मैंने दाऊद को देखा है

हुड्डा सिटी सेंटर मेट्रो स्टेशन गुड़गाँव में ब्लू लाइन मेट्रो का अंतिम पड़ाव तो था ही, अब इसका स्वरूप एक शाॅपिंग माॅल जैसा हो गया है। कबाब एक्सप्रेस से लेकर फूड प्वाइंट और न जाने किस-किस तरह की रेस्तरां और शाॅपिंग प्वाइंट खुल गए हैं। स्टेशन पर हमेशा आने-जाने वालों का ताँता लगा रहा है। ढाई बजे के आस-पास भी मेट्रो में यहाँ से इतनी भीड़ चलती है कि सबको बमुश्किल बैठने का स्थान मिलता है। कई स्कूल बसें आकर जैसे ही तीराहे को पार करती हैं, एकाएक थोड़ा दाहिने होकर बाँये घूम जाती हैं। कई बसें आगे आकर प्री बुकिंग टैक्सी प्वाइंट के पास रूकती हैं और लगभग हर बस से एक-दो मैम और सर उतरते हैं। उन्हें उतरने के बाद बड़ी ही सावधानी से स्टेशन जाना पड़ता है, नहीं तो आॅटो ड्राइवर ऐसा शोर मचाते रहते हैं कि कान फट जाए।
राघव भी आज उसी समय नव-निर्मित फूट ओवर से इस पार आया तो देखकर लगा कि कुछ असहज है। पता नहीं गुड़गाँव ट्रैफिक वाले निरंतर एक्सपेरिमेंट करते रहते हैं या उनका प्री प्लांड एक्शन है? यहाँ ट्रैफिक में हमेशा कुछ-न-कुछ नया होता रहता है। कभी फूट ओवर के आगे एक गोल चक्कर होता था, आज सब सफाचट्ट। फिर पिल्लर संख्या एक सौ निन्यानबे और दो सौ के पास गोल चक्कर था, आज उसकी त्रिज्या चैथाई से भी कम हो गई है। अभी तक तो दायें-बायें देखकर नौजवान लड़के-लड़कियाँ सड़क पार कर लेती थीं, अब उसे भी काँटेदार तारों से घेर दिया गया है। कल तक उसमें भी एक-दो जगह खुला छोड़ा गया था, आज उसे भी बंद कर दिया गया। राघव को यह काम अच्छा लगा। इससे जनता की ही भलाई है नहीं तो सड़क पर भागती गाड़ियों को चकमा देकर भले लड़के-लड़कियाँ सड़क पार कर लेती हैं, मगर बेपरवाह गाड़ियाँ किसको स्वाहा कर दें, कौन जानता है? उस पर आटो चालकों का शोर-शराबा। ऊफ! उनकी चले तो सवारियों को जबरन टांग कर बैठा लें। ….. यही सब सोचते हुए राघव ने जैसे ही फूट ओवर के अंतिम स्टेप पर कदम रखा, बाएँ की ओर से सड़क पार करती एक लड़की की हरकतों पर नजर गई। थी भी देखने लायक। साँचे में ढली।
रावघ की आँखें दूर से ही उसे देखने लगीं। शायद वह व्यापार केंद्र की ओर से आयी और अपनी आॅडी से उतरते ही अपने सुनहरे और सलीकेदार जुल्फों को जो एक ओर झटकी तो राघव रूक सा गया। मेट्रो पकड़ने की जल्दीबाजी मंद पड़ गई। राघव ने लड़की की उस अदा को देखा जिसे शायद कोई नहीं देख पाया था। आॅडी जिस गति और शान से आयी थी, उसी गति और शान से चली गई। लड़की अपने गोरे तन पर काला कुर्ता और आसमानी रंग का लैगी पहनी थी। दाँये कंधे से उसका आसमानी पर्स कम बैग लटक रहा था।
