प्यार की चाहत

सविता दिखने में बहुत सामान्य थी और उसके पति रवि हर प्रकार से आकर्षक। आई टी प्रोफेशनल होने के कारण व्यक्तित्व और वेतन, दोनों आकर्षक था। रवि के पास सबकुछ होने के बाद भी समय का अभाव था। रवि की दिनचर्या भाग-दौड़ की थी। परिवार को व्यक्तित्व और वेतन से अधिक समय की इच्छा होती है। रवि के इस जीवन से सविता ने अनुभव किया कि ‘वह उसे प्यार नहीं करता। हो न हो, उसकी ज़िन्दगी में कोई और आ गयी हो?’ …. यह सोचकर ही सविता काँप जाती।
सविता अथक पति की सेवा में लगी रहती। जैसे रवि की धड़कनों तक इच्छाओं को समझने लगी हो। किसी फिल्म से पता चला कि जूठा खाने-पिने से प्यार बढ़ता है। अब वह मग में भरकर चाय लाती। यह देख रवि झुँझलाता, सुनाता और अपनी इच्छा भर पीकर बाकी चाय छोड़ देता। समय पाकर सविता जैसे अपने ईश्वर का प्रसाद समझ कर पी लेती।
कई बार तो रवि पूरा पी जाता। तब सविता अपनी जिह्वा निकालकर देर तक मग लटकाये रहती और किसी तरह एक बूँद टपका ही लेती।
ऑफिस जाने की जल्दी में रवि ने चाय की दो-तीन चुस्की ली और वॉशरूम में चला गया। जब वहाँ निकला तो देखा कि सविता उसकी जूठन चाय पी रही है। कुछ समझ नहीं पाया। अब वह जब भी चाय पीता तो वॉशरूम जाता और हमेशा छुपकर देखता। सविता हमेशा उसकी जूठन पीती।
अब रवि ने हिदायत दे दिया कि मग में ही चाय मिलनी चाहिए और वह भी पूरी। अब उसे सविता का जूठन पीना समझ में आ गया था। समझ में आ गया था कि सविता चाहती क्या है।
….. वही सिलसिला आज भी जारी है। रवि हमेशा ही आधी चाय पीता है और वॉशरूम जाता है और वहाँ से अपनी सविता को, उसके प्यार को देखता है।
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केशव मोहन पाण्डेय

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