वैराग्य

न्यू हाॅस्पिटल में सौरभ का आज चौथा दिन है। वह अपने पापा जनक के साथ आया है। जनक विगत चार महिने से बीमार चल रहे हैं। पहले बुखार था। अपने फैमिली डाॅक्टर को दिखाया। बीमारी की गंभीरता और उपकरणों के अभाव के कारण ठीक से परीक्षण और पहचान नहीं की जा सकी। अनुपयुक्त दवा दिए जाने के कारण बुखार को रोका न जा सका। डाॅक्टर जवाब भी नहीं दे रहा था। फैमिली डाॅक्टरों की यही विशेषता होती है कि बड़ी-से-बड़ी बीमारी को भी ठीक कर देने का प्रयास करते रहते हैं। हार मानना उन्हें अपमान लगता है।
सौरभ अभी पढ़ रहा था। शोध का शौक पकड़ा था उसे। परिवार में तीन भाइयों और दो बहनों में सबसे छोटा था। शादी-शुदा। गौरी एक बुद्धिमती और गुणी पत्नी की भूमिका में सफल थी। उसके लिए यह परिवार सपनों का परिवार था और पति ईश्वर की अनुपम कृपा का पुण्य-फल। सौरभ ने जेब-खर्च के लिए दो-तीन ट्यूशन पकड़ रखा था। आजकल आत्मनिर्भरता के लिए पढ़ा-लिखा युवा इस कार्य को सबसे उचित समझता है। भाइयों की थोड़ी दया से गृहस्ती खिसकती जा रही थी। गाँव में भरपूर जमीन थी। जनक देखा करते थे। वे चार महिने से बीमार हैं। खेती भी बिगड़ गई है।
जनक की बीमारी सौरभ को पहले साधारण लगी। बात गंभीर बनी तब, जब नित्य-कर्म के लिए भी वे उठने में अक्षम हो गए। कूवत मरती जा रही थी। परिवार के प्रति स्नेह बढ़ता जा रहा था। स्नेह के उस सलिल में सौरभ भी भींगता गया। ….. ‘चाहे कुछ भी हो जाए, खुद बिक जाएगा, मगर पापा को कुछ नहीं होने देगा।’ …. जनक भी तो सबसे अधिक सौरभ से ही स्नेह रखते हैं। एक क्षण के लिए भी आँख से ओझल नहीं होने देते। साथ ही खाते हैं। पास ही सुलाते हैं। आज भी। शादी होने के बाद भी। ….. इस बात का गौरी को कष्ट नहीं हैं। वह तो इस परिवार में आकर स्वयं के भाग्य पर गर्व करती है। आदमकद दर्पण के सामने बिन्दी-सिन्दूर लगाते समय अपने चमकते ललाट को देख मुस्कुराती है और अंदर तक खिल जाती है।
विश्व में नित्-नूतन खोज किया जा रहा है। खोजों के परिणामों के कारण सभी समाजों में परिवर्तन भी समय-समय पर देखा जाता है। आज गेजेट्स में उलझा मानव रिश्तों को भूलता जा रहा है। समय की गति तेज होती जा रहा है। भौगोलिक दूरियाँ सिमटती जा रही हैं। रिश्ते बंजर होते जा रहे हैं। आज के रिश्ते सूखे गन्ने से होते जा रहे हैं। वे चीनी बनाने के काम नहीं आ सकते। वे केवल जल सकते हैं। धूँआ की उमस और थोड़ा आग देने के लिए। ….. कई संदेशों के बाद सौरभ के दोनों भाई आये। दीपेन्द्र और राजेन्द्र। जनक की सोचनीय बीमारी ने उनके हृदय को छूआ। आँखें डबडबा उठीं। तुरन्त यहाँ ‘न्यू हाॅस्पिटल’ में एडमिट करा दिया गया। उन दोनों का विचार था कि जनरल वार्ड में बेड ही लिया जाए। सौरभ सुन चुका था कि ‘स्पेशल बेड’ वालों पर डाॅक्टर अधिक नजर रखते हैं। वह किसी भी कीमत पर जनक को खोना नहीं चाहता था। ….. उसकी जिद्द पर एक बिस्तर का कमरा ले लिया गया। उसी शाम को सौरभ के हाथ पर कुछ पैसे रख कर दोनों भाई नौकरी की दुहाई देकर चले गए। – ‘फिर जल्द आयेंगे। …. कल, परसों। ….. छुट्टी नहीं ली है। …. फोन करते रहना। ….. समाचार देते रहना।’
अपनी इस पच्चीस वर्ष की उम्र में सौरभ पहली बार अस्पताल में था। वह भी सिर्फ वृद्धा माँ के साथ। माँ भी ऐसी, …. एक दम सीधी गाय। राम भी हाँ, रहीम भी हाँ। आज के इस राजनैतिक सोच वाले युग में भी मंदिर-मस्ज़िद में एक ही का वास मानती है। पराए के पीर से पीड़ित होती है। दूसरे की गीली आँख देखकर रोने लगती है। यहाँ अस्पताल में दरवाजे पर बैठे-बैठे सामने के जनरल बेड वालों को देखती रहती। सिर पीटती रहती। माँ तो अपनी ही दुनिया में खोयी रहती थीं। सौरभ को क्या साहस देतीं?
