प्यार का शोध-पत्र

‘प्यार एक अहसास है। अनेक भावनाओं का मिश्रण है। प्यार पारस्परिक स्नेह से लेकर खुशी की ओर विस्तारित है। प्यार एक मजबूत आकर्षण है। निजी जुड़ाव की भावना है। प्यार को दया, भावना और स्नेह प्रस्तुत करने का तरीका भी माना जा सकता है। स्वयं के प्रति या किसी जानवर के प्रति या किसी व्यक्ति के प्रति स्नेहपूर्वक कार्य करने या जताने को प्यार कह सकते हैं। कहते हैं कि अगर प्यार होता है तो हमारी ज़िंदगी बदल जाती हैं। और तुमने मेरी ज़िंदगी बदल दिया है शुभा।’
कई घंटे से राम-जानकी मंदिर के पीछे छायेदार इमली के पेड़ के नीचे बैठे शुभा और चंदन अपने-अपने ढंग से प्यार को परिभाषित कर रहे थे। दोनों एक आदर्श प्यार को परिभाषित करते हुए अपने-आप को तुच्छ प्रेमी सिद्ध करने पर लगे थे। जनवरी का पहला रविवार इनके लिए कुछ विचित्र ही था। दोनों एक-दूसरे को बहुत पहले से नहीं जानते थे, पर थे एक ही गाँव के। अब दोनों का परिवार शहर में आकर बस गया है। अब परिचय हुआ तो एक-दूसरे के अंतर में बस गए। बस ऐसे गए कि ‘भरे भौन’ से तो अनाकर्षण का उदाहरण बनते, परन्तु पल का भी एकांत मिलने पर एक-दूसरे में लीन हो जाना चाहते। घंटों आलिंगनबद्ध होकर बैठे रहना उनके प्रीत-मिलन की सबसे प्रिय झाँकी होती।
आज दोनों ने मंदिर जाने की योजना बनाई। निकले तो अकेले, मगर शहर के उŸारी छोर पर आने के लिए साथ हो गए। मंदिर का प्रांगण बहुत ही षांत और सुरम्य है। अगर इसकी वास्तु-कला का आकलन करें तो बहुत ही साधारण है। पूरब से पश्चिम की ओर दो मंदिर। सबसे पूरब के मंदिर में भगवान का शिवलिंग स्थापित है। दोनों बचपन में अपनी माताओं के साथ आते थे। महाशिवरात्रि के दिन विराट मेला लगता था। दोनों ने शिवलिंग पर अपनी माताओं के साथ जल चढ़ाया है। हाँ, पूरब के षिव मंदिर के बाद पश्चिम की ओर एक गहरा कुँआ है। जगत भी कोई खास ऊँचा नहीं है। कुँए के चारों ओर हमेशा पानी गिरने के कारण फिसलने का डर रहता है। सभी बड़ी ही सावधानी से आगे बढ़ गए। अब है राम-जानकी मंदिर। सबसे बड़ा। सबसे भव्य। मंदिर के नीचे तहखाना है। मंदिर के चारों ओर आँवले के कई पेड़ हैं। साथ ही गुलदाउदी के पेड़। करैन के भी कई पेड़ हैं। पीपल के भी। मंदिर के पीछे फूलों-फलों का बाग है। मंदिर के पश्चिम से होकर दक्षिण की ओर एक विस्तृत तालाब है। उसी तालाब के किनारे यह विशाल इमली का पेड़ है, जिसके नीचे शुभा और चंदन बैठे हैं। इसे बैठना कम और एक-दूसरे में खोना अधिक कहेंगे।
षायद तोते के कुतरने के कारण ऊपर से एक इमली गिरी। चंदन के सिर पर। शुभा ने उठाया और साफ करके मुँह में डाल ली। वह कच्ची इमली जैसे ही दाँतों के बीच में आयी, बालों से झाँकती शुभा की दाहिनी आँख बंद हो गई। जैसे तालाब में एक चंचल मछली उछल कर अपना अस्तित्व बता गई हो। जैसे इमली की डाल पर कोयल कूक कर अपने संगीत का जादू चढ़ा गई हो। जैसे एकाएक आरती प्रारंभ हो गया हो तथा मंदिर की अनगिनत घंटियाँ एक लय में बज उठी हों। जैसे थाल में रखी हुई फूल की पंखुड़ियाँ एकाएक उड़ गई हों। जैसे चारों ओर कुछ विचित्र सुन्दरता फैल गई हो। ….. चंदन ने शुभा को बाँहों में खींचना चाहा, मगर कई लोग आते दिखाई दिए। वह सहज हो गया। शुभा भी इस समय चाह रही थी कि चंदन उसे पकड़ ले। भर ले। कस ले। छोड़े नहीं।
शिव मंदिर से भांग-धतूरे और मंदार-पुष्प की गंध आ रही थी। दिन विदा होने के मूड में दिखा। दोनों उठे। मंदिर से होते हुए सड़क पर आने लगे। शुभा ने छेड़ा, – तुम प्यार करते हो तो दुनिया से डरते क्यों हो? क्या यही प्यार है?
