वृद्धावस्था की पीड़ा

वृद्धावस्था उस अवस्था को कहा गया है जिस उम्र में मानव-जीवन काल के समीप हो जाता है। वृद्ध लोगों को विविध प्रकार के शारीरिक व मानसिक रोग लगने की अधिक सम्भावना होती है। उनकी समस्याएँ भी अलग होती हैं। वृद्धावस्था एक धीरे-धीरे आने वाली अवस्था है जो कि स्वभाविक व प्राकृतिक घटना है। वृद्ध का शाब्दिक अर्थ है बढ़ा हुआ, पका हुआ, परिपक्व। वर्तमान सामाजिक जीवन-शैली में वृद्धों के कष्टों को देखकर मन में हमेशा ही अनिर्णय भरा प्रश्न बना रहता है कि बुढापा एक अभिशाप है या वरदान? हमारी संस्कृति और आदर्शों के आधार पर आज की सभ्यताओं को ध्यान में रखकर देखा जाय तो आयास ऐसा लगता है कि खैर, जो भी हो, वह तो ईश्वर का अवदान है। बुढ़ापा जब दस्तखत देता है, तब यौवन का उन्माद मद्धिम पड़ जाता है। शेर भी खरगोश बन जाता है। जीवन के राग-रंग, आकर्षण-विकर्षण के साथ ही जीने का उद्देश्य ही बदल जाता है। लिप्साओं में लीन मानव के लिए तो उसके पैरों तले से जमीन भी खिसक जाती है। लोग सात्विक हो जाते हैं। वैरागी हो जाते हैं। बुढ़ापें में बिस्तर पर लटेते ही नींद आ जाती है। करवट बदलते ही टूट जाती है।
सौभाग्य से मुझे वृद्धों का सानिध्य मिला है। मैंने उनमें बतरस का आधिक्य देखा है। साथ-ही-साथ जीवन के कटू सत्यता को भी उनसे सुना है। मैंने पाया है कि बुढ़ापे में हमारे ये आदरणीय जन एक पावन ज्ञान-स्रोत हो जाते हैं। अनुभव की किताब को पढ़ चुकने वाले हमारे बुजुर्गों का मन बीते हुए यादों में गोता लगाता रहता है। वे कभी जीवन से उबे हुए लगते हैं तो कभी आसक्ति में डूबे हुए लगते हैं। कभी वैराग्य का मूर्त रूप नज़र आते हैं तो कभी तो उनके लिए आगे का रास्ता ही नहीं दिखता है। कभी उनके लिए अकूत अर्थ का कोई अर्थ नहीं होता तो कभी वे व्यर्थ में हताश से लगते हैं। लगता है कि उन्होंने जीने का सामर्थ्य ही खो दिया है।
हमारे समाज में अनेक उदाहरण मिल जाते हैं, जिससे कि पता चलता है कि अगर ये बूढ़े नहीं होते तो हमारा जीवन और कितना बोझिल हो जाता। हमारा समाज अपने वृद्धों को भले ही बोझ समझता है, उनके सानिध्य को डरावना अनुभव करता है लेकिन हम उनकी कुर्बानियों को कैसे भूल जाते हैं? वे तो अपने उम्र के पड़ाव में अपनी ही औलाद की सेवा-भाव को एक अनुकंपा समझते हैं। बुढ़ापे में लगी चोट तो बड़ी ही घातक होती है। उनकी संतानें जब उन्हें भूल जाती हैं तो जाने-पहचाने चेहरे भी अजनबी से नज़र आने लगते हैं। जब वृद्धों की इंद्रियाँ भी साथ छोड़ देती हैं तब वे चारों ओर से असहाय अनुभव करने लगते हैं। वैसे तो प्रत्येक व्यक्ति तो हमेशा यह स्मृति रखना चाहिए कि यह कहानी हर एक के जिंदगी मे दोहरायी जाती है। जानते सब हैं, परन्तु मानता कोई नहीं। सभी को चिर यौवन चाहिए। हम सभी को उम्र के उस पड़ाव से गुजरना है, लेकिन सभी उस उम्र के मुसाफिरों के दूर रहना चाहते हैं। हम सभी को समझना चाहिए कि बुढ़ापा अभिशाप या वरदान नहीं है, यह तो उम्र की छेड़खानी है। ईश्वर का अवदान है। आर.डी.एन. श्रीवास्तव की कुछ पंक्तियाँ –
