बस मुड़ गई

आँख खुली तो खिड़की से देखा, सड़क के दोनों तरफ ऊँची-ऊँची पहाड़ियाँ, उलझे-सुलझे नाले, छोटी-बड़ी झाड़ियाँ। झाड़ियों में खिले रंग-बिरंगे फूल, मानों प्रकृति-रानी के वस्त्र के बेल-बूटे हों। नालों में उछलता-कूदता पानी अपनी मस्ती में मग्न था। उसपर सूर्य की पहली किरण आकर वियोग के बाद का प्यार बरसा रही थी।
मेरे लिए यह दृश्य पहला था। घूमने का अनुभव पहला था। इतनी लंबी यात्रा पहली थी। शायद इसीलिए मुझे यह सब स्वर्गिक सुख सा लग रहा था। नहीं तो यहाँ के लोगों के लिए तो यह क्षेत्र नरक से भी बढ़कर है। क्यों न हो? इन्हीं क्षेत्रों के खूनी समाचारों से ही तो रोज अखबारों के पन्ने रंगे होते हैं।
सड़क के दाएँ-बाएँ एक-दो झोपड़ियाँ थीं। धूप छप्पर फाड़कर आंगन में सुबह होने का ‘अलार्म’ बजा रही थी, परन्तु षायद भय के ही कारण लोग घर से बाहर नहीं निकल रहे थे। यहाँ की प्राकृतिक सुन्दरता और वर्तमान स्थिति को देखकर मेरे समझ में नहीं आ रहा था कि मौत इतनी सुन्दर होती है या कि सुन्दरता का ही दूसरा नाम मौत है?
हवाओं की ताजगी और प्रकृति के यौवन का उन्माद, सब कुछ मुझे उन्मादित किए जा रहा था। बगल की सीट पर बैठे दीपक से मैं बार-बार कहता, – ‘‘ये देखो पहाड़ी, वह देखो बकरियों का झूण्ड, बकरी चराती ग्रामीण बालाओं का खेल, यह किलकारी करती नदी, वह लहराता-मुस्कुराता चाय-बागान।’’
गाँव से इसी सुन्दरता के दर्शन की आकांक्षा से ही तो मैं जा रहा था। भले ही यह बारात थी, मगर मैं तो प्रकृति के सौंदर्य से साक्षात्कार करने जा रहा था। मुझे लगता था कि विश्व की समूची शोभा यहीं सिमट गई है। . . . . . दो दिन की बस यात्रा से समूचे बदन में दर्द हो रहा था। मन मरीज सा हो गया था। शरीर में एक अलग तरह की ऐंठन हो रही थी। कलाई पर नजर गई तो घड़ी में सुबह का साढ़े नौ हो रहा था। मेरे होठों पर हँसी ने दस्तक दिया। इस समय तक मैं विद्यालय पहुँच चुका होता हूँ। शुक्र है कि जून में विद्यालय बंद रहता है, वरना यह यात्रा भी नसीब न होती।
उधर दरवाजे से लोग टाट हटाकर अब बाहर निकल रहे थे। कितने सुन्दर लोग हैं! रूप-रंग, नयन-नक्श, चाल-ढाल, सब कुछ कितना सुन्दर है इनका। . . . . . इन्हीं सरल लोगों में कोई इतना क्रूर भी होता है कि आदमी का ही खून कर देता है? . . . खून पीने के लिए हरदम आतुर रहता है? – मैं इसी सोच में खोया हुआ था।
इन पहाड़ियों में कुछ दूर तक खुली जगह थी। बीस-पच्चीस दुकानें थीं। बस रूकी, सभी उतरे। टहले, चाय पीये। मैंने सुना था कि यहाँ का मछली-चावल प्रसिद्ध है। सोचा, भोजन का समय है ही, दीपक का भी विचार था, हम दोनों मछली-चावल का स्वाद लेने चल दिए। एक दुकान में दाखिल होकर ‘आॅर्डर’ दिए। एक बुढ़िया ने आकर गिलास और पानी रखा। कुछ क्षण बाद एक युवती, सुन्दर कपड़ों में सजी, दोनों हाथ में मछली-चावल की दो प्लेटें लिए आयी और रखकर चली गई। . . . . . वह लड़की बहुत ही खूबसूरत थी। उसकी सुन्दरता ने एक ही क्षण में यात्रा के सारे थकान को परास्त कर दिया। अब मैं किसी न किसी बहाने उसे बुलाना चाह रहा था। एक बार तेज आवाज में बोला, – ‘प्याज है?’
जब वह लड़की प्याज के कुछ टुकड़े लेकर निकली, तभी दीपक मुझसे कह रहा था – ‘कितनी अच्छी जगह है यह! . . . . . यहाँ की प्रकृति कितनी अच्छी है! . . . . . यहाँ के लोग कितने अच्छे हैं!’
मानो मुझे मुँह मांगी मुराद मिल गई। मैं उस लड़की की ओर तिरछी नजर से देखते हुए बोला, – ‘सबसे ज्यादे खतरनाक भी तो यहीं के लोग हैं।’
व्यक्ति को सबसे अधिक गर्व अपने देश, गाँव और घर पर होता है। शायद इसी वजह से वह लड़की तपाक् से बोली, – ‘क्या?’
मैंने बात बनाते हुए पूछा, – ‘तुम्हें यहाँ कैसा लगता है?’
वह बोली, – ‘अपनी माँ और अपनी मिट्टी किसे अच्छी नहीं लगती है?’
