मेरे बाबूजी

खंभा दीवार नींव थे घर के
मेरे बाबूजी रूप थे हुनर के।

उनमे थी सबको मिलाने की चाहत
मरी धरती को जीलाने की चाहत
दीदी की आशा भैया की उम्मीदें
अम्मा की सजने-सजाने की चाहत,
भीतर मोम मगर बाहर पत्थर थे।।

गिनते न पैसा अतिथि के सम्मान में
बड़ा सा मन था उस पतली सी जान में
चाहता रहा मैं उन्हें जान पाऊँ
पर कैसे घूमूँ पूरे आसमान में
आधा साहस, आधा मेरा डर थे।।

पूस में तपिश, जेठ में पीपल की छैंया
ममता के सागर, मेहनत के बड़े भैया
शीत-धूप सहते जीवन के डगर पर
पर लेकर चलते थे रिश्तों की नैया
थे शिल्प गँठे माँ के जेवर के।।
– केशव मोहन पाण्डेय
(18.4.04)

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