भाइयों द्वारा दिए गए पैसे थोड़े थे। एकदम थोड़े। बहुत कश्ट से दो दिन की दवाइयाँ ली जा सकती थीं। अगर भूख आदि पर ब्रेक लगाया जाय तब। चाय-पानी भी न ली जाय तब। सौरभ भी एक ट्यूशन से कुछ अग्रीम लाया था। …. जनक को पहले दिन के उपचार से आशातीत सफलता मिली। गदगद हो गया वह! अपने जनक को बचाने के लिए कुछ भी करेगा।
क्षणिक प्रसन्नता का कोई मोल नहीं होता। क्षणिक सुख कई बार दीर्घ दुख का निमित्त बन जाता है। बरसात की पहली वर्षा सोंधी महक का सौंदर्य तो फैलाती है, मगर बाद में बाढ़ और तबाही का भी कारण बनती है। …. दूसरे दिन से जनक की स्थिति बिगड़ने लगी। नित्य-क्रिया के लिए उठते हुए वे बेहोश हो गए। सौरभ का होष भी गुम हो गया। उसने पहली बार किसी को ऐसी दशा में देखा था। माँ की ओर देखा, वे अलग सिर धुन रही थीं। चिघ्घाड़ा – ‘डाॅक्टर!’
दूसरा कोई अपना नजर नहीं आया सौरभ को। डाॅक्टर ने हिम्मत दी। ‘डाइबिटिज़’ कह कर सुधार होने का आश्वासन दिया। पूछा भी, -‘और कौन है साथ में?’
बड़ा दीन हो गया था सौरभ। आँखें उफान पर थीं। रोम स्पर्श से ही छलक पड़तीं। बड़ी ही दीनता से कहा -‘कोई नहीं। …. सर, मेरे पापा ठीक हो जाएँगे न? ….. आप मेरे पापा को ठीक कर दीजिए, प्लीज़।’
‘हाँ-हाँ। धैर्य रखो। … बी ब्रेव। … ये दो बोतल लाओ।’
पैसे नहीं थे। दवा की पर्ची हाथ में लेकर इधर-उधर देखा। सिर्फ दो दिखे। एक बेड पर पड़े जनक और दूसरी नीचे बिलखती हुई माँ। …… अस्पताल के आहाते में ही दवा की दुकान थी। भाइयों के आने की बात और पैसे चुकाने का भरोसा दिलाकर दवाइयाँ लाया।
काँपते हाथ से नम्बर डायल कर दोनों भाइयों के पास फोन किया। जनक की स्थिति से अवगत कराया – ‘मुझे बहुत डर लग रहा है। … पैसा भी नहीं है। …. आ जाइए।’
दोनों से चिर-परिचित उत्तर पाया कि छुट्टी नहीं मिल रही है। नौकरी का प्रश्न है। उसके समझ में नहीं आ रहा था कि सामाजिक परिवर्तन ने संबंधों को ऐसे प्रभावित किया है कि कभी-कभी इंसानियत का रूप ही अलग लगता है। एकांत में बैठा सोचता रहता कि नौकरी इतनी कीमती है? पापा से भी? अपने जन्म देने वाले से भी? …. निरंतर प्रयासरत रहने पर भी उत्तर मौन ही पाता। माँ को ब्रेड-चाय देता। बाहर का पका नहीं खातीं मगर ब्रेड-चाय पर तो समझौता करना ही पड़ेगा। माँ पूछती तो स्वयं के लिए कह देता – ‘अभी खा कर ही आ रहा हूँ।’ ….माँ अपनी चाय में से एक घूँट लेने की बात करती तो कहता कि पेट में जगह नहीं है। पैसों का अभाव गला दबाए जा रहा था। खाना कैसे अच्छा लगे? दयालु दुकानदार दवाइयाँ देते जाता था। सौरभ बस एक ही बात कहता – ‘भैया आ रहे हैं।’
