पग-बाधा

आज अपार ने सोशल साइट पर एक पोस्ट देखा, – ‘पहले बाल-विवाह होता था अब बाल-प्रेम होता है।’ पोस्ट एक समूह के एडमिन द्वारा किया गया था। अपार साहित्य का विद्यार्थी था। साहित्य से अनुराग था। पढ़ता तो था ही, लिखने का भी शौक पकड़ा था। जब उससे उसकी मित्र-मंडली या साहित्य प्रेमी उसकी लेखनी की प्रंशसा करता तो बहुत नम्रता से कहता मैं तो अभी सीख रहा हूँ। यह कहते ही उसका सिर झुक जाता। चेहरे पर लज्जा की लाली आ जाती। उस रुप को देखकर प्रमाणतः कहा जा सकता था कि वास्तविक विनम्रता इसे ही कहते हैं।
उस पोस्ट को देखकर अपार की हार्दिक इच्छा हुई कि तुरंत टिप्पणी करें – ‘वास्तविक प्रेम तो बाल-मन का ही होता है न।’ सूरदास की पंक्ति सामने से घूम गई। ‘लरिकाई कौ प्रेम कहौ अलि कैसे भूलत’। पर इच्छा को दबा लिया। वह उस समूह का सदस्य तो था परन्तु समूह के ए़डमिन से व्यक्तिगत परिचय नहीं था, ना ही घनिष्टता थी। इस स्थ्तिि में लगा कि अपरिचितों पर गंभीर प्रतिक्रिया देना उचित न रहेगा। अपार ने अपने अनुसार उचित-अनुचित की सीमा-रेखा बनाकर चुप हो गया मगर उसी समय से उसके मस्तिष्क में कुछ उथल-पुथल होता रहा। उथल-पुथल उस पोस्ट के कारण तो था, पर पोस्ट पर नहीं था। पोस्ट जिस भाव से किया गया था, आज के परिप्रेक्ष्य मे अपार उस भाव को समझ रहा था। आजकल तो आम तौर पर समाचार पत्रांे से लेकर सोशल साइट्स, इलेक्ट्राॅनिक मीडिया आदि सूचना-प्रसारण के माघ्यमों से उसे भी ज्ञात होता है कि आज का टीन-एजर प्रेम संबंधों के विषय में भी अलग विचार रखता है।
अपार को स्पृहा की याद आयी। स्पृहा तेरह-चैदह साल की लड़की है। आठवीं या नौवीं कक्षा की छात्रा है। अपार से लगभग 20 वर्ष छोटी। वह पढ़ने में औसत छात्रा है और उसके माता-पिता चाहते है कि खूब पढे़। माता-पिता से एक बार बात हुई तो लगा कि उन्हें शिक्षा का महŸव पता है। अपार मास्टर करने के बाद नेट का प्रीप्रेशन भी करता है और एक इन्टीट्यूशन में लेगुएज के छात्रों को ग्रामर भी पढ़ाता है। वहीं स्पृहा आती है। साइन्स-मैथ्स के अतिरिक्त ग्रामर भी पढ़ती है। अपार प्रारंभिक कक्षाओं में ही समझ गया था कि यह लड़की पढ़ने में ठीक नहीं है। कमजोर बच्चों से छोटे-छाटे और अघिक प्रश्न पूछने की वह नीति रखता था। उसे लगता था कि शिक्षण में कौशल के प्रयोग से शिक्षण अघिक कारगर होता है। वह अपने किसी भी टाॅपिक पर अघिकतर वास्तविक जीवन सें संबंघित उदाहरण देता था। उसके शिक्षण की यह सबसे खूबी थी। वह अपने प्रत्येक चेप्टर को रियल लाइफ से जोड़कर पढ़ाता था। वह क्रिया से शिक्षण की विधि पर अमल तो करता ही था, लगभग हर चेप्टर पर एक एक्टीविटी अवश्य करवाता था। अपार पेशे से शिक्षक न होकर भी अपनी कल्पनाशीलता और सर्जनात्मक मेघा के दम पर दो-तीन माह में उस इन्स्टीट्यूट का एक लोकप्रिय व सफल कोच हो गया था। सभी बच्चे उसके शिक्षण-शैली से बेहद प्रभावित होते थे। स्पृहा भी। पहले तो हर एक प्रश्न पर अपार द्वारा उसी से प्रश्न पूछना अच्छा नहीं लगता था, मगर अब वह भी मेहनत करने लगी है।
