मेरा गाँव बदल गया है 

 
लगभग तीन-चार साल बाद अपने गाँव, अपने जन्म-स्थान जाने का अवसर प्राप्त हुआ। निर्णय यह हुआ कि इस बार हम साइकिल से चलेंगे। मेरा वजन अब पहले जैसा नहीं रहा। 55 किलो की सीमा पार करके 75-80 किलो का भारी-भरकम बंदा हो गया हूँ। मेरे पास पैंडिल-मार द्विचक्र वाहिनी (साइकिल) तो है नहीं, तथा गाँव के सौंदर्य और ममत्व भरे मिट्टी में द्वेष और तिकड़म का घिनौना रूप देखा हूँ, तो कोई अधिक रुचि नहीं हुई। सहयात्री बनने वाले नहीं माने। अब जाना तो है ही, साइकिल की व्यवस्था हो जाएगी। कल सुबह 6 बजे निश्चित किए गए स्थान पर आना है। अनमने मन से, इतने दिनों बाद, गंडक के बलात्कार के बाद, मान-मर्यादा और बहुत हद तक अस्तित्व-हीन अपने गाँव को निरखने का उत्साह भी गुदगुदी कर रहा था। सुबह उठकर प्रथम कार्य से निवृत ही हुआ था कि मोबाइल की बाँसुरी बज गई। दातुन-ब्रश, चाय-नाश्ता, सब गाँव में ही करने का निर्णय किया और नियत स्थान पर चल पड़ा। वहाँ अन्य तीन पहले से ही मौजुद थे। मेरी वाहिनी नदारत! मेरी विवशता और शिकायत ने तीव्रतर गति से कार्य किया। एक नई-नवेली साइकिल सामने हाजिर हो गई। बाप रे! अगर इतनी तेजी से कार्यालयों का काम होता तो देश कहाँ का कहाँ पहुँच गया होता? खैर, कुछ पल की प्रतीक्षा और हम छः यात्रियों की यात्रा आरंभ! उन सबमे उम्र के हिसाब से सबसे छोटा मैं ही था, पर हास्य-गाथा बराबरी की पढ़ी जा रही थी।
   ओह! कुछ भी तो नहीं बदला! वहीं पगडंडियाँ। वैसे ही उजड्ड लगते लोग। वहीं चरवाहे। वहीं खेत-खलिहान और परती पड़ी जमीन। . . . अरे! हम तो रास्ता ही भटक गए। हममे से जो सबसे बड़े हैं, उनकी साइकिल का चेन उतर गया। वे पीछे छूट गए, बाकी हम, बहादुरी में आगे निकल आए। रास्ता भटकने पर उस उम्र में बड़े भाई की याद आई। आज का जेनरेशन ऐसा ही है। जोश में गलत-सही रास्ते का ध्यान रखे बिना ही सफर पर निकल पड़ता है और फिर भटकाव के समय बुजुर्गों की याद आती है। वैसे तो उनकी बातें जहर लगती हैं। . . . शुक्र है संदेश-वाहक के आधुनिक अवतार मोबाइल का। हमने संपर्क साधा और वे दूर से ही हाथों का ईशारा करके सही रास्ता निर्देशित किए। यह हमारी यात्रा में पहला बदलाव, जो खुशी के बदले थोड़ा टीस दे गया। ताना-तानी भरे चर्चाआंे के बीच सफर जारी रहा। जारी रहा प्रकृति का मौसमी नजारा। . . .गेहूँ के खेत। गन्ने के नवागत पौध। बरसात और बाढ़ की पानी से रक्षा के लिए बने मेढ़ों से होते हुए हम गाँव के विकास और स्थिति पर पछताते, तरस खाते, पैंडिल मारते, पसीना पोंछते चले जा रहे थे। सबसे अधिक परेशान मैं ही था, क्योंकि सबसे अधिक दिनों बाद जा रहा था। जो उम्र में सबसे बड़े भैया थे, इस प्रगति का हमारे द्वारा किए गए पोस्टमार्टम को सुनकर मुस्कुराते थे। उनका मुस्कुराना मुझे कुछ अजीब लग रहा था।
