मन मेरे

मन मेरे चंचल मत होना।।

स्वप्न अपरिमित है आँखों में
नवल पुहुप पल्लव शाखों में
लेकिन लक्ष्य कहीं कुछ दूर है
जहाँ रेत में भरा है सोना।।

कभी हार-थक सो नहीं जाऊँ
भटक राह में खो नहीं जाऊँ
हो नहीं जाऊँ कभी अकेला
रिश्तों का अंबार है ढोना।।

लक्ष्य निरंतर सहज न मिलते
पुष्प-गुच्छ हरदम नहीं खिलते
मिली हार तो जीतेगा भी तू
बंद करो सब रोना-धोना।।
*** केशव मोहन पाण्डेय

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