स्पृहा! वह पढ़ने में साघारण-सी बच्ची, अब मेहनत करने लगी थी। उसका मेहनत केवल ग्रामर में ही नहीं, मैथ्स और साइन्स के साथ ही उसके चेहरे पर भी दिखता था। हाँ, अब स्पृहा के दूध से चमकते चेहरे पर आत्मविश्वास का दर्प दिखने लगा था। अब जब वह किसी प्रश्न का उतर देती तो, पता नहीं क्यों, आत्मविश्वास के साथ ही उसके चेहरे पर प्रसन्नता और मुस्कान की रेखा खेलती रहती। किसी भी प्रश्न पर वह चहक कर खड़ी होती मगर पता नहीं क्या अनुभव करके गंभीर हो जाती। तब उस गंभीरता मे उसके नाक का अग्रभाग कुछ रक्तिम हो जाता।
बात तब की है, जब मौसम बदल रहा था। बरसात की विदाई हो रही थी और हवा मे हल्की नमी का आभास होने लगा था। इस बदलते मौसम में दिल्ली की सरकार तक हिलने लगी थी। शहर में अनुराग जैसे कई बच्चों और बड़ों की मृत्यु डेगू के कारण हो गई थी। मृतकों के आत्मीयजन दुखी थे और पूरा षहर डरा हुआ। रोज राजनैतिक आरोप-प्रत्यारोप के बीच सामाजिक चर्चा और फिर पष्चताप व्यक्त रहा था। उन्हीं दुखी अभिभावकों में अनुराग के माता-पिता ने बेटे की मृत्यु होने पर चार मंजिली ईमारत से कूदकर आत्महत्या कर ली थी। इस घटना ने डेगू से और डरा ही दिया था। लोगों में सावधानियों के लिए जागरुक भी कर दिया था। किसी को हल्की छींक भी आने लगती और जुकाम के कारण शरीर का तापमान बढ़ा-सा लगता तो घर और चाहने वाले सभी सशंकित हो जाते। ऐसे मौसम के ही कारण अपार को जुकाम ने जकड़ना प्रारंभ कर दिया था।
आज क्लास लेने पहुँचा ही था कि बच्चो ने उसके चेहरे पर एक नजर डाली, फिर एक-दूसरे को देखे, फिर ठहाका लगाकर हँस पडे़। अपार कुछ असहज हो गया। संभल कर पूछा, – ‘क्या हुआ? आज मैं जोकर बजकर आया हूँ क…..या……आ…….आ छीं।’
अपार के छींकते ही बच्चे शांत हो गए और स्पृहा ने अपनी सफेद धूली हुई हेन्की आगे बढ़ा दी। अपार सहम गया। देखा तो स्पृहा की आखें लज्जा से झुक गईं। कुछ अद्भुत आकर्षण दिखा उस बच्ची के भाव में। बेटियाँ ऐसी ही होती हैं। पर आज तो कुछ और लगा। अपार ने ऐसा व्यवहार किया कि उसका हेन्की बढ़ाना सहज है। लिया और नाक पोंछा। पोंछा तो विक्स की गंध से नाक खुल गया। अपार खुला-खुला अनुभव करने लगा। अब वह समझता तो है, मगर स्पृहा के साथ कभी कुछ ऐसा व्यवहार नहीं करता कि कमजोर पड़ जाए। उस दिन इन्हीं कारणों से अपार ने हेन्की भी वापस नहीं की। अब लाता भी नहीं। स्पृहा में एक परिवर्तन यह दिखता है कि अपार क्लास में किसी से भी कुछ पूछना चाहता तो, पर चहक कर वही उठती और जैसे चारों ओर से लोग कुछ देख रहे हो, ऐसा अनुभव होते ही गंभीर हो जाती। मन का चोर कहिए या जानने की इच्छा, पढ़ाते हुए अपार की नजरें भी एक स्पृहा को देखकर भावनाओं से डंडी मार ही लेता ।