   हम कुछ ही दूर आगे बढ़े थे कि पहले की अच्छी सड़क, इस समय टूटी, उखड़ी और बदहवास सी मिली। एक बारगी मन किया कि वहाँ से वापस लौट जाऊँ, पर मिट्टी की खींचाव में खींचा चला जा रहा था। पूरब से सूरज पलकें झपकाते आँखें खोलने लगा था। शरीर में गर्मी की अनुभूति तेज होने लगी थी। खेतों में किसानों की संख्या कम होने लगी थी। यहाँ के किसान भोर के पहले ही खेतों में आ जाते हैं और शरीर में धूप के गरम होते ही पानी पीने घर चले जाते हैं। यहाँ पशुपालन काफी तादाद में होता है। हाँ, पालकों के पशुओं की संख्या गिनती में कम होती है। संख्या से पता चलता है कि इनका उद्देश्य व्यावसायिक कम, स्वांतःसुखाय अधिक है। शायद इसी कारण से यहाँ के अनपढ़, बेरोजगार युवक-नौजवान भी हृष्ट-पुष्ट और ताकतवर होते हैं। अक्सर सूर्य की प्रचण्डता के साथ पशु चराने का काम प्रारंभ होता है। उस समय खेतों में किसानों के नहीं रहने पर चरवाहे कभी लापरवाही से, तो कभी परवाह करके अपने पशुओं को लहराती फसलों में एक-आध बार मुँह मार लेने देते हैं। कभी-कभी तो बड़ी सादगी से दुश्मनी भी निभा ली जाती है। गाँव की पावन मानसिकता में घातक दुश्मनी और कलुषता का दीमक गाँवों को खोखला कर रहा है। इस दर्द को मैं बारीकी से समझता हूँ। हमलोगों के पलायन के कारणों में एक यह भी तो कारण था। बस, बहाना बन गई गंडक की कटान।
   अब आगे का रास्ता कुछ आश्चर्य में डालने लगा। बाढ़ की जलधारा के बने भयंकर एवं खतरनाक गड्ढों वाले रास्ते पर अब पुल बन गया है। मैंने अपना आश्चर्य व्यक्त किया तो उम्र में सबसे बड़े वाले भैया ने बस इतना ही कहा, – ‘अभी आगे चलो मेरे भाई।’
     मन में पहेली को समझने का साहस जागा। अर्थात् आगे कुछ और विकास का कार्य हुआ है! पैंडिल पर कुछ तेज दबाव पड़ने लगा। हमारी बेचैनी बढ़ने लगी। एक, दो नहीं, पूरे चार किलोमीटर तक आगे बढ़ गए, कोई विशेष अंतर नहीं। हाँ, ग्राम देवी (सोना भवानी) के स्थान पर थोड़ी अधिक चहलकदमी नजर आई। उनके स्थान के चारों ओर घेरा बन गया है। दीवारों पर ताजा रंगरोगन किया गया है। उस स्थान पर जाने के लिए सड़क से सटा एक बड़ा सा प्रवेश-द्वार बन गया है। वहाँ पहुँचते ही मेरा माथा उस आदि शक्ति के सामने झूक गया। वहाँ के विकासशील पीपल का वृक्ष देखकर मुझे अपने द्वार के विशालकाय पीपल की याद आ गई। याद आते ही मन कसैला हो गया। अपने गाँव का सारा दृश्य आँखों के सामने एक बारगी जीवंत हो गया। . . .