जि़न्दगी एक कहानी समझ लिजिए।
दर्द की लन्तरानी समझ लिजिए।
चेहरे पर खींचे ये आक्षांश-देशान्तर
उम्र की छेड़खानी समझ लिजिए।।
आज समाज के बदलते हुए मापदंड़ों और मानकों ने बुढ़ापे को शापित अवस्था जैसा चित्रित कर दिया है, फिर भी हमारे वृद्धजन भी अपनी समझ से इस अवस्था में होने वाले तनावों से छुटकारा पा सकते हैं। जीवन के अंतिम चरण को सुखपूर्वक भोग सकते हैं। समय के साथ बूढ़े माँ-बाप के अतिरिक्त उनकी संततियों को भी एक-दूसरे को समझना पड़ेगा। आज रोज के समाचारों, घटनाओं पर ध्यान दें तो कोई न कोई ऐसी घटनाएँ मिल ही जाती हैं जिसमें पितृहंता पुत्रों का वर्णन होता है। मातृहंता संतानों की कहानी होती है। सास-श्वसुर की काल बनी बहुरानी का चित्रण होता है। समाज में ऐसी अराजकता फैल रही है तो क्या, इससे भयभीत होकर सकारात्मकता को तो नहीं छोड़ा जा सकता? इतिहास के पन्नों को देखा जाय तो अनेक ऐसे शासकों का वर्णन मिलता है जो अपने परिजनों की हत्या पर अपनी बुलंद शासनों की दुर्ग तैयार किए हैं। वैसे अन्याय तो हमेशा ही नकारने योग्य ही होता है। हमें भी नकारना चाहिए। अनुसरण तो सद्मार्ग का ही किया जाता है। समाज के इस अंधकारमय माहौल में हंताओं का तादाद बढ़ता जा रहा है तो क्या? आज भी श्रवण कुमारों की कमी नहीं हैं। आज भी अनेक सपूत हैं जो वृद्धों के सानिध्य से ‘चत्वारि तस्य वर्धयंते’ को याद रखते हैं।
मैं वृद्धों की समस्या पर केंद्रित एक लेख पढ़ रहा था। लेख बहुत ही सलीके से पीढि़यों की समानता के माहौल बनाने पर आधारित था। उसमें वृद्धों के लिए अनेक ऐसे नुस्खे बताए गए थे जिससे बुढ़ापे को एक निरासक्त भाव से व्यतीत किया जा सकता है। मैं उन बातों को मिथ्या नहीं मानता, बस इतना जोड़ना चाहता हूँ कि अशेष स्नेह-राशि लुटाने वाले हमारे माता-पिता ने तो हमारे शैशव-काल में कभी यह नहीं सोचा होगा कि अपने बच्चे के लिए क्या करें, क्या न करें। मैं तो बस आज की पीढ़ी से यह चाहूँगा कि जीवन को विदा कहने जा रहे अपने माता-पिता के प्रति हमें भी वैसा ही विचार रखना चाहिए, जैसा वे हमारे शैशवावस्था में हमारे लिए रखते थे। हमें उनके हर अभिलाषाओं को पूरा करने का प्रयास करना चाहिए।
वृद्धावस्था में वृद्धों में मान-सम्मान को आकांक्षा बढ़ जाती है। वे एकाकी अनुभव करने लगते हैं। उस स्थिति में घरवालों को चाहिए कि वृद्धों को उचित सम्मान दें। इस अवस्था में खाली बैठना अभिशाप लगता है। हमें यह प्रयास करना चाहिए कि यथासंभव उनकी रुचि के अनुसार ही उनका दैनिक समय व्यतित हो। हमें अपने वृद्धों को खाली समय में ईश्वर आराधना तथा किसी धार्मिक ग्रंथ को पढ़ने के लिए प्रेरित करना चाहिए। हमें प्रयास करना चाहिए कि घर के बच्चे वृद्धों के पास जायें और खेले। हमारे वृद्धों को भी अपने सामथ्र्य के अनुसार घर-गृहस्ती के कार्यों का प्रतिपादन करना चाहिए। उन्हें निराशावादी दृष्टिकोण को त्याग कर आशावादी विचारधाराओं को पल्वित करना चाहिए।