अब स्पृहा कुछ अलग सी लगती है। जैसे चेहरे पर चमक आ गया है। जैसे शरीर पुष्ट होने लगा है। जैसे उसके कपड़े छोटे होने लगे हों। जैसे वह बड़ी होने लगी हो। जैसे आँखों की चंचलता अब शरारत करने लगी हो। जैसे गालों पर लालिमा फिसलती हो। जैसे वह अब बच्ची नहीं रह गई हो। मगर उम्र का असर और अनुभव की गंभीरता कहिए या विचारों का पैनापन और व्यवसाय की मर्यादा, जब अपार ने एक बार क्लास में स्पृहा को बेटी कह के पुकारा, तब शायद उसके पैर के नीचे जमीन ही न बची हो। स्पृहा ही क्यों? स्वयं अपार को भी अजीब लगा था, मगर शिक्षण को चाहे लाख रूप से पेशे का ही शक्ल दिया जाए, आज भी समाज एक शिक्षक में आदर्श गुण ही ढ़ूँढता है। अपार को हार्दिक संतुष्टि हुई। कई अन्य बच्चों ने भी कयास लगाने के साथ काना-फूसी करना प्रारभ कर दिया था। अब सबकी जुबान तालु से चिपकी रह गई। आँखें बड़ी-की-बड़ी रह गईं।
आज जब अपार ने सोशल साइट पर उस पोस्ट को देखा तो स्पृहा का आत्मविश्वास, लज्जा और पराजय वाला चेहरा नजर आया। अपार के समक्ष ग्लानि से सुप्त और प्रसन्नता से दीप्त स्वयं का भी चेहरा नजर आया। नजर आया कि पोस्ट करने वाले ने उसे और स्पृहा को लक्ष्य तो किया नहीं था, हाँ, बहुत हद तक कृष्ण भक्त सूरदास की भावना थी। लरिकाई कौ प्रेम। आज स्पृहा के लरिकाई के निश्छल और पावन प्रेम के साथ अपार की मेच्योर मानसिकता ने घात कर दिया था।
भावनाओं की पावनता हो या वास्तविकता की कसौटी, जब मन बेचारा अपने अधिकार में नहीं रहता तो आदमी को निष्क्रिय कर देता है। उसी निष्क्रियता का परिणाम था या किसी की भावनाओं से घात करने का पाप-बोध, आज अपार पढ़ाने नहीं आया। वह सत्य-निकेतन जाने वाली बस छोड़कर आज आॅटो कर लिया। अब उसे कनाट-प्लेस के हनुमान मंदिर की याद आयी। मंदिर से अधिक मंदिर के सामने ही खोमचे और साइकिल पर बिकने वाली खास्ता कचैड़ी और मोठ की याद आने लगी। पहुँचा भी। खाया भी। एक नहीं, दो प्लेट।
आज सुबह से ही अपार का मन उद्विग्न था। वह अपना लक्ष्य निर्धारित नहीं कर पा रहा था। अनायास ही बाबा खड़ग सिंह मार्ग पर बढ़ गया। हो-हो बस सेन्टर से दायें मुड़कर अंदर गया। आगे दीवार के पास लगे ठेले से चाय लिया। चुस्की शीघ्र ही समाप्त कर के फिर आगे कनाट-प्लेस की ओर बढ़ गया। अब वह सेन्ट्रल पार्क में पहुँच चुका था। लग रहा था कि वह पचास फीट ऊँचा और नब्बे फीट लंबा लहराता तिरंगा उसके सिर पर ही है। उस तिरंगा को देखकर मन थोड़ा हर्षित होने लगा। उसे याद आने लगा कि इसे देश के छियालिसवे मान्यूमेन्ट फ्लैग पोल के रूप में स्थापित किया गया है। यह दिल्ली के इस दिल की शान है। दो सौ सात फीट ऊँचे इस पोल पर लहराते तिरंगे ने कनाट-प्लेस के नज़ारे को और दिलकश कर दिया है। मार्केटिंग करने वालों से लेकर नए जोड़े हों या मित्र-रिश्तेदार, मिलने वाले, समय रहने पर हर कोई यहाँ पर दो-चार घंटे बैठने का सुख ले लेता है। अपार भी बैठ गया और ऊपर लहराते तिरंगे को बड़े चाव से देखने लगा। उसे लगा कि चारों ओर ऊँची-ऊँची इमारतों के बीच में लहराता यह तिरंगा यहाँ के उपस्थित वातावरण को एक अलग की स्वरूप दे रहा है। अपार में इस तिरंगे के कारण हर्ष के साथ अब आत्मविश्वास भी बढ़ने लगा। तभी फेरी वाले ने पूछा – ‘चिप्स लोगे साहब…… चिप्स!’
