वर्षों बाद भी ….

टूटते  हैं कई धागे नेह के
हो के तार-तार।
वर्षों बाद भी प्रिये हृदय से
तू ही मेरा घर-द्वार।

स्मृति तेरे दीप्त नयन की
हर क्षण उद्वेलित कर जाती
सच कहता सौगंध तेरी तू
पल में विपदा हर जाती
तूने सजा दी मेरी दुनिया
चहूँ ओर बरसे प्यार।
वर्षों बाद भी प्रिये हृदय से
तू ही मेरा घर-द्वार।

बंजर मन को स्नेह -उर्मि से
सरस-सरल कर डाले तुम
मीत! मिताई की मरहम से
दूर किए सब छाले तुम
अवलम्बन हो गए तुम मेरे
मैं तेरा सोलह सृंगार।
वर्षों बाद भी प्रिये हृदय से
तू ही मेरा घर-द्वार।

तोड़ दिए कुंठा का दर्पण
खोल के कपट-कपाट
ना जाने तुम बिन हे संगी!
जाता किस-किस घाट
कर दिए मेरी काया कंचन
पी कर सारे ख़ार।
वर्षों बाद भी प्रिये हृदय से
तू ही मेरा घर-द्वार।

ज्वलन-वृत्ति का मानव हूँ मैं
तू चन्दन का लेप
अतल हृदय में निशदिन करता
मैं तेरा अभिषेक
सात जन्म क्या युगों-युगों तक
करूँ तेरा अभिसार।
वर्षों बाद भी प्रिये हृदय से
तू ही मेरा घर-द्वार।
**** केशव मोहन पाण्डेय ****

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