माँ

थके हारे तन मन को
गोदी में लिटा सहला दूँ l
माँ ! आ , आज लोरी गाकर
तुझे , मैं सुला दूँ l
तेरी चिन्ता ,दुख – सुख
काँधे का बोझ
अपने काँधों पे उठा लूँ
आ , तुझे मैं सुला दूँ l
सुनती नहीं बिल्कुल भी
करती अपने मन की
डाँट लगा चुप करा दूँ
आ ! तुझे मैं सुला दूँ l
तेरे चेहरे की झुर्री को
काँपती धुरी को
जीवन बिन्दु से मिला दूँ
आ ! तुझे मैं सुला दूँ l
बलायें लूँ , नज़र उतारूँ
आँखों में बसाऊँ
बाँहों में सँभाल लूँ
आ ! तुझे मैं सुला दूँ l
मुझे सिखाया जीना तूने
खुद कभी जिया ही नहीं
जीना तुझे सिखा दूँ
आ ! तुझे मैं सुला दूँ l
अंत नहीं , प्रारम्भ है ये
तेरी आँखों में , भूले-बिसरे
और कुछ नए ख्वाब सजा दूँ
आ ! तुझे मैं सुला दूँ l
बढ़ चल पकड़
के मेरा हाथ
फिर से कुछ लक्ष्य दिखा दूँ
आ ! तुझे मैं सुला दूँ l
बड़ी हूँ , सक्षम हूँ
सदा तेरे पास,तेरे साथ हूँ
तुझे ये विश्वास दिला दूँ
माँ ! अब मैं
तेरा किरदार निभा दूँ l
आ ! आज लोरी गाकर
तुझे मैं सुला दूँ l
—-
शालिनी शर्मा

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