मणिकर्णिका की ओर हिंदुस्तान

ना ऊह ना आह
था उसका हाथ तुम्हारे पीठ पर
या कंठ पर
थपथपाया जा रहा था
या टेटूआ दबाया जा रहा था
जब शब्द और अर्थ का संबंध तोड़ा जा रहा था
कविताओं के मायने बदले जा रहे थे
तब तुम कभी कहां थे ?
अलगाए जा रहा था जब
हिंदुस्तानी गर्भाशय से
अंडाणु – शुक्राणु
अच्छा बताओ
तब तुम हिंदू बने या मुसलमान
वो गिनती में कितने थे
जिसे देख पा रही थी तुम्हारी आंखें
तुम्हारे आंखों के सामने थे
आंसू गैस के गोले
या था आईना
फिर तुम चीखे क्यों नहीं
चिल्लाए क्यों नहीं
मर गया था कवि
या था उसका हाथ तुम्हारे पीठ पर ।

तुम कहां थे जब
एक बड़ा सा पत्थर पटका जा रहा था
बड़े बेतरतीब तरीके से
उसके सबसे बड़े हिस्से पर लिखा जा रहा था ‘ रा ‘
बाकी बचे छोटे टुकड़ों को रख दिया जा रहा था
युवाओं के हथेलियों पर
‘ म’ को देश और मुल्क में फर्क बतलाते हुए
कहा जा रहा था यह देश नहीं है कोई मुल्क।

तुम कहां थे जब
किसानों के फेफड़े की पसलियां निकालकर
बरसाया जा रहा था युवाओं के पीठ पर
बुद्धिजीवियों के माथे की नसें निकालकर
दबाया जा रहा था उन्हीं का गला
बताओ कि कैसा होता है
कटे जीभ का स्वाद
बताओ कि कैसा होता है
अपने ही कटे उंगलियों से खेलना
बताओ कि कैसे हो जाता है
47 और 75 जुड़कर 19 या कि 20
तुम कहां थे जब
बटोर लिया गया था सहसा
सबकी जुबान और उंगलियां ।

उसकी मंशा बढ़ी इतनी कैसे
कि छूते हैं हर बार
पेट्रोल टैंक को माचिस की तीलियों से
गजब तरकीब है उनके पास
कि खाक हो जाता है शहर दर शहर
पर बची रह जाती है उनकी उंगलियां
हर बार बदलते हैं शहर
और तय रहता है उनका खाक होना ।

उसकी मंशा थी कि
सर कटा इंसान पैदा हो
वह सिर्फ तुम्हारी तर्जनी से काम लेकर
तुम्हें अपना अंगूठा दिखाना चाह रहे थे
वादा देवपुत्रों से किया जा रहा था
निभाया देवताओं से जा रहा था
तुम कहां थे जब
विश्वविद्यालय के ईंटों को तोड़कर
खड़ी की जा रही थी मंदिर की दीवारें
रंगा जा रहा था उसे युवाओं के खून से
उनके आंसू देवताओं के जलाभिषेक के काम आ रहे थे
पुस्तकालय की पुस्तकें हवन सामग्री हुए जा रहे थे
सर पर मोर पंख की जगह बरस रहे थे पुलिसिया डंडे
प्रसाद की जगह उन्हें चखना पड़ रहा था अपना लहू
उस खाक होते शहर किस चीख – पुकार
आ रहे थे इस शहर तक भी
कहां थे तुम
पड़ी थी क्यों इस शहर की सड़के सुनसान
टूकुड़-टूकुड़ सब देख रहा था अपना संविधान
जा रहा था मणिकर्णिका जब अपना हिंदुस्तान
क्षत-विक्षत लहूलुहान ।

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आदित्य राज
( स्नातकोत्तर छात्र- काशी हिंदू विश्वविद्यालय )

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