अपार की तंद्रा भंग हुई मगर उसे बूरा नहीं लगा। उसका मन अब पहले की अपेक्षा शांत था। उसे आंतरिक संतुष्टि मिलने लगी कि जो किया, अच्छा किया। वह भले ही एक मान्य शिक्षक नहीं है, पर इंस्टीट्यूट में ही सही, शिक्षक की भूमिका निभाता तो है। उसे लगा कि जब मैं ही दूसरे रास्ते पर कदम बढ़ा दूँगा, तो अनुकरण करने वाले अंधे होते ही हैं। उसे लगा कि स्पृहा की क्या गलती है? उसका मन तो कोमल है। बालपन से चला और किशोरपन की चैखट पर खड़ा। अभी उम्र ही क्या है? इस उम्र की भावना कोमल तो होती है, साथ ही अनुचित भी। मुझमें और उसमें उम्र का इतना अंतर कभी दोनों की भावनाओं को एक होने ही नहीं देगा। वास्तव में वह तो बेटी या बहन जैसी है। भले ही वह अनुभवहीन कल्पनाओं के गाँव में मनचाहा मेला सजा रही हो मैं तो वास्तविकता की दोपहरी में रास्तों की कठोरता से अवगत हूँ न। ……… अपार पता नहीं कब तक, क्या-क्या सोचता रहा। लगा कि उसका गला सूख गया है। फेरी वाले से पानी की बोतल लिया और एक ही बार में गले में उड़ेल लिया। रूमाल निकालकर चेहरा पोंछा तथा खाली बोतल को डस्टबीन में डालने के लिए उठा। – ‘बाय! ….. सी यू टूमाॅरो।’ – इस आवाज़ ने अपार का ध्यान खींचा। विकास था, अपार का मित्र।
विकास और अपार की पढ़ाई एक ही साथ हुई है। आजू-बाजू रहते भी हैं। वह ग्रेजूएशन के बाद नौकरी करने लगा था। यही एक बी.पी.ओ. में टीम लीडर है। वह अपार का सबसे करीबी मित्र भी है। दोनों एक-दूसरे से अपनी बातें भी शेयर करते हैं। अभी, जब अपार ने देखा, वह किसी लड़की को गले लगाकर विदा कर रहा था। पता नहीं कौन थी। अपार ने देर तक उसे पहचानने का प्रयास किया। लड़की ने आॅटो लिया और निकल गई। अब विकास से जानना चाहा, – ‘कौन थी ये?’
पहले तो मित्रों का सहज व्यवहार हुआ, फिर विकास ने बताया, – ‘स्वाति है, मेरे यहाँ की नई एच.आर.। देख रहे हो न, कितनी हाॅट है? ……. अपनी ही सोसाइटी में रहती है और हम दोनों साथ ही नौकरी करते हैं। कंपनी ज्वाइन किए अभी दो हप्ते हुए होंगे, पर पहली बार ही दखने के बाद मैं इसे हाथ से नहीं जाने देना चाहता था।’
‘और रश्मि कहाँ गई?’
‘ओफो! ……. है न। रश्मि भी है न। पर जानते हो उसकी प्राॅब्लम? …… वो तो सूनसान पार्क में भी हाथ तब नहीं लगाने देती है। ……. और इसका देखो।’
विकास के होठों पर लिपिस्टिक का रंग कहानी बताने ने लिए काफी था। अपार एक आदर्श मित्र का धर्म निभाने लगा – ‘रश्मि तुमसे सच्चा प्रेम करती है यार। …….. कभी सोचते हो कि जब उसे पता चलेगा तो कैसा लगेगा?’
‘तो उसे बताने कैन जा रहा है? ……. देख यार, उसका प्यार न, कोरी भावना है। …… और कोरी भावना…..सच्चे प्यार आदि से कुछ डवलपमेंट नहीं होता। …… जानतो हो, स्वाति मेरी एच.आर. है। स्वाति चाहेगी तो बहुत कुछ हो जाएगा। …… यह लड़की न, एकदम प्रैक्टिकल है अपार। ….. अभी बीते विकेंड की बात है,……. मैंने इरादा जताया जो सब कुछ समझ गई। खुद ही प्लान बना ली।’
‘तुम वहाँ तक बढ़ गए हो?’