‘तुम्हारे वजह से डरता हूँ शुभा! …. यह दुनिया लड़कों को कुछ नहीं कहती, लड़कियों के लिए हजार बातें होती हैं। अगर समाज ने अंगुली उठाना प्रारंभ कर दिया तो तुम्हारी दोनों छोटी बहनों के लिए परेशानी बढ़ जाएगी। मैं न राम हूँ न कृश्ण, मैं एक साधारण सा इनसान हूँ यार। तुममे हिम्मत है, साहस है। तुम एक आदर्श लड़की हो, मैं तुमसे तुलना नहीं कर सकता अपनी।’
दोनों घर की ओर चल पड़े थे। दोनों अपने-अपने तर्क से सामने वाले की महानता बता रहे थे। दोनों में अपनी नीचता समझ आ रही थी। दोनों पर न ढलते शाम का असर था और न आस-पास की प्रकृति का। न गन्ना ले जाती ट्रालियों का, न ट्रैक्टर की फट-फट आवाज का। न सड़क के किनारे थुथुने सटाकर चलती सुअरों का और न गन्ने लदी बैलगाड़ियों का। शुभा ने कहा, – ‘वास्तव में तुम एक महान व्यक्ति हो चंदन। तुम्हें मेरे मान-सम्मान की, मेरी बहनों की कितनी चिंता है। मैं तो इतना सोच ही नहीं पाती। ………… सच बताऊँ तो तुमसे दूर भी नहीं रह पाऊँगी। देखो न, कितना अद्भुत होता है न प्यार। जब हो जाये तब चैन नहीं और ना हो तो बेचैन मन में हजारों ख्याल। हो गया तो समझना मुश्किल और ना हो तो प्यार के बिना भी कोई जीना है साहेब?’
‘तभी तो इसे ईष्वर का अद्भुत रूप कहा गया है। जानती हो, कई लोग इसे भावनात्मक और सामाजिक ताना-बाना समझते हैं। चिकित्सा-विज्ञान की दुनिया में प्यार एक न्यूरोलाॅजिकल स्थिति है। शरीर में कुछ हार्मोन्स और केमिकल्स का काॅकटेल व्यक्ति को प्यार की राह पर ले जाता है। विज्ञान से अलग, कई बार प्यार को एक रोग भी मान लिया जाता है, लेकिन यह एक केमिस्ट्री है मैडम। इस प्यार को समझना बेहद दिलचस्प है।’
‘क्या बात है! तो अपनी केमिस्ट्री कैसी है चंदन?’
‘प्योर एण्ड प्रूव्ड।’
‘पर कहते हैं कि आकषर्ण प्यार का दूसरा पड़ाव है। आकर्शण एक अद्भुत भावनात्मक स्थिति है। इस पड़ाव पर आकर व्यक्ति लालसा और मोह से आगे सोचने लगता है। मुझमे तो ऐसी कोई बात है नहीं। तुमने क्या देखा चंदन?’
