बार-बार ढूँढता हूँ

माँ
पैबंद जोड़ती थी
रिश्तों में
पिता
अनुबंध जीते थे
किश्तों में
और दोनों मिलकर
सपनों को
पालते रहे
सिंचते रहे
सजोते रहे
और जीवंत करने के लिए सपने
मारते रहे मन
पालते रहे
संतति-धन।
माँ
जीवन-पर्यन्त
आस पिरोती रही
आँखों का मोती संभाल कर
साँसों के धागे में
ले उम्मीदों की सुई
और जीती रही
बन के
छुईमुई।
पिता
संस्कार बोते थे
समरसता की जमीन पर
निष्ठा की कुदाल से
काट-काट
बोझिल कुंठा को।
मैं भी तो
परिणाम हूँ
उन दोनों की खेती का
और आज भी
बार-बार ढूँढता हूँ
दोनों को स्वयं में।
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— केशव मोहन पाण्डेय

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