‘सुनो तो! बहुत इंटेलिजेंट है। कहने लगी, घर में केवल मम्मी-पापा हैं। भाई बंगलौर नौकरी करता है। घर आ जाओ। ……. मैं गया और उससकी इंटेलिजेंसी देखकर दंग रह गया। ….. उसने अपने मम्मी-पापा के दूध में नींद की दो-दो गोलियाँ डाल कर सुला दिया था। ….. रातभर हम ……..। सुबह उठा, मजे से चाय लिया, तब चला। ….. वह भी खुश, मैं भी खुश। ……. अब तुम ही बताओ दोस्त, क्या रश्मि कभी ऐसा कर सकती है? ….. आज रात को भी जाना है। …… थोड़ा अधिक समय बिताऊँगा। हर ट्वेंटी-फिफ्ट को हेड-आॅफिस रिपोर्ट जाता है। आज रात में स्वाति खुश हो गई तो इस बार मेरा डिप्टी मैंनेजर बनना पक्का है।’
बातें तो विकास कर रहा था, मगर ग्लानि अपार को हो रही थी। ग्लानि के साथ लगा कि इनकी तुलना में वह तो कभी प्यार कर ही नहीं सकता। अपार के माथे पर बल पड़ने लगा। दोनों का के किनारे से पसीने की बूंदें टपकने लगीं। उसने फिर एक बोतल पानी ली और इस बार सामने की लाइट पोल के पास वाले बेंच पर बैठ गया। अपार को लगा कि विकास उसका मित्र नहीं है। यह तो कोई खूँखार भेड़िया है जो जंगल से भक कर इस मानव-रूप में आ गया है। लगा कि यह भेड़िया किसी को नहीं छोड़ने वाला। लगा कि इसी भेड़िया ने चारों ओर अत्याचार मचा रखा है। लगा कि यह भेड़िया सबको नोच-नोचकर खा रहा है। स्पृहा को भी, रश्मि को भी, स्वाति को भी। लगा कि उसके आस-पास ऐसे अनेक विकास हैं, जो मित्र हैं, पड़ोसी हैं, सहकर्मी हैं, मगर वे भेड़िया भी हैं। तभी विकास ने कहा – ‘देख यार, आदमी को हमेशा समय के साथ चलना चाहिए और आज के समय में प्यार-व्यार कुछ नहीं होता। आज नई जोड़ियाँ दोस्ती के नाम पर सबसे पहले तन का समर्पण चाहते हैं। इस प्यार में तन से जितना खेलो…… प्यार उतना ही गहरा समझा जाता है।……..’
‘जानते हो दोस्त, रश्मि तुम्हारे साथ शादी के सपने सजाती है।’
‘उन सूखे सपनों का क्या करूँगा भाई? …… वह मेरा लक्ष्य नहीं हो सकती। मैं जीवन में आगे बढ़ना चाहता हूँ। आगे बढ़ने के लिए सीढ़ी चाहिए। …. यार, में तो कहूँगा कि तुम मुझसे अधिक स्मार्ट हो, आकर्षक हो, …… तुम भी कुछ मेरे जैसा ट्राई करो, जल्द ही आसमान छूने लगोगे। ….. बस, आज प्यार में भी थोड़ा प्रोफेशनल बनने की जरूरत है।’
‘तुम्हारी नजर में इमोशन का कोई महत्त्व नहीं?’
‘यार तुम भी न, एकदम रश्मि की तरह सोचते हो। क्यों न रश्मि के साथ ही ट्राई करते हो? …… मैं हट जाता हूँ, तुम दोनों मिल जाओ। ……..’
विकास की बातों ने ऐसा असर किया कि अपार की आवाज गुम हो गई। वह अब न बोल पा रहा था, न सुन पा रहा था। आज उसका दिल निरीह लग रहा था। दिमाग का तर्क गायब था। उसके पास वे सीधी-स्वच्छ भावनाएँ थीं जो विकास जैसे लोगों के लिए जीवन का पग-बाधा लगती थीं। अपार संबंधों का नदी का शाश्वत प्रवाह मानता है जिसे दिमाग ने एक ऐसे टेलीकाॅम बूथ में परिवर्तित कर दिया है, जहाँ किसी के साथ भी किसी का तार जोड़ा जा सकता है।
विकास मेडिकल स्टोर से कुछ मेडिसीन लेने के बहाने चला गया। अपार बेंच पर सून्न पड़ा अपलक रूप से उसे देखता रहा। अब विकास कनाट-प्लेस की अपरिचित भीड़ में खो चुका था मगर अपार पता नहीं कब तक बैठा रहा।
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– केशव मोहन पाण्डेय

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