‘यह भी तो जानती हो न कि इस आकर्षण से मुख्य न्यूरोट्रांसमीटर्स जुड़े होते हैं। इनमे से कोई भी आकर्षण समझ लो। ……. और फिर भी समझ में ना आये तो एक बार अपने-आप को मेरी आँखों से देख लेना शुभा। तब पता चल जाएगा कि तुम किसती सुन्दर हो।’
शुभा का चेहरा रक्तिम हो गया। उस हया की लाली से ढलता सूरज भी फिका लगने लगा। सहज होते हुए बोली, – ‘तुम कम हो क्या? पता है, जब अपनी पहली मुलाकात हुई थी, तब तो महिनों तक मुझे नींद नहीं आती थी। भूख नहीं लगता था। किसी और काम में मन लगता ही नहीं था। मैं अजीब हरकत करती थी। कई बार पता नहीं क्या-क्या सोचकर यूँ ही हँसने लगती थी और कई बार तो रोने का मन करता था।’
‘प्यार करने वाले लोगों में अक्सर डोपामाइन की वजह से ऐसा होता है। जानती हो शुभा, यह डोपामाइन एक ऐसी स्थिति है जिसमें आदमी जानता है कि यह गलत है, फिर भी वही करता है। दिमाग का भ्रम। ……….. सब जानते हुए भी तुमने इस प्यार की बीमारी को पाल लिया?’
शुभा की आँखें बड़ी हो गईं। वह मान करने का नाटक करने लगी। वह तब भी उतनी ही प्यारी लग रही थी। जिस छेड़खानी के साथ चंदन ने कहा था, शुभा ने भी वैसे ही कहा, – ‘मुझे भी पता है कि हमारे दिमाग को स्थिर, खुश और संतुष्ट रखने के लिए हमें सेरोटोनिन की जरूरत पड़ती है। यह प्यार की स्थिति से जुड़ा सबसे अहम केमिकल है। व्यक्ति के विचारों में उसके प्यार का समाते जाना इसी केमिकल की वजह से होता है। मेरे दिमाग में इस केमिकल का अधिक लोचा गया था, सो तुम पर लुट पड़ी।’
आसमान से कोहरे की रजाई उतरनी शुरू हो गई थी। शहर पहुँचते ही सड़कें रोशनी में नहाने लगी थीं। दोनों घर पहुँचे और घंटों कही खोए रहे। इन दोनों का प्यार कुछ अलग था। कई बार तो देखने-जाननेवाला शर्तिया तौर पर कह ही नहीं सकता कि प्यार है। कई बार तो अंधा भी अनुभव कर सकता है कि यह शुभा और चंदन का प्यार है। प्यार कितना अजीब होता है न! कहते हैं कि प्यार एक गहरा और खुशनुमा एहसास है। जब किसी से प्यार होने लगता है तो रिश्ते की षुरूआत में हम केवल सकारात्मक चीजें ही देखते हैं। स्वयं को सातवें आसमान में पाते हैं। वह एहसास इतना गहरा होता है कि यदि हमें उस व्यक्ति से बदले में उतना ही प्यार न मिले तो काफी दुःख पहुँचता है। यह भी सही है कि प्यार पर भी देशकाल और वातावरण का प्रभाव पड़ता है। उसी देश-काल और वातावरण से प्रभावित होकर शुरूआती दिनों के प्यार का एहसास बदलने लगता है।
कोई लाख बातें कह ले, असंख्य कल्पना की उड़ान भर ले, मगर प्यार तो अलग-अलग चरणों में विकसित होता है। चिकित्सा-विज्ञान हो या समाजशास्त्र, व्यक्तिगत अनुभव हो या व्यावहारिक विश्लेषण, सबसे पता चलता है कि प्यार की अनेक अवस्थाएँ होती हैं। कहते हैं कि प्यार में पहले शारीरिक आकर्षण का दीवानापन होता है, फिर स्वप्नलोक, फिर मजबूत लगाव और उसके बाद गहरा प्यार होता है। वही गहरा प्यार तो अक्सर उम्र भर रहता है। शुभा-चंदन का प्यार अब अंतिम पड़ाव पर आ गया था। दोनों के लिए किसी मर्यादा का भय नहीं था। किसी बंधन की वेदना नहीं थी। किसी संर्घष की बात नहीं थी और ना ही किसी शारीरिक आकर्षण का मतलब।
देश-काल और वातावरण का प्रभाव कहिए या सामाजिक मान्यता, संबंधों की एकरूपता की बात कहिए या वैचारिक परिपक्वता, शुभा और चंदन अब जिम्मेदारियों में व्यस्त हैं। शुभा और चंदन ने पहले ही विचार बना लिया कि हम शादी नहीं करेंगे। किसी प्यार की पराकाष्ठा विवाह तो है नहीं। क्या प्यार को विवाह से अलग नहीं समझा जा सकता? प्यार में साथ रहना, साथ जीना, साथ सोना ही तो आवश्यक नहीं?