यह संसार जीवन से है। जीवन है तो जन्म है। जन्म है तो जीवन की अनेक अवस्थाएँ हैं। बालमन है। यौवन है। बुढ़ापा है। माँ के गोद से डंडे के सहारे से आगे भी जीवन का सफर ज़ारी रहता है। इसकी अनिवार्यता भी है। वास्तविकता भी है। समस्या तब जन्म लेती है जब युवाओं द्वारा अपने परिजन-वृद्धों को उपेक्षित कर दिया जाता है। उन्हें अकेलापन से लड़ने के लिए बेसहारा छोड़ दिया जाता है। जब वे चल बसते हैं तो स्मृति-शेष कार्यक्रमों में सदानिरा नेत्रों से अपनी पीड़ा व्यक्त की जाती है। घर के कोने-कोने में उनका वास समझा जाता है। तुलसी का पुरवा उनका आशीष है। घर का चैका उनकी कृपा। दीवारों से लेकर दर तक माँ-बाप और वृद्धों के सुवास से घर एक मंदिर बन जाता है। यह कहते तब जबान नहीं थकती कि मेरे माँ-बाप भले जीवित नहीं हैं, मगर वे कहीं गये नहीं हैं। वे यहीं हैं। हमारे आस-पास। हमारी बातों में। हमारी सभ्यता में। संस्कारों में। किसी मंगत को दिए गए दान में। किसी राही को दिए गए एक गिलास पानी में। किसी भूखे को दिये गये निवाले में। ऐसी भक्ति व्यक्त करने वाली संतानें भूल जाती हैं कि माँ-बाप चल गुजरने के बाद यहाँ नहीं रहते। सिर्फ उनकी स्मृतियाँ रहती हैं। वे जीवित नहीं रहे। अतः हमें अपने वृद्धों के जीवन को सहज बनाने का प्रयास करना चाहिए।
यह तो प्रगति-पथ की विडंबना है कि समूचे परिवार पर कवच की तरह से छाया रखने वाले वृद्धावस्था में अकेला, उपेक्षित, बहिस्कृत तथा कटूक्तियों से बिध-बिध कर जीने को विवश होते हैं। वैसे देखा जाए तो वृद्धों को लेकर ये समस्याएँ अचानक नहीं हुई हैं, यह सब तो आधुनिक उपभोक्ता वाद तथा सामाजिक क्षरण का परिणाम है। नई पीढ़ी की परिवर्तित सोच का परिणाम है। सामाजिक स्थिति के दौड़ का परिणाम है। भौतिक सम्पदाओं के भूख का परिणाम है। पारिवारिक संकीर्णता का परिणाम है। व्यक्तिगत जीवन-शैली का परिणाम है। सामाजिक विघटन का परिणाम है। आज का अधिकांश युवा-वर्ग यह भ्रम पाल लेता है कि संयुक्त परिवार व्यक्तिगत उत्थान में बाधक है। पारिवारिक रिश्तों में रहने पर व्यावसायिक वृद्धि नहीं हो सकती। वर्तमान परिप्रेक्ष्य में स्वहित से प्रभावित होकर मानवीय संवेदना को लकवा मार गया है। दिन-पर-दिन मूल्यों का अवमूल्यन हो रहा है। रिश्ते-नाते उपेक्षित अस्पताल में पड़ा अपनी अंतिम साँसें गिनता कोई असाध्य रोगी हो गया है। हमारा पालन-पोषण करने वाला वृद्ध दुख भोगकर जीवन जीने को बाध्य हो जाता है। हमें किसी भी परिस्थिति में निरन्तर यह प्रयास करना चाहिए कि किसी को भी वृद्धावस्था में सामाजिक उपेक्षा का दर्द नहीं अनुभव करना पड़े।
नयी जीवन-शैली और नये मूल्य वृद्धों को नकारते हैं। वृद्धों से मुँह मोड़ते हैं। प्रगति की तीब्र गति उन्हें असहाय छोड़ देती है। उन्हें उपेक्षा का दर्द देते हैं। उनसे लोग अभिवादन की औपचारिकता तक नहीं निभाना चाहते। घर के वृद्धों की जिम्मेदारी को लेकर भाइयों में विवाद होने लगता है। विवाद उनके सामने ही बढ़ जाता है, तब बेचारे हमारे बुजुर्ग हमसे सहानुभूति जोहते हैं। प्रीत पगे दो शब्द की आशा रखते हैं। अपनी भी