    मेरा गाँव! जहाँ प्रार्थना जैसी पवित्र महकती सुबह का स्वागत हरिहर बाबा के शिव-भजन एवं दूर से मस्जिद के आजान से हुआ करता था। आँख खोलते ही कंधे पर हल सम्भाले, खेतों की ओर जाते किसान, सीना ताने, बसवाड़ी के अखाड़े में जाते जवान, रम्भाती गायंे, किलकते बछडे़, मेंमियाती बकरियाँ और धूल-धूसरित, नंग-धड़ंग हम सब बाल-गोपाल। मेरे गाँव के लगभग सारे  मकान कच्चे थे, लेकिन लिपे-पुते और सुन्दर थे। घरों पर लहराती लौकी और तरोई की लताएँ सबके मन को बरबस मोह लेती थीं। जेठ की दोपहरी में पीपल की छाँव का आनंद कौन भूल सकता है? बूढ़े, बच्चे और जवान, सभी तो हूजुम लगाए रहते थे। बूढ़ों की अपनी अनुभवी चर्चा के साथ ताश का खेल होते-होते आर. एम. पी. चाचा और जे. एन. पी. चाचा का शोर कौन भूल सकता है? हम बच्चों का पीपल की सबसे नीचली डाल पर ओल्हा-पाती, झूला, लुका-छिपी खेलना। जवानों की अपनी बेरोजगारी की चर्चाएँ। उन्हीं चर्चाओं में हमारे गाँव के जवानों ने रामलीला-मंडली का गठन किया था। उस रामलीला के दशरथ, परशुराम, रावण, वशिष्ट, नारद, राम, लक्ष्मण, सीता. . .  किसे नहीं जानता हँू मैं? आज वे यहाँ नहीं मिलेंगे। समय की आँधी ने सबकुछ तहस-नहस कर दिया। विकास से कोशों दूर मेरा गाँव आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए दूसरों का मुँह ताकता रहा। रामलीला मंडली से मन का गुजारा चल जाता, तन तो अंदर और बाहर, दोनों ओर से नंगा होने लगा। जो थोड़े पढ़े-लिखे लौजवान थे, वे मुंबई, पंजाब, दिल्ली का राह पकड़ लिए। कुछ बहके मानसिकता के नौजवान खाकी, खादी को छोड़ काली वर्दी को श्रेष्ठ मानने लगे थे। मेरा गाँव तबाह होने लगा। अपनी बेटी-बहुओं की आबरु और अपनी नाक की रक्षा के लिए लोग शहर जाकर जमीन लेने लगे। तब अपनी ही मिट्टी का गंध असहनीय हो गया। जो दूसरे जगह बसने में सामथ्र्यवान नहीं थे, गंडक ने उनके आबरु और नाक की रक्षा की। गंडक की कटान और उसके बरसाती उन्माद की तबाही से वहाँ का जमीन-जायदाद बेंचकर भी लोगों को दूसरे जगह बसना ही पड़ा।
    मेरे बाबुजी कुछ अलग किस्म के आदमी थे। उनके लिए यह गाँव और मिट्टी माँ है। मिट्टी और माँ को बदला नहीं जाता। जिस धरती पर जन्म लिए वह धरती पूर्वजों की भी माँ होती है। वह तो शुक्र है ऊपर वाले का कि उनके घर में मेरे जैसे कुपुत्र ने जन्म ले लिया। मेरे आँखों के सामने ही एक घटना घटित हो गई। (मेरी भोजपुरी कहानी-‘लिट्टी’ वाली घटना)। उसके बाद तो मैं अपनी कसम दिलाकर उन्हें शहर में जमीन लेने के लिए तैयार कर लिया। . . . आज मेरे बाबुजी होते तो समझते कि कितना फायदा हुआ है मेरे उस कसम का। उनके चार में से तीन बेरोजगार बेटे भी आज अपने पैरों पर खड़े होकर अपने ढंग से अपनी जिन्दगी जी रहे हैं।
     यह मिडिल स्कूल है। यहीं मेरी 6वीं से 8वीं तक की पढ़ाई हुई है। पहले खपड़ैल का था, अब पक्का मकान हो गया है। . . . यह है राम-जानकी मंदिर! इसके तल को हम सुरंग कहते थे। आज बेसमेंट कहते हैं। दिल्ली में लगभग सभी मकान बेसमेंट वाले होते हैं। हाँ, मंदिर का जीर्णोद्धार हो गया है। कुछ देवताओं की नई प्रतिमा स्थापित की गई है। पूरब की ओर है हाई-स्कूल! अरे! टूटे कमरों से थोड़ा दक्षिण तो दो मंजिली ईमारतें हैं। सबने बताया कि अब यह इंटर काॅलेज हो गया है। मैं भ्रम में था कि पूरुवा हवा ने आकर जैसे समझाया कि विकास देख रहे हो? सहयात्रियों में से किसी ने कहा,- वह तो स्कूल है, नीचे देख रहे हो?
