुखी क्यों है? कि उसने गलती क्या की है? …… इसकी आवाज तेज है, यह तो स्वभाव है। …. नारियल वाला खाना पसंद है, यह तो क्षेत्रीय वातावरण के साथ अपनी मिट्टी से लगाव है। मैं भी तो दम ओलुव, राजमा-गोआग्ज़ी, नून-चाय में खोयी रहती हूँ। पिंक नून-चाय। प्यार का रंग भी तो वही पिंक होता है….’ – वीणा के मन में पाठशाला चल रही थी कि तभी सरोज ने बोला, – ‘बीवी जी, गणेशन के लिए ही मैंने अपना सबकुछ छोड़ा, जब वह दुखी रहता है तो बड़ा दुख होता है। … मुझे मेरे गणेशन के लिए माफ कर दो बीवी जी।’
‘मेरी अम्मा! …. गलती तो मैंने की है न, माफी तो मुझे माँगनी चाहिए। …. चल, आज से तू ही खाना, नहीं-नहीं, काना बनाएगी। …. अपने गणेशन के लिए भी और हमारे लिए भी। पर …..’
चहकती सरेज ने जैसे वीणा की वाणी छीन ली, – ‘नून-चाय आप बनाना।’
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– केशव मोहन पाण्डेय

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