लड़की ने इधर आने के लिए फूट ओवर को देखा। अभी निर्माणाधीन है। वह असहज दिखी। थी तो बेहद बोल्ड। अब मेट्रो स्टेशन आने के लिए या तो निर्माणाधीन फूट ओवर से आए, या आगे जाकर पिल्लर संख्याा दो सौ के पास से टर्न ले। इन दोनों के बीच का रास्ता उसे अच्छा लगा। दो विकट परिस्थितियों में बीच का रास्ता निकालना आई.क्यू. का शार्पनेस कहा जाता है। लड़की ने झट से कँटीली तारों के बीच से अपना एक पैर बढ़ाया और दो तारों के बीच से साँचे में ढले अपने सलीकेदार तन को पार करना ही उचित समझा। पता नहीं झुझलाहट था या घबराहट। सलीकेदार तन अव्यवस्थित हो गया और ऊपर के तार का काँटा उसके पीठ के कपड़ों को फाड़ता हुआ उसे पीछे से आवरणहीन करता चला गया।
लड़की तार को पार कर गई मगर पानी-पानी हो गई। राघव फूट ओवर के अंतिम सीढ़ी पर पैर रखा ही था कि उस वाकया ने सॉक दे दिया। लड़की इधर-उधर किसी ऐसे को देखने लगी जो कोई भी तो उसका तन ढके। सभी स्त्री-पुरुष उसे देखते अपने रास्ते चले जा रहे थे। आॅटो ड्राइवर्स का कमेंट उसे तो दुखी कर ही रहा था, राघव भी दुखी था। कई नौजवान तो टी-शर्ट में लटक रहे अपने काले चश्मे को आँख पर चढ़ा कर उसे घूरते निकलने लगे। नहीं देखने का बहाना करते रहे। एक औरत के पास जाकर लड़की ने उसका दुपट्टा लेकर तन ढकना चाहा कि वह झटके से छुड़ाकर चली गई। लड़की कातर दृष्टि से एक-एक का चेहरा देख रही थीं। कोई मुस्कुराकर चला जाता तो कोई मुँह फेर कर। कोई दुख व्यक्त करती नजरों से देखता चला जाता। एक आॅटो ड्राइवर ने गमछे से अपना मुँह पोंछते हुए बगल वाले से कह रहा था- आयी थी हिरोइन बनने। मर्दानी बन रही थी, अब मज़ा आ रहा होगा। तन दिखा रही है।
राघव भी सबको देख रहा था। स्वयं को भी। सबको स्वयं में व्यस्त देखकर वह लड़की की सहायता करने के लिए आगे बढ़ा ही था कि तभी वह एक आॅटो में बैठकर शायद घर वापस चली गई।
मेट्रो के स्पीकर से जब आवाज़ सुनाई दिया कि ‘अगला स्टेशन राजीव चैक है, दरवाज़े बायीं ओर खुलेंगे’ तब राघव को होश आया। अभी तक वह हुड्डा सिटी सेन्टर की घटना से उबरा ही नहीं था। सामने ‘केवल वृद्धों के लिए सीट’ पर नजर टीक गई। देखा कि लोग एक नज़र तो उसपर डालते हैं, मगर मुँह बिचकाकर फेर लेते हैं।
एक फटेहाल वृद्धा अपने जवान लड़के का सिर गोद में रखे बैठी थी। बेटे को कुछ ऐसी परेशानी थी कि वह ठीक से बैठ भी नहीं सकता था। शरीर में केवल हड्डियाँ ही नजर आ रही थीं। वह भी सूखी हुई। आँखें बाहर की ओर निकली। थोड़ा भी घूमाता तो लगता कि अभी हाथ में आ जाएँगी। वृद्धा कुछ बोल नहीं रही थी, सिर्फ रो रही थी। उनके चेहरे की झुर्रियों में उलझ कर आँसु सहस्रधारा में परिणत हो जा रहे थे। अपनी मैंली साड़ी की पल्लू से बेटे का चेहरा बार-बार पोंछती और चिंतित दृष्टि से देखती। राघव जानना चाहा। पास जाकर पूछा, – ‘क्या हुआ है आंटी?’