बात कहना चाहते हैं। वे अवस्था की बोझ और शारीरिक अक्षमता की स्थिति में भावात्मक साहचर्य चाहते हैं। हाय रे विडम्बना! नगरों, महानगरों में ही नहीं, गाँवों-देहातों में भी लोगों मेला-बाजार में भी वृद्धों के साथ नहीं जाना चाहते। पार्टियों के उमंग, पर्यटन के उल्लास या पिकनिक के जोश में वृद्धों को अचानक सामने आ गये खतरनाक मोड़ का ब्रेकर समझ कर घर पर ही छोड़ दिया जाता है। ऐसे में घर की देखभाल और दो जून की रोटी तक सीमित बच्चों को पारिवारिक सहयोग मिलना चाहिए। उन्हें आध्यात्मिकता की ओर जबरन जाने के लिए नहीं बाध्य करना चाहिये। जिनके लिए उनकी संतति ही भागवान है, उनका मन किस भगवान में रमेगा भला? ऐसे में घर के प्रत्येक सदस्य को चाहिये की वृद्धों को संवेदनाओं से जोड़े रखा जाए। उनके रोटी, कपड़ा, मकान और स्वास्थ्य का निरन्तर देखभाल करना चाहिए। स्वास्थ्य एवं प्रशिक्षण कार्यक्रमों में उनकी सहभागिता लेनी चाहिए। वृद्ध अनुभव के अथाह समुद्र होते हैं। 1990-92 के दौर में ही संयुक्त राष्ट्र महासभा में वृद्धों के पक्ष में अनेक सिद्धान्तों को पारित किया जा चुका है, परन्तु समस्या गहराती ही जा रही है।
अपनी समस्याओं के लिए बहुत हद तक हमारे वृद्धजन भी जिम्मेदार हैं। इस अवसर पर मुझे ‘दूर के ढोल सुहावने हो हैं’ पूरा लेख याद आ रहा है। वास्तव में समस्या वहीं हैं। युवावर्ग अपने भविष्य को उज्ज्वल समझता है। वह अपना बेहतर जीवन आने वाले कल में देखता है, हमारे वृद्धजन अपने बीत चुके कल को बेहतर समझते हैं। वे भूत को वर्तमान में लाना चाहते हैं। संघर्ष का मुख्य कारण यही होता है। बाप-बेटे के उम्र में जितना अंतराल होता है, उससे दोगुना अंतराल उनके सिद्धान्तों में होता है। हर नयी पीढ़ी प्राचीन हवेली को खंडहर समझकर तोड़ती है। वह भूल जाती है कि उस हवेली का रंगमहल किस किमती हीरे से सजाया गया है। बात भी तो सत्य है। नवीनता का वरण सब करते हैं। अगर कोई प्रचीनता को स्वीकारता है तो समाज उसे नकार देता है। समाज से दूर आदमी या तो जाहिल बनकर जीएगा या पागल। वृद्ध हमेशा ही घर के हर छोटे-बड़े काम में टांग अड़ाने से बाज नहीं आते। उन्हें उनका अनुभव ही सर्वोपरि है। नव-समाज वृद्धों के अनुभव को आदेश या अनुदेश समझने लगता है। क्या व्यक्त किया है निदा फाज़ली साहब ने, –
वक्त-ए-पीरीं दोस्तों की बेरूखी का क्या गिला,
बच के चलते हैं सभी ढहते हुए दीवार से।।
वृद्ध तो अपने चिड़चिड़े जीवन को जीने के लिए विवश हैं। कुछ भी हो, हमें उनका आदर करना चाहिए। वृद्धाश्रम इसका कभी हल नहीं है। वृद्धाश्रम भले ही सेवा भाव से प्रारंभ किये जाते हैं, लेकिन उनका वर्तमान स्वरूप अर्थ-भाव हो गया है। वृद्धाश्रम आज मात्र पैसे वालों के लिए ही मृत्यु का प्रतीक्षालय बना हुआ है। धिक्कार है उस मानवता को जो वृद्धों का तिरस्कार करता है। पशु से भी गिरा है वह व्यक्ति जो अपने घर के वृद्धों को कभी बधुआ मजदूर तो कभी बोझ समझता है। यदि परिवार के वृद्ध कष्टपूर्वक एवं रुग्णावस्था में जीवन व्यतीत कर रहे हैं तो धिक्कार