बात जो भी हो, शुभा को जब भी समय मिलता, किसी-न-किसी बहाने चंदन के यहाँ आ जाती। प्यार मोह से ऊपर हो गया था। एक बार चंदन की भाभी नहीं थीं। मम्मी-पापा को एक पारिवारिक कार्यक्रम में सम्मिलित होने शहर से बाहर जाना पड़ा था। चंदन को चाय तक बनाने नहीं आता था। शुभा को पता चला और भोर फूटते ही चंदन के यहाँ आ गई। वह अभी बिस्तर में ही था। आवेश में शुभा को भी खींच लिया। भी आ गई। उसे भी अच्छा लगा। परन्तु चंदन को दूसरे ही पल लगा कि अब इसके आगे सबकुछ गलत हो सकता है। वह उठकर ब्रश करने चला गया। शुभा को कुछ अजीब नहीं लगा। अपने संबंधों के इन चार सालों में वह चंदन को अच्छी तरह से समझ गई थी। चंदन कभी भी उसके साथ कुछ अप्रत्याशित नहीं कर सकता है। चंदन के लिए प्यार पूजा है। वह पूजा, जिसके लिए व्रत, त्याग, तपस्या के साथ ही सानिध्य और समर्पण तो होता है, परन्तु न प्रदर्शन की मान्यता है और न स्वार्थ की संकीर्णता। चंदन का चले तो वह हमेशा शुभा को अपनी बाँहों में जकड़ा रहे। वह भी निश्चिंत होकर स्वयं को छोड़ सकती है।
चंदन और शुभा का प्यार भले ही शारीरिक आकर्षण से ही प्रारंभ हुआ था, मगर अब नितांत आंतरिक हो गया था। अब शरीर के उस आकर्षण के लिए पूजा का भाव था। उनके लिए शरीर भोग के लिए नहीं है। वे रोज मिलने के बाद भी, शारीरिक संबंधों के पक्ष में नहीं थे। उस पर कभी चर्चा भी नहीं हुई। कभी अनुभव ही न हुआ। वे एक-दूसरे के मनोभाव समझते थे, तभी तो शुभा बेहिचक कभी भी चंदन के पास आ जाती थी। रात हो या दोपहर। मिलते ही दोनों एक-दूसरे को कस कर जकड़ लेते और फिर जैसे एक-दूसरे की अनुभूतियाँ एक-दूसरे में समाहित हो जातीं। वे मिलने पर भी एक-दूसरे से कम बातें करते। अनुभव अधिक करते। नहीं मिलने पर भी वहीं हाल था। दोनों एक-दूसरे के भाव को अच्छी तरह से अनुभव कर लेते।
कई बार समय और स्थिति के आधार पर प्यार को भी परिभाषित किया गया है। विद्वानों ने अपने-अपने तर्क से प्यार को परिभाषित किया है। कई विद्वान मनुष्य के बीच के प्यार को पारस्पारिक प्यार कहते हैं। उनके अनुसार प्यार एक शक्तिशाली भाव है। जिस प्यार के भावनाओं का विनिमय नहीं किया जाता उसे वास्तविक प्यार कहते हैं। ऐसा प्यार परिवार के सदस्यों, दोस्तों और प्रेमियों के बीच पाया जाता हैं। पारस्पारिक रिश्ता दो मनुष्य के साथ मजबूत, गहरा और निकट सहयोग होता है। ऐसा रिश्ता अनुमान, एकजुटता, नियमित व्यापार, बातचीत या सामाजिक प्रतिबंद्धित कारणों से बनता है। ऐसा प्यार सामाजिक, सांस्कृतिक और अन्य कारक से प्रभावित होता है। प्यार समाजिक समूहों और समाज का आधार है और उसी से नियंत्रित भी होता है, प्रभावित भी होता है। प्राचीन ग्रीकों ने चार तरह के प्यार को पहचाना है। उन्होंने रिश्तेदारी, दोस्ती, रोमानी इच्छा और दिव्य प्रेम के रूप में वर्गीकृत किया। प्यार को अकसर वासना के साथ तुलना की जाती है और पारस्परिक संबध के तौर पर रोमानी अधिस्वर के साथ तुला जाता है। प्यार को पक्की दोस्ती से भी तुला जाता हैं। आम तौर पर प्यार शुभा और चंदन का वह एहसास है जो एक इंसान दूसरे इंसान के प्रति महसूस करता है।