‘यो मेरो छोरो सै। —— एम्स में गई थी। —– डॉक्टर न्यू बोल्यो टी बी सै। —–बचण की आस ना सै।’ – फिर अपना आँसू पोंछती है – ‘रे क्यूकर ना बचेगा? —ऐ छोरो! — यो ना रह्यों तो मैं एकली हो जांगी न रे।’
ट्रेन राजीव चैक रूकी। सभी उतरने-चढ़ने की बेचैनी में थे। जैसे यह ट्रेन नहीं, समय हो। जैसे एक बार गया तो आया नहीं। जैसे सभी को इमर्जेन्सी है। जैसे बस यह अंतिम ट्रेन है। जैसे अभी नहीं तो कभी नहीं। …… वैसे तो राघव को जहाँगीरपुरी जाना था। वह भी चाहता तो किसी अंकल-आंटी की चिंता किए बिना बाकी अधिकतर नौजवानों जैसा कान में इयर फोन लगाकर आँखें मुदकर एक तरफ बैठ जाता। या तो एफ.एम. के गानों में खोया रहता या ड्रामा क्वीन का ऐड सुनता और सोने का स्वांग भरता। पर उसे लगा कि ‘राजीव चैक की भीड़ में बुढ़िया अपने बेटे को कैसे उतार पाएगी? …. मैं उसकी सहायता कर देता हूँ।’ …… वैसे तो बुढ़िया के पास एक कई साल पुराना किसी वस्त्रालय के थैला के अतिरिक्त उसका बीमार बेटा ही धन था। राघव उसके बेटे को दोनों बाजुओं में पीछे से हाथ लगाकर बाहर निकाल दिया। बुढ़िया भी उतर गई। बेटे का मुँह पोछी। अपने माथे का भी पसीना पोछी और चिल्लाने लगी। पता चला कि इस उतरने-चढ़ने की धक्कम-धुक्की में किसी ने बुढ़िया का थैला मार लिया।
संवेदना मानवता की बड़ी बेटी है। आज की बीमार मानवता स्वस्थ्य संवेदना कैसे जनेगी? जिस जगत में मानवता का ह्रास होता है, उस जगत में पशुता का उत्कर्ष होता है। ऐसा लगता है कि आज मानव ने अपने आस-पास के वातावरण को पशुता से सुसज्जित कर लिया है। दधीचि, शिवि, कर्ण के दृष्टान्तों पर अपहरण, हत्या, चोरी आदि ने अपना मुलम्मा चढ़ा लिया है। आँसुओं का मोल शून्य हो गया है। एक मुस्कान की तलाश में जीवन न्योछावर करने की परिपाटी शुरू हो चुकी है। – इन्हीं विचारों के जाल में उलझा राघव अब अपनी यात्रा का उद्देश्य नहीं समझ पा रहा था। लक्ष्य पर परिस्थितियों का ग्रहण लग गया था। आज देखे और भोगे गए व्यवहारों के दबाव के कारण सिर भारी हो चला था। राघव चाँदनी चैक उतर कर वहाँ की बाजारू भीड़ में खो जाने के लिए निकल पड़ा। ऊपर आकर एक कुल्हड़ लस्सी से गला तर किया फिर लाल किला की ओर चल पड़ा। लाल किला की विराटता का साक्षात्कार शायद राघव के चित्त को कुछ शांत कर दे। वह लाजपत राय मार्केट की तकनीकि सूरत को देखता तथा अलग-अलग दूकानों पर बजते अलग-अलग गानों से लड़ता आगे बढ़ रहा था। सड़क की दाहिनी ओर के जैन मंदिर में भजन चल रहा था। सामने बत्ती के पास कोने के हनुमान मंदिर पर आया। यहाँ आने वाले हर व्यक्ति की भाँति वह भी फ्रूट चाट लिया और टूट पड़ा। ककड़ी, तरबूजे, आम …… सब कुछ तो है इसमे। दो झोंके में चाट मसाला डालकर नमक छिड़का और पॉलीथिन में से सींक लेकर एक बाइट मुँह में डाला। अभी पहली बाइट समाप्त भी नहीं कर पाया था कि सामने एक जोड़ा देखा। दोनों टीन-एजर थे। जोड़े में से लड़के ने एक आॅटो रोका। राघव की नज़र