मैं मरा नहीं हूँ

मुझे विश्वास है
मैं मरा नहीं हूँ
और मरूँगा भी नहीं
ये अलग बात है कि
कीचड़ के किनारे खड़ा होकर
पत्थर नहीं मरूँगा कीचड़ में
उसमे उगते कमल को
दूर से ही प्रणाम करूँगा
होता है तो हो जाए
पथांतर
मैं मरूँगा नहीं,
अपना काम करूँगा।
जी हाँ,
मुझे रिश्ते नहीं चाहिए
मेरा पीठ थपथपाने के लिए
परंतु नहीं रहूँगा साथ तुम्हारे
केवल शोषित होने के लिए भी।
मुझे घृणा है तुमसे
तुम्हारे व्यापार से
जहाँ मिलता है मान
तुम तभी मान देते हो दूसरे को
तुम्हें नहीं रास आता
कभी भी
घाटे का सौदा
माँ से भी
बहन-बेटी-बंधू-बांधवों से
तुम तो
नोच लेते हो कफ़न
शवों से भी।
मैं नहीं नोचने दूँगा
अपना वसन तुम्हें
ये कलम थाती है मेरी
नहीं लूटने दूँगा अपना धन तुम्हें
क्योंकि
मुझे विश्वास है
मैं मरा नहीं हूँ
और मरूँगा भी नहीं।

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