हेलेन फिशर प्यार की प्रमुख विशेषज्ञ हैं। उन्होनें प्यार के तजुर्बे को तीन हिस्सों में विभाजन किया हैं। उनकी दृष्टि में हवस, आकर्षण, आसक्ति प्यार के भाग हैं। हवस यौन इच्छा होती है। रोमानी-आकर्षण निर्धारित करती है कि आपके साथी में आपको क्या आकर्षित करता है। आसक्ति में घर बाँट के जीना, माँ-बाप का कर्तव्य, आपसी रक्षा और सुरक्षा की भावना शामिल है।
मनोविज्ञानी रोबेर्ट स्टर्नबर्ग ने प्यार के त्रिभुजाकार सिद्धांत को सूत्रबद्ध किया हैं। उन्होंने तर्क किया के प्यार के तीन भिन्न प्रकार के घटक हैं। आत्मीयता, प्रतिबद्धता और जोश। आत्मीयता वह तत्व है जिसमें दो मनुष्य अपने आत्मविश्वास और अपनी जिंदगी के व्यक्तिगत विवरण को बाँटते हैं। ऐसा हाल ज्यादातर दोस्ती और रोमानी कार्य में देखने को मिलता है।
प्रतिबद्धता एक उम्मीद है कि प्यार का रिश्ता हमेशा के लिये कायम रहेगा। आखिर में यौन आकर्षण और जोश है। आवेशपूर्ण प्यार, रोमानी प्यार और आसक्ति में दिखाया गया है। प्यार के लिए पसंद करने में आत्मीयता शामिल होती हैं। मुग्ध प्यार में सिर्फ जोश शामिल होता हैं। रोमानी प्यार में दोनों। साथी के प्यार में आत्मीयता और प्रतिबद्धता शामिल होता हैं। बुद्धिहीन प्यार में प्रतिबद्धता और जोश शामिल हैं। लगता था कि शुभा और चंदन का प्यार इन सबसे कुछ अलग था। प्यार के दर्शन एक सामाजिक दर्शन और आचार का क्षेत्र है जो हमें प्यार के स्वपरूप बताते हैं। वास्तव में षुभा और चंदन का प्यार कुछ अलग था। प्यार की परिभाषाओं से भिन्न। दोनों के लिए दोनों का परिवार अपना था। वे एक-दूसरे की सारी पीड़ा को समझते थे। उन दोनों का बंधन, दोनों की जिम्मेदारी अपनी थी।
शुभा ने समझाया तो माँ के उपचार की व्यवस्था में चंदन ट्यूशन पढ़ाने लगा। सुबह में सूर्य के किरण की तंद्रा अभी नहीं टूटी होती मगर चंदन नहा-धोकर तैयार हो जाता। वृद्धा माँ का शरीर साथ न देता पर भाभी बिस्तर नहीं छोड़ना चाहती। एक गिलास पानी पीकर घर से निकलना उसकी दिनचर्या हो गई थी। उसे जीवन में पैसे जरूरत अनुभव होने लगी थी। धीरे-धीरे माँ के उपचार की अधिक जरूरत पड़ने लगी और वह भी स्वयं को व्यस्त करने लगा। ट्यूशन के बाद एक विद्यालय में भी पढ़ाने लगा। सुबह का निकला चंदन रात में ही घर पहुँचता। जो मिल जाता वही ऊपर वाले की कृपा समझकर खा लेता। कई बार तो आने पर पता चलता कि घर में सब खा-पीकर सो गए हैं। मम्मी जागती। खाने के लिए कहती पर स्थिति देखकर चंदन ही बोल पड़ता, – ‘अरे आज एक पार्टी थी न, वहीं से खाकर आया हूँ।’
शुभा चाहती तो रोज खाना दे जा सकती थी, मगर चंदन ने मना कर दिया। प्यार में इस प्रकार का व्यवहार निष्ठा पर बट्टा हो जाता है। वे किसी भी हाल में घर-परिवार और समाज के साथ ही अपने प्यार पर भी बट्टा नहीं लगने देना चाहते थे। इन्हीं आदर्शों के कारण दोनों एक-दूसरे से विवाह नहीं करने का प्रण कर चुके थे। शुभा का तो जिद्द था, – ‘मन का समर्पण किसी और के साथ और तन का समर्पण किसी और के साथ कैसे हो सकता है चंदन? क्या ऐसा करना तीन-तीन जिंदगियों के साथ विश्वासघात नहीं होगा? प्यार तो विश्वास है न, तो इससे घात का प्रत्यय कैसे जोड़ा जाए?’