गई तो वह खाने से अधिक जोड़े को देखने लगा। देखने क्या लगा? …… आँखों से सुनने लगा। लड़के ने उस टाइट-फिटिंग जींस पर स्लीपलेस टाॅप पहनी अपनी साथी तरूणी के लिए आॅटो रूकवाया। आॅटो एक साधारण सा दिखने वाला प्रौढ़ चला रहा था। तरूणी उसमें अकेले नहीं जाना चाहती थी। उधर राघव फ्रूट चाट के एक-एक टूकड़े को मुँह में डालते हुए उस जोड़ी की ओर थोड़ा और सरक गया। अब उन दोनों की बातें सुनाई देने लगीं। लड़की आग्रह कर रही थी, – ‘तुम भी चलो न! ….. अगर तुम्हें नहीं जाना तो मैं मेट्रो से चली जाऊँगी।’
‘तुम्हे हो क्या गया है मनु? …… आॅटो से क्या बुराई है?’
‘मुझे डर लगता है राज! …. देखते हो न, रोज न्यूज़ में कोई-न-कोई घटना नहीं देखते-पढ़ते क्या? ….. साॅरी राज, मुझे अकेले डर लगता है।’
राज थोड़ा मुस्कुराते हुए मनु के कमर में हाथ डालकर बोला, – ‘इस डर्टी ओल्ड मैन से भी? …. कमाॅन यार।’
मनु उससे और चिपक गई और उसके सीने से सिर टिकाकर बोली, – ‘मुझे अकेले नहीं जाना बस। ….. इट्स फाइनल डिसिज़न।’
आॅटो ड्राइवर स्टार्ट किया और – ‘सबके सामने तो चिपक रही है और मेरे साथ जाने में पसीना छूट रहा है। …. गो टू हेल।’ – कहकर चला गया।
राघव के हाथ से चाट का पेपर-प्लेट छूट गया। उसका सिर दर्द से पुनः फटने लगा। लगा कि वह सड़क पर ही गिर जाएगा। पानी का बोतल खरीदा और लाजपत राय मार्केट की एक सीढ़ी पर बैठकर पूरा बोतल सिर पर उड़ेल लिया। सितंबर की झनकती दोपहर की ढलती उम्र और तीखी होती जा रही थी। राघव को समझ में नहीं आ रहा था कि यह मानवता का ह्रास है या अति-सतर्कता का विकास? बर्बर जीवन से यहाँ तक पहुँचने के बाद आज आदमी, आदमी से ही डर रहा है। भय और आतंक का ऐसा साम्राज्य फैला है कि पावन-से-पावन रिश्ते भी कलंकित होते जा रहे हैं। किस पर कोई विशवास करे? सही तो कर रही थी मनु। क्या पता वह साधारण सा दिखने वालो प्रौढ़ ड्राइवर असाधारण हो और उसके मुखौटे के पीछे कोई नरभक्षी पिशाच हो? अब तो परिचित चेहरों के पीछे से भी नर-पिशाच आ जाते हैं। वह तो अपरिचित था।
सच तो है, कहाँ सुरक्षित है स्त्री? रोज तो आॅटो, कैब्स, बसों और लोगों के घरों में, द्वारों पर, हर जगह तो नारी के देह से खेला जाता है। खेलने का प्रयास किया जाता है। खूनी दाँतों से घिरी नारी देह अगर भय और आतंक के कारण किसी अपरिचित पर विश्वास नहीं कर पा रही है तो यह अनायास थोड़े ही है? उसे तो कभी और कहीं भी पैरों के नीचे बिछी जमीन बना दिया जाता है या चाकुओं से गोंद कर उसका अस्तित्व ही मिटा दिया जाता है। ….. इस समय राघव के मानसिक दबाव का शायद चरम था। उसे लगा कि अब घर वापस जाना चाहिए।