है उस घर को। उस मानवता को और सामाजिक सोच को। आज के युवक भले ही नित-नूतन लक्ष्य को पाने में लगे हैं, लेकिन जीवन के अंतिम पड़ाव पर पड़े वृद्धों की सेवा करना भी युवाओं का ही पुनीत कर्त्तव्य है। वृद्धों का सानिध्य किसी अछूत बीमारी का आमंत्रण नहीं, आंतरिक शुचिता का अनुष्ठान है। मन को बोझिल करने वाला तनावग्रस्त त्रासदी नहीं, अनुभव के गीता की पावन सूक्तियाँ हैं। वृद्धजन अपने अनुभव से हमारे साहस और संघर्ष के साथ ही हमारे पुरुषार्थ को बढ़ाते हैं। जीवन की वास्तविक परिस्थितियों का दर्पण दिखाकर हम पर ज्ञान की वर्षा करते हैं। हम में विनम्रता को बीज बोकर यश से सम्मान योग्य बनाते हैं। मनुस्मृति में वृद्धों के सानिध्य के लाभ का उत्तम वर्णन मिलता है। नित्य बड़ों की सेवा और प्रणाम करने वाले व्यक्ति की आयु, विद्या, यश और बल में निरंतर वृद्धि होती है। –
अभिवादनशीलस्य नित्यं वृद्धोपसेविनः।
चत्वारि तस्य वर्धन्ते आयुर्विद्या यशो बलम्।।
यह तो सत्य है कि इस चराचर में सबको वृद्धावस्था प्राप्त करना है। इस धरा पर प्रत्येक व्यक्ति अपरिहार्य रूप से प्रकृति द्वारा निर्धारित जीवन चक्र से गुजरता जो उसे बचपन, किशोरावस्था, वयस्कता तथा प्रौढ़ावस्था के भिन्न-भिन्न चरणों में ले जाता है। प्रत्येक चरण का एक विशिष्ट जोश या उत्साह होता है। उन भावनाओं के साथ-साथ व्यक्ति के अनेक उत्तरदायित्व जुड़े रहते हैं। उस चरण विशेष की विशिष्ट समस्याएँ भी होती हैं। आमतौर पर आयु के बढ़ने के साथ-साथ, सम्पूर्ण परिदृश्य में परिवर्तन होता है। उत्तरदायित्व अगली पीढ़ी को सौंप दिए जाते हैं। धीरे-धीरे जोश कम होता जाता है और उसके स्थान पर नीरसता और बेचैनी का जन्म होता है। उसके परिणामस्वरुप अनेक जटिल समस्याओं का जन्म होता है। इन्हीं समस्याओं के कारण किसी भी व्यक्ति के स्वास्थ्य पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ता है। इस समय आवश्यकता इस बात की होती है कि वृद्धों की आशाएँ-आकाक्षाएँ बनी रहें। उनकी जिंदगी में नया उत्साह बना रहे। उन्हें निरंतर नवीन अनुभवों के साथ जागृत होने के लिए प्रेरित किया जाए।
प्रत्येक व्यक्ति को यह समझना चाहिए कि माँ-बाप मरने के बाद यहीं नहीं रहते। उनका पार्थिव स्वरूप समाप्त हो जाता है। उनकी स्मृतियाँ ही शेष रह जाती हैं। उनके जाने के बाद भाई-भाई अपने-अपने हिस्से के लिए कसाई हो जाते हैं। खून के रिश्ते खून करने, खून पीने पर उतारु हो जाते हैं। हमेशा हमारा कवच बने रहने वाले माँ-बाप कुछ नहीं कर पाते। फलित होता है तो सिर्फ उनका आशीर्वाद। वे जीवित रहने पर हमारे घर, परिवार और रिश्तों के लिए खंभा, दीवार और नींव होते हैं। वे टूटते-फटते रिश्तो पर शील का पैबंद लगाते रहते हैं। वे अनुभव के जेवर के गँठे शिल्प होते हैं। उनकी बातें भले ही कड़वी लगें, मगर वे नारियल की तरह भीतर से मधुरस युक्त और बाहर से पत्थर जैसे कठोर हो सकते हैं। वे घर के प्रत्येक सदस्य की आशा और उम्मीद होते हैं। हमें अपने घर के वृद्धों के लिए प्रयास करना चाहिये