लड़ना होगा जंग

ऐसा ही होता है
मौन का विलाप
और शोर की क्रांति
जैसे शांत है धरती
बेटियों के नोचे जाने पर
छिन्न-भिन्न किये जाने पर भी
उनके अस्मत/वज़ूद को।
और आह्लादित हो रहें है
जननी को
कलंकित करने वाले कायर
अपने पुंसकत्व पर
जो उदहारण बन रहे है
नपुंसकता के।
डरने लगी है हर बेटी
हर जननी भी
बेटी होने
बेटी जनने से
सदा-प्रसूता वसुधा भी।
अगर डर गई जो
मौन होती धरती/माँ
बंजर हो जाये कोख तब
सहनशील माताओं का भी,
जल जाएगी हरियाली सारी
नहीं बचेगा
अस्तित्व दुनिया का।
अस्तित्व पर तुम्हारे
निरंतर लगता रहा है ग्रहण
जन्म लेने के पहले से
मरने के बाद तक।
करना होगा सबल
मन को
धधकानी होगी ज्वाला
हृदय में
तोड़ना होगा मौन
लड़ना होगा एक जंग
कलंकित करने वाले स्वज से
पराजित करके अपने डर को।
———–
– केशव मोहन पाण्डेय

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