लड़की

लड़की
चिड़िया बनकर
उड़ान भरती जा रही है
आकाश में
और पंख मारती है
अनंत छूने को ।
लड़की
नदी की लहर बनकर
बहती जा रही है
विराट की ओर।
लड़की
किरण बनकर
घेरती जा रही है –
कवि-कल्पित स्थान को।
लड़की
स्त्री बनकर
बरसती है
नेह की बदली जैसी
और, लड़की
बन रही है सब कुछ।
परन्तु लड़की
आज भी
नहीं बोल पा रही है
ठीक से ,
लड़की, आज भी
धरती बनकर
बिछती जा रही है
पाँवों के नीचे।
———–
– केशव मोहन पाण्डेय

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