महादेव

केवल पर्वत पर विराजने से
टूटी झोपड़ी में वास करने से
भांग-धतूरे खाने से
गंगा को शरण देने से
गरल पान करने से
भूतादि गणों को साथ रखने से
मृग-छाला पहनने से
बदन में भष्म लेप करने से
और त्रिनेत्र रखने मात्र से ही
कोई महादेव नहीं बन जाता
महादेव बनते हैं शिव
कि वे अपरिमित शक्ति के सागर हैं
कुछ भी असंभव नहीं है उनके लिए
फिर भी विराजते हैं पर्वत पर
स्वर्ग का सुख छोड़कर
करते हैं वास झोपड़ी में
देवता होकर भी
नहीं लगाते छप्पन-भोग
भांग-धतूरा खाते हैं
गंगा को शरण नहीं देते
आदर देते हैं
मस्तक पर धारण कर
सोम नहीं
गरल पान करते हैं
नहीं फटकना चाहती दुनिया
जिनके पास
साथ रखते हैं
उन भूतादि गणों को
नहीं कोई दम्भ देवत्व का
मृग-छाला पहनते हैं
बिना दिखावे के
नहीं मतलब
रत्नों से सज्जित
आभूषण धारण करने से
नख-शिख
मान रखते हैं भष्म का
अंतिम सत्य भी तो वही है
और मान जाते हैं भोले
भर देते हैं भण्डार
कर-बद्ध प्रार्थना मात्र से
जब कभी होता अन्याय
स्वाहा करने के लिए
जड़-चेतन का घमंड
ब्रह्माण्ड की रक्षा के लिए
तब त्रिनेत्र खोलते हैं
जगत के भक्तगण
तभी तो
हर हर महादेव बोलते हैं
यूँ ही कोई महादेव नहीं होता
यूँ ही कोई त्रिशूल पर नहीं सोता।
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– केशव मोहन पाण्डेय

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