कि वे दुखी न रहें। उन्हें जो सुख देना है, इस जीवन में देने का प्रयास करना चाहिए। घर में प्रवेश करते ही एक क्षण उनके पास बैठकर उनका हाल पूछ लेना करैले के स्वाद से नहीं भरेगा, मधु का अनुभव देगा। उठते समय उनके हाथ में डंडा पकड़ा देना हमेशा ही आशीष का काम करेगा। चश्मा टटोलते हाथों को जब हम सहारा देकर वॉशरूम ले जायेंगे तो उन्हें अपने अंधे होने का कष्ट ही नहीं रहेगा। तब किसी के लिए भी वृद्धावस्था बोझ नहीं, वरदान बन जायेगा। तब वृद्धों को तो आन्तरिक आह्लाद होगा ही, हमारा मन भी अनेक तनावों से मुक्त हो जायेगा। हम स्वयं को सबल अनुभव करेंगे और वृद्धों के उस अव्यक्त आशीष के दम पर जीवन की किसी भी परिस्थिति से दो हाथ करने को तैयार रहेंगे।
आये दिन कई ऐसी घटनाये पढ़ने-सुनने या देखने को मिलती हैं जिससे पता चलता है कि बेटे की नौकरी विदेश में हुई, वह अपनी सारी संपत्ति बेचकर बूढ़े माँ-बाप को असहाय छोड़कर चला गया। संपत्ति की लिप्सा में किसी ने अमूक वृद्ध का कत्ल कर दिया आदि। इन सबसे मन में कई प्रश्न कौंधने लगते हैं कि क्या यह वही भारत वर्ष है जहाँ भगवान् राम ने पिता के वचन का मान रखने के लिए अपना सर्वस्व त्यागकर 14 वर्ष वनवास किए। शास्त्रों और शालाओं में अक्सर पढ़ाया जाता है कि माँ-बाप को धरती पर भगवान माना जाता है। आज हम लोग अक्सर अपने बुजुर्गों की छोटी-छोटी बातों पर चिड़चिड़े हो जाते है। झल्ला उठने हैं कि आपको कुछ नहीं मालुम। आपका जमाना अलग था। आप को तो बैठ के खाने को मिल रहा है तो बातें आ रही हैं। बाहर निकल के देखने पर पता चल जायेगा। हमारे द्वारा दिए गए ताने उस वृद्ध माँ-बाप के सीने पर खंजर कि तरह बरसते है। उन्हें हम से सिर्फ थोड़े वक्त की अभिलाषा होती है और हम घंटों चाय और पान की दुकान पर फिजूल बरबाद कर देते हैं। मोबाइल के गेम्स में व्यस्त रहते हैं मगर माँ-बाप के लिए कुछ मिनटों का समय नहीं दे पाते। आपके साथ ऐसा हो तो कैसा लगेगा? कभी सोचा है आपने? आपने यह भी कभी सोचा है कि यह कैसी तरक्की है? कैसी आधुनिकता है? हमारे संस्कारों पर कैसा ग्रहण है कि जिससे अपना वर्तमान जलाकर अपनी संतानों का भविष्य उज्ज्वल बनाया, आज वहीं हमारे देवतुल्य वृद्ध उपेक्षित हो रहे हैं? अगर हम सावधान नहीं हुए तो प्रोफेशनलिज़्म के नाम पर आधुनिकतावाद की चक्की में पिसकर आदमीयत का नाम-ओ-निशान समाप्त हो जायेगा। हमें हमेशा याद रखना चाहिए कि हमारी वृद्धा माँ विस्तृत धरती के समान सहिष्णु होती है। पिता अनन्त गगन के समान असीमित अनुभव। ये दोनों अपनी संतानों के जीवन को श्रेष्ट बनाने में कोई कसर नहीं छोड़े रहते। ये दोनों अपनी वृद्धावस्था में भी जिस घर में प्रसन्न रहते हैं, उस घर की संतानों का भी जीवन धन्य हो जाता है। उस घर में स्नेह और सहिष्णुता का वास होता है। जिनके घर में इनका अपमान और अनादर होता है, वह घर अभिशप्त हो जाता है।
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– केशव मोहन पाण्डेय

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