‘हम स्वार्थी कैसे हो सकते हैं शुभा? मेरा क्या? मैं तो अपने परिवार में छोटा हूँ, पर तुम्हारी तीन-तीन बहनें हैं। शुभा दुनिया लाख आदर्शवादी बन ले, परन्तु आज भी अपने मध्यमवर्गीय समाज में प्रेम-विवाह अछूत ही माना जाता है। सोचो, तब तुम्हारी बहनों के साथ क्या होगा? ……. हमें भी अपने इसी समाज में रहना है।’
‘तो ठीक है, मैं विवाह ही नहीं करूँगी। जब बहनों का विवाह हो जाएगा तब तो कोई बंधन नहीं रहेगा न?’
‘हो किस दुनिया में? अपनी जिंदगी फिल्मी नहीं है। तब तुम्हारे पापा से सौ सवाल किया जाएगा – बड़ी की शादी क्यों नहीं हुई? कोई कमी है? कोई दूसरा चक्कर तो नहीं? …… तब तुम अपनी बहनों के साथ माँ-बाप के लिए भी बोझ हो जाओगी।’
‘तो ऐसा प्यार हम करते क्यों हैं?’
‘हम करते नहीं, हो जाता है। केमिकल लोचा जो है।’
आज दस साल हो गया शुभा का विवाह हुए। उसके दो बच्चे हैं। बेटा सात साल का और बेटी पाँच की। इन दस सालों में भी दोनों जब भी मिलते, लगता कि कुछ बदला ही नहीं। हाँ, अब दोनों शारीरिक रूप से भी दूरी बनाए रहते। आज षुभा चंदन के घर अपने दोनों बच्चों के साथ आयी है। चंदन की पत्नी से मिलने। दो माह पहले ही चंदन की शादी हुई है। वह भी शुभा के सौ समझाने पर।
चंदन की भाभी ने व्यंग्यात्मक रूप से राधा का परिचय शुभा से करवाया। चंदन अपनी पत्नी राधा को पहले ही उसके विषय में बता चुका था। राधा स्वयं भी बहुत बुद्धिमती है। उसने किसी भी प्रकार से अन्यथा नहीं लिया। बातें पहले की दिनचर्या की होने लगी। चंदन अपनी पत्नी से बता रहा था, – ‘अब तो उसकी आदत ही लग गई है सुबह उठने की। पहले भी सुबह उठकर ट्यूशन जाने के लिए तैयार हो जाता। अभी जब लोग सोए रहते, तभी सुबह का नाश्ता कर के निकल जाता। ……. तुम तो जानती ही हो शुभा कि तब घर तीन-चार बार केवल खाने के लिए ही आता, बाकी तो बाहर की ही दुनिया अपनी थी।’
शुभा रोक नहीं पायी, – ‘हाँ-हाँ। तुम्हारे विषय में तो इतना जानती हूँ कि एक शोध-पत्र लिख सकती हूँ।’ अपने आप से बोली, – ‘अपने प्यार का शोध-पत्र। ……..’
अब शुभा खुल चुकी थी तथा राधा से चंदन को सुख देने वाली सारी बातें बता देना चाहती थी। चंदन चुपचाप सुनता रहा और अपने उस जीवनपर्यंत चलने वाले प्यार पर गर्व करता रहा।
………………..
– केशव मोहन पाण्डेय

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