….. राघव अभी-अभी काॅलेज से निकला है। सुन्दर, शांत व शीलवान राघव पढ़ाई पूरी कर के आई.टी. सेक्टर में दिल्ली-एन.सी.आर. में इंटरव्यू देता रहता है। पिता सूर्यपाल पी. डब्ल्यू. डी. में क्लर्क हैं। माँ भी एम. सी. डी. में कार्यरत। राघव है तो इकलौती संतान, मगर संस्कारवान। उसे न किसी प्रकार के घमण्ड में रखा गया और न वह रहता है। वसंतकुंज के पॉश इलाके में अपना घर है मगर गाड़ी के नाम पर एक स्कूटी। उससे अधिक के लिए पब्लिक ट्रांसपोर्ट। वैसे तो वसंतकुंज जैसे जगहों के लोग घर के प्रत्येक सदस्य के लिए चारपहिया वाहन रखते हैं। यह दिल्ली में भयंकर ट्रैफिक-जाम का सबसे बड़ा कारण है।
बचपन से ही सीमित साधनों में असीमित प्रसन्न रहने की परिस्थिति ने राघव को एक संवेदनशील युवक बना दिया। जब उसके पिता सूर्यपाल स्कूटी लेकर निकलते तब वह देखता कि माँ कितना समझाती। जब कभी माँ निकलती तो सूर्यपाल। जब कभी राघव निकलता तो दोनों। माँ बाकी गाड़ी वालों को खूब भला-बुरा कहती। माँ की माने तो किसी अन्य को तो ड्राइविंग आती ही नहीं। तभी तो रोज दुर्घटनाएँ होती हैं। वह जब सड़क पार करती है, तो कितना डरती है। बिना फूट-ओवर, ज़ेब्रा-क्राॅसिंग, अंडरपास या बत्ती के वह सड़क पार नहीं करती है। उनकी नज़र में सड़क पर साँस रोक कर दौड़ती गाड़ियाँ यातायात संसाधन से अधिक मृत्यु का साधन बन गई हैं। ……..
राघव अपने मानसिक दबाव को कम करने के लिए मन को इधर-उधर लगाने लगा। माँ के डर का भी एक कारण है। …… वह सड़क पार करके जामा मस्ज़िद की ओर बढ़ने लगा। वह भी सब-वे से ही पार करेगा।
अब वह चिड़िया बेचने वालों की दुकानें पार कर रहा था। वहाँ लोग पिंजरे में बंद कर के किकसम-किसिम के पक्षियों को बेंचते हैं। वे पक्षी अपनी पिंजरे की ही उस दुनिया में छटपटाते हैं, एक-दूसरे को नोचते हैं और थक-हार कर किनारे दूबक जाते हैं। जब राघव चिड़ियों की कलरव में खोया था तो उसे लगा कि यह पक्षियों की नहीं, असंख्य मानवों की चीख-पुकार है। लगा कि चाँदनी चैक की भीड़ या जामा मस्जिद की पावनता पर कोई बम फेंक दिया हो। लगा कि कबूतर, तोते, मैना, कौवे तो पंख फड़फड़ाकर उड़ गए मगर बेचारे मनुष्य बेजान होकर निढ़ाल गिर पड़े। लगा कि जो जीवित है, उसका भी अंग भंग हो गया है। लगा कि चारों ओर अनगिनत लाशें पड़ी हैं। लगा कि उन लाशों में सबसे नीचे वही है। लगा कि उसकी माँ का भय अट्टहास कर रहा है। लगा कि अब वह भी नहीं बच पाएगा। तभी सब-वे आ गया। उतरती सीढ़ी पर जैसे ही पैर रखा तो होश आया कि दुकानदार पिंजरे के पक्षियों को दाना दे रहे हैं और वे शोर कर रही हैं।
राघव अंदर तक डरा हुआ था। वह शीघ्रता से घर पहुँचना चाहता था। वह माँ की गोद में छुपना चाहता था। वह चाहता था कि उसके पापा उसे दुलार करें। अपने काम को छोड़कर उसे साहस दें। उसने सोचा कि आॅटो ले लूँ, पर अगले ही पल मनु याद आयी और डर गया। क्या करे? दौड़ कर घर पहुँचने का मन किया। कुछ दूर बढ़ा भी। स्वयं को असहाय पाकर बस का सफर ही सही समझा।
बस स्टैंडों के अतिरिक्त लाल बत्तियों पर हरियाली के इंतजार में रूकती और फिर उतरती-चढ़ती सवारियों की भीड़ से राघव सहम जाता। वह सबके चेहरे को पढ़ना चाहता था। जैसे पहचानना चाह रहा हो। जैसे कौन डराएगा?…. कौन जान ले लेगा??
