मैं सूरज हूँ

कुण्ठा का कोहरा
अज्ञानता का अंधकार
पैबंदों के विचार
और कूप-मुडुकी संसार में
सूरज आते ही
प्रकाश भर जाता है –
मैं सूरज हूँ।
मैं वह सूरज हूँ
जिसे नहीं ढका जा सकता
किसी गुट के बादल से
नहीं बंद किया जा सकता
चाशनी-युक्त
संकीर्णता के डिब्बे में
और ओढ़ाकर
सम्मानों का चादर
घेरा भी तो नहीं जा सकता
किसी लक्ष्मण-रेखा से
किसी रावण द्वारा
हरण भी नहीं हो सकते मेरे विचार
और कौन कस सकता है
मेरी रौशनी को
मिथ्या की मुट्टी में!
चाहे कोहरा लाख हो घना
ओछे विचारों का अंबर
स्वार्थ की शबाशी से
मृत मानसिकता पर लाख हो तना
या छा गया हो बादल अपमान का
या बाँध पट्टा गले में सम्मान का
अपने घर में कोई बंद करना चाहे
बाधित करता रहे मेरी राहें
फिर भी
चिरते हर तमस को
होना दिवस-पथ पर अग्रसर
कौन रोकेगा
कभी किसी सूरज को –
मैं वह सूरज हूँ।
हर उपासक कलम का
एक सूरज होता है
वही सूरज होता है
जिसका आगमन
न चाहकर भी
दुनिया को मानना पड़ता है
सूरज हर हाल में
प्रकाश देता है
अंधकार हरता है।
—-
केशव मोहन पाण्डेय

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