उसके इस प्रश्नयुक्त जवाब से मेरा रोम-रोम झंकृत हो गया। मैं उससे और बातें करना चाहता था। – ‘ बहुत अच्छी बातें करती हो। . . . . .क्या नाम है तुम्हारा?’
‘जी, . . . सलोनी।’ और लजाकर भाग गई। मैं अब उसे दूबारा बुलाने का बहाना ढूँढने लगा। गिलास का पानी नीचे गिराकर बोला, – ‘सलोनी! . . . . पानी लाना।’
सलोनी एक गिलास पानी लाई और बैठ गई। शायद वह मेरी नियत जान गई थी। मैं सबसे नजर चुराकर उसे देखना चाह रहा था। वह भी मुझे देखने लगी। नजर मिली, हम दोनों मुस्कुरा दिए। उसकी गौर वर्णा चेहरे पर दूधियाँ दाँतें चमक उठीं। मैंने पूछा, – ‘किससे दाँत साफ करती हो? . . . . इतने सुन्दर दाँत पहली बार देख रहा हूँ।’
‘जी, . . . . दातून से।’ – खिलखिलाती भाग गई।
मन की भावनाओं से बँध जाने के बाद अजनबी भी वर्शों का साथी लगने लगता है। उस दो पल में ही सलोनी मेरे रग-रग में बस गई थी। अब मुझे वहाँ से जाने का मन नहीं कर रहा था। आँखें हमेशा उसे देखने को आतुर थीं।
मैं चलते बस में से भी उसे देखने लगा। वह भी दुकान से निकलकर मुझे ही देख रही थी। मैंने विदा के लिए अपना हाथ हिलाया तो वह भी अपना हाथ धीरे-धीरे हिलाने लगी। पहाड़ी शुरू होने के कारण बस दूसरे तरफ मुड़ गई।
मैं रात भर विवाह समारोह में रहने के बावजूद भी अपने-आप को हरदम सलोनी के दुकान में ही पाता रहा। उसकी काली, बड़ी-बड़ी चंचल आँखें, उसका आकर्षक यौवन, उसका सलोना रूप, उसकी बातें -‘अपनी माँ और अपनी मिट्टी किसे अच्छी नहीं लगती है?’ . . . . . सब कुछ मुझे बेचैन किए रहा। सलोनी के रूप में वह जादू था, जिसके कारण पहली बार ही देखने के बाद मैं उसपर अपना जीवन हार गया था। वह सिर्फ आकर्षण नहीं था, प्यार था।
बस का ड्राइवर और मैं एक ही साथ कई बार चाय पीये, पान खाए थे। वह मेरे मित्र जैसा हो गया था, भले उम्र में दोगुने का अंतर था। जब मैंने अपने मन की बात उससे बताई तब कहने लगा, – ‘यहाँ के कुलीन लोग तो चाहते हैं कि कोई परदेशी उनकी लड़कियों से षादी कर ले, ताकि वे तो चैन से रहेंगी। . . . एक बात बताऊँ? . . . . मैं बस लेकर इधर हमेशा आता रहता हूँ। मैं जानता हूँ कि यहाँ के अधिकांश के लोगों का चरित्र, व्यवहार और मन, बहुत ही अच्छा है।’
अब क्या था! . . . मैं सलोनी के साथ शादी के सपने देखने लगा। मैं बेचैन हो गया। कब बस चले, और मैं उसे लेकर घर चला जाऊँ? . . . . दोनों समाजों को तो मना लूँगा। . . . . युवा मन का नवीन प्यार के मधुर स्वप्नों में खोने लगा। . . . . विजय की निश्चितता होने पर आदमी उतावला हो जाता है। मैं भी हो गया था।
सुबह बस चलने को हुई। मैं बहुत ही प्रसन्न था। ड्राइवर मित्र था ही। उसे किसी-न-किसी बहाने वहाँ बस रोकने के लिए तैयार कर लिया था। सड़क पर बस दौड़ रही थी। मेरी व्यग्रता बढ़ती जा रही थी। अब पुनः वह हरियाली में नहायी पहाड़ी शुरू हो रही थी। मैंने उस पहाड़ी को दूर से ही देखा, जहाँ से बस मुड़ती थी, तो खुशी से आँखें बंद कर लिया। – ‘अब बस मुड़ी, . . . . . अब बस मुड़ी . . .’ तभी बस का ब्रेक लगा। मेरी आँखें खुलीं तो खुलीं रह गईं। उन दुकानों में आग लगी हुई थी। पुलिस के लोग आग बुझा रहे थे। कुछ लोग चिल्ला रहे थे। बस की सभी सवारियों की जाँच के लिए पुलिस ने नीचे उतारा। मैंने आश्चर्य और प्रश्न भरी नजरों से ड्राइवर को देखा और हम दोनों उधर चल दिए। पता चला कि उग्रवादियों ने सुबह इक्कीस लोगों की हत्या कर दी तथा दुकानों में आग लगा दिया। लोगों का शव कपड़े से ढका किनारे पड़ा था। मैं दौड़कर गया और सबका चेहरा देखने लगा।
‘यह बुढ़िया का शव है। . . . . . . . .और यह? . . . . .’
इसके आगे मुझसे और कुछ कहा नहीं गया। चला नहीं गया। मैं गिर पड़ा। मैं हिम्मत हार चुका था। मेरे पैरों को लकवा मार गया था। मेरे मन की सारी इच्छाएँ इन सुन्दर पहाड़ियों की भयानक खायी में दफन हो गई थीं। वह दूसरा शव सलोनी का था।
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– केशव मोहन पाण्डेय

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