घर पहुँचने पर राघव ने देखा कि सड़क पर काली पाॅलिथीन में कुछ पड़ा हुआ है। संध्या का स्याह साया विस्तार ले रहा था। अस्पष्टता गहराती जा रही थी। अपने घर के सामने पड़ी उस पाॅलिथीन को देखकर वह डर गया। लगा कि कोई कुछ जानलेवा उपकरण रख दिया है। चिल्लाया – ‘माँ।’
राघव की पुकार बहुत तेज नहीं थी, पर माँ ने सुन लिया। दौड़ी आयी। बाहर का लाइट आॅन किया। – ‘क्या है राघव?’
माँ राघव के पास आ रही थी कि उसने रोका, – ‘यह क्या है माँ?’
माँ ने देखा – ‘शायद तेरी पार्वती बुआ ने कचरा फेंका है। ….. दीदी को लाख समझाओं, कोई फर्क नहीं पड़ता। …. सरकार चाहे लाख स्वच्छ भारत अभियान जैसी अच्छी से अच्छी कल्याणकारी योजना चलाए, मगर देश का कुछ नहीं होने वाला।’ – माँ ने पाॅलिथीन उठाकर पास के ‘यूज़ मी’ के बाॅक्स में डाल दिया।
‘मैं समझाऊँ क्या बुआ को? एकदम डरा दिया।’
माँ ने अंदर आते हुए राघव को समझाया – ‘वह तो खुद ही डरी रहती है। अभी आयी थी। कह रही थी कि उसकी माँ की तबीयत ठीक नहीं है। दवाइयाँ काम नहीं कर रही हैं।’
माँ पता नहीं क्या-क्या कहने लगी मगर राघव के दिमाग में अब उसके बगल की उसकी मुँहबोली बुआ पार्वती बस गयी। वे तीन बहनों और एक भाई में दूसरे नंबर की हैं। बड़ी बहन ने तो विवाह कर लिया मगर राघव को यह नहीं पता कि बाकी की शादी क्यों नहीं हुई। सभी अच्छी नौकरी करती हैं, मगर कारण कौन जाने? सैंतालिस की हो गई हैं। …. अभी एक दिन राघव की माँ से अपनी दिनचर्या बताने लगीं और कहने लगीं कि – ‘अब तो डर लगता है। शादी की नहीं। माँ सहारा लग रही थी। अब लगता है कि माँ भी बहुत दिनों तक साथ नहीं देगी। भाभी क्या होगा मेरा? मेरा तो कोई नहीं है। आप तो जानती हैं कि भाई-बहन में कितना भी प्रेम रहे, माँ-बाप की छाया सिर से उठते ही उन रिश्तों में काँटे उग आते हैं। मैं तो अकेले में कभी-कभी सोच कर सिहर जाती हूँ। अब लगता है कि सच ही कहा गया है, जीवन की गाड़ी एक पहिए से नहीं चलती है।’
राघव पार्वती बुआ के डर को सोचते-सोचते स्वयं के डर के विषय में भी सेचने लगा। तभी एक कप चाय लेकर माँ आयी तो देखी कि वह अपने बेड पर निढाल पड़ा है। – ‘क्या बात है बेटा? तबीयत तो ठीक है न?’
