मैं डरता हूँ

यह सत्य है
मैं डरता हूँ।
मैं डरता हूँ
कि रिश्ते टूट न जाएँ
अपने छूट न जाएँ
सिर्फ इसीलिए
आइना नहीं दिखता
अतार्किक या तार्किक
ज्ञान की बातें नहीं समझाता
हाँ, स्वयं तो
रोज आइना देखता हूँ
और प्रयास करता हूँ
अपना रूप सँवारने का
जीतने का भी
और प्रसन्नता से हारने का।
मेरे लिए
कई बार
महत्त्वहीन हो जाता है
बाजी मार जाना
कई बार
समझ में आता है
आदमीयत का सही अर्थ
हँसते-मुस्कुराते
हार जाना।
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– केशव मोहन पाण्डेय

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