मैं कविता नहीं लिख पाता

मैं कैसे लिखूँ कविता
कल्पनाओं के संसार की
प्रेम के ऐतबार की
मखमली सपनों की
मेरे, सिर्फ मेरे अपनों की?
क्योंकि जब चाहता हूँ लिखना
कोई टीस उभार देता है
मन को कुरेद जाता है
और कर देता है छलनी
उन काल्पनिक भावों को
तब उगने लगते है
सिर्फ बंजर यथार्थ
चोट खाये सम्बन्ध
झुक-झुककर किये गए अनुबंध
जो अंकित हो आते हैं
विचारों की शिला पर
समय के दबाव से,
दुखी हो जाता हूँ
अंतर में ताजा हो आए
असीमित घाव से।
एक की दवा करता हूँ
दूसरा दुःख देता है
तब मुझे
कपोल-कल्पित लगता
कि रिश्ता सुख देता है।
तब मैं कविता नहीं लिख पाता
उगने लगते हैं शब्द
कागज़ की बुनियाद पर
रिसते घावों की स्याही से
मेरी पीड़ा बनकर।
——-
– केशव मोहन पाण्डेय

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