कोई उत्तर न पाकर लगा कि बेरोजगारी का तनाव है। उसके बालों को सहलाते हुए हिम्मत देने लगी – ‘कोई बात नहीं बेटा, प्रयास करते रहो। तुम्हें तो बहुत अच्छी नौकरी मिलेगी।’
उत्तर में राघव अपने आक्रांत चेहरे पर हल्की मुस्कुराहट लाते हुए उठा और चाय की चुस्की लेने लगा।
माँ-बाप को ईश्वर का अवतार कहा जाता है। वे ईश्वर की ही भाँति अंतर्यामी भी होते हैं। संतति की आंतरिक भावना को भी समझ जाते हैं। अब सूर्यपाल जी भी आ गए। – ‘यह तो तुम्हारे न्यूज़ देखने का समय है न राघव? …… चलों। टी.वी. आॅन किया हूँ।’
‘पापा, आई वान्ट रेस्ट नाउ।’
‘बेटा! …. अभी एक पाकिस्तानी रिपोर्टर का इंटरव्यू आने वाला है। वह दावा करता है कि उसने दाऊद को देखा है।’
माँ समझ गई कि इस समय राघव को कुछ अच्छा नहीं लग रहा है। सूर्यपाल को लेकर चली गई। जाते हुए माँ ने पूछा – ‘ये दाऊद कौन है?’
ड्राइंग रूम से आवाज आ रही थी। पहले तो अपनी पत्नी की नादानी पर सूर्यपाल ने ठहाका लगाया और शायद चाय की चुस्की लेते हुए बताने लगे। – ‘अरे भाग्यवान! …. दाऊद को नहीं जानती? …. मुम्बई हमले का मास्टर माइंड कहा जाता है उसे। …. उसे हत्या और आतंक का जीता-जागता राक्षस कहा जाता है। उसका नाम सुनते ही भय का साम्राज्य फैल जाता है। ……’
शायद सूर्यपाल ने एक और चुस्की ली। राघव उसके आगे कुछ सुन नहीं पाया। उसकी आँखों के सामने तो भय और आतंक का दूसरा ही चेहरा नाचते गला। ….. वह तार के घेरे को पार करने में अधनंगी हुई युवती का भय। उस औरत का दुपट्टा छिन लेने पर युवती के लिए फैला आतंक। ….. उस बुढ़िया का उसके बेटे के ठिक न होने का भय। उसके थैले के नहीं मिलने पर उसके लिए फैले आतंक का रूप। ….. उस तरूणी का अकेले आॅटो पर न जाने के निर्णय वाला भय और आतंक। माँ का भय और आतंक सड़क पर दौड़ती गाड़ियों को देखकर। भय और आतंक पार्वती फुआ के बेसहारा होने का…..उस काली पाॅलिथीन का……..।
राघव को लगा कि आज हमारे चारों ओर विश्वास से अधिक भय व्याप्त है। उसे लगा कि जहाँ भी भय और आतंक है, वहाँ दाऊद है। लगा कि उसने तो अनेक दाऊद को देखा है। रोज देखता है। रोज डरा है। रोज भयभीत हुआ है। सब देखते हैं। सब डरते हैं। …..राघव सो भी नहीं पा रहा था। माँ को लगा कि नौकरी न मिलने के तनाव के कारण बेटे का सिर दर्द कर रहा होगा। एक अंजलि तेल लायी और बेटे के सिर में लगाने लगी। माँ के स्नेहिल स्पर्श से पता नहीं कब राघव गहरी नींद की आगोश में खो गया।
………….
-केशव मोहन पाण्डेय

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