     क्या बात है? मेरा गाँव जैसे बदल गया है। जैसे चिढ़ा रहा है मुझे कि मैं भी बदल गया हूँ। नीचे चमचमाती सड़क है। बाजार में धान की भूसी से बिजली पैदा करने का संयंत्र लगा है। सबके यहाँ शाम को 6 बजे से आधी रात अर्थात् 12 बजे तक बिजली की सप्लाई की जाती है। गाँव में मोबाइल कंपनियों का आठ-दस टावर लगा है। अब शहर से गाँव तक निरंतर गाडि़याँ चल रहीं हैं। आगे बढ़े तो मजा ही आ गया। यह साफ-सुथरी, धूली हुई सी सड़क, नदी की विराटता को ललकारती, बंधे तक गई है। कमाल हो गया। यहाँ पर भी कई प्राइवेट विद्यालय चल रहे हैं। बंधे के ऊपर रेल दौड़ेगी। मुआयना हो गया है। मिट्टी डालने का काम चालू है। पूरब में, मोती टोला के आस-पास विद्युत स्टेषन बनने वाला है। नदी के कछार को पत्थरों की जाल से बाँध दिया गया है। आस-पास के गुलमोहर अपने हरे कपड़ों में लाल फूल बटोर कर खेल रहे थे। बाँस की फुनगी हवा से लचक कर नदी के जल का चुंबन कर रही थी।
     मैं पागल सा हो गया। इस धरती पर मुझे कभी यह सब नहीं मिला था। मैं पाना चाहता था। सबको एक साथ आत्मसात् करना चाहता था। नदी किनारे बैठकर, खड़ा होकर, कूदकर, झूम कर . . . कई फोटो खिंचवाया। आनंद ने मस्त किया, उमंग ने आस्वस्त किया और इन्हीं के साथ एक टीस मेरे आशाओं को कूरेद गई। मैंने देखा कि कई बच्चे आज भी भैंसों का झूंड चराने ले जा रहे हैं, कई टोलियाँ आज भी कंचे खेल रही है, और कई नौजवान अपने ही गाँव की लड़कियों को देख फब्तियाँ कस रहे हैं, तो किलकती हुई नदी की धारा ठहाका लगाने लगी। एक बार लगा कि यहाँ से पलायन का निर्णय सही था।
 दोपहर के पहले-पहले हम अपने-अपने घर आ गए। मेरा मन भारी था। अपने गाँव की कई खट्टी-मिट्ठी यादों ने मन पर दबाव डाल दिया था। कुछ सहज हो कर मैं एक लड़के को फोन किया। वह भी गजब का जीव है। मुँह बोला रिश्ता कैसे निभाया जाता है, कोई उससे सीखे। वह मुझे कहता है चाचा, है दोस्त से बढ़कर। . . . मैंने उससे अपील की कि अगर कहीं कुछ सस्ती जमीन मिले तो बताना, मुझे एक झोपड़ी डालनी है। कम से कम उसी बहाने तो अपने बदले हुए गाँव जाया करूँगा!
                                                                    ……………………
                                                                           – केशव मोहन पाण्डेय

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