महान मानव

अपने अथक मेहनत के दम पर
निरन्त प्रगति करता मानव
रोज नए इतिहास लिख रहा है
और सीख रहा है
नित नए ज्ञान-विज्ञान
रोज बनना चाहता है
महान, अति-महान।
आज की प्रगति देखकर
विश्वास नहीं होता कभी
इतिहास के उन अशआरों पर
जब कहा जाता है –
आदमी जंगली था
नंग-धड़ंग रहता था
न खाने का सलीका
न था बोलने-चलने का शऊर
आदमी बिलकुल बर्बर था तब।
तब नदी, पहाड़,
पेड़, बादल
चाँद-सूरज
पशु-पक्षी
सबसे डरता था आदमी
और इन सब से
जल-फल-प्रकाश पाने पर
पूजा करता था
गंदगी फैलाने से
बहुत डरता था।
और आज का आदमी?
सबका चक्कर जनता है
तभी तो
अपने को ही महानतम मानता है
और चिंता करना तो दूर
कुछ भी नहीं मानता
प्रदूषण के खर-दूषण को
अपनी प्रगति की दौड़ में
नोचता जा रहा है
प्रकृति के आभूषण को
और बनता जा रहा है
विकसित, समृद्ध, धनवान
मगर पर्यावरण का दोहन करने वाला मानव
पर्यावरण की चिंता किये बिना
कभी नहीं बन सकता महान।
——
– केशव मोहन पाण्डेय

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