जनक की बीमारी भी गजब की थी। कभी तेज ज्वर से सारा शरीर तपने लगता तो कभी बर्फ बन जाता। यह दशा देखकर सौरभ सिहर जाता। उस समय गौरी की याद आती। वह भी आने के लिए जिद्द कर रही थी। घर देखने के लिए छोड़ दिया। रहती तो हिम्मत देती। बुद्धिमती के साथ-साथ सहनशील भी है। अद्भुत स्त्री है। दिन रात काम में लगी रहती है, फिर भी नहीं थकती है। सबको समय पर ही सबकुछ चाहिए, वह समय से पहले लेकर हाज़िर होती है। सुबह सूरज पूरब के माथे पर दस्तक देने ही वाला होता है कि उसके पहले गौरी की डलिया फूलों से भर जाती है। जनक तो पूजा के समय हर प्रकार के फूलों को पसंद करते हैं। बेला, गुलाब, गुड़हल, कनेर, बैजंती। कहते हैं कि जब रंग-बिरंगे फूलों से पूजा करते हैं तो जीवन भी वैसे ही रंगीन बना रहता है। और आज स्वयं अस्पताल में पड़े हैं।
इन चार दिनों में सामने के जनरल वार्ड से दो मरीज स्वर्ग सिधार गए। …. कर्म कुछ भी हो, हम तो स्वर्गवासी ही कहेंगे। दुुनिया भी यहीं कहती है। हम कुछ और विशेषण दें तो गाली कहा जाएगा। ….. उन मृतकों में एक दस वर्ष का बालक था। …. रात जनक के पास बैठा सौरभ देख रहा था। पता नहीं कौन-सी बीमारी थी। उठता, पालथी मारता, घूटने के बल बैठता और एक बार सोया तो उठा ही नहीं।
दूसरा, आज सुबह ही एक वृद्ध हाजी साहब आए। उनके साथ वाले ‘हाजी साहब’ ही कह रहे थे। हज़ से कुछ ही दिन पहले आये थे। पान खाने की पुरानी लत थी। दाँत में विकार हो गया था। हमेशा किसी नूकीली चीज से खोंदते रहते थे। विकार की जड़ मजबूत हो गई। फिर कैंसर। ….. निरन्तर खून गिर रहा था दाँत से। उनको यहाँ आए हुए चार घंटा हो गया था। कई बोतल खून चढ़ाया जा चुका था मगर उससे अधिक निकल चुका था। कुछ देर पहले ही अल्लाह को प्यारे हो गए।
सौरभ यह सब पहली बार देख रहा था। मृत्यु को इतने पास से। ज्यों छू कर। दोनों घटनाओं के बाद वह जनक का पाँव पकड़कर पूछा था – ‘पापा, कैसा लग रहा है? …. कुछ जाऊँ? …. जूस?…अंगूर…..दाल का पानी…. कुछ भी?’
क्षीण शक्ति वाले जनक अपने इस छोटे बेटे की तत्परता देखकर भावुक हो जाते – ‘मुझे कुछ नहीं चाहिए। बस तुम मेरे पास रहो, पेट भर जाएगा।’
‘ऐसे कैसे भर जाएगा!’ – और बैठे-बैठे अंगूर का एक-एक दाना जनक की जिह्वा पर रखते जाता।
जनरल वार्ड की दोनों घटनाएँ विचित्र थीं। एक मरीज के लिए भी, उसके साथ वालों के लिए भी। सौरभ रोज, दोनों वक्त अपने भाइयों के पास फोन करता था। हमेशा उŸार भी एक ही पाता था। तनाव, उलझन और अकेलेपन के कारण सौरभ को भी बुखार आने लगा। आज छठे बड़े भाई ने आने के लिए कहा, आये भी। डाॅक्टर से उनकी बात हुई। परोक्ष वार्ता। जनक को घर ला दिया गया। वापस। निराश। मृत्यु की प्रतीक्षा के लिए। डाॅक्टर ने अंतिम चरण का लीवर-कैंसर बताया था।
घर आने पर गौरी के मात्र ‘कैसे हैं?’ से ही सौरभ की सारी बीमारियाँ परा गईं। आठवाँ दिन प्रारंभ भी नहीं हुआ था कि सौरभ की सारी मेहनत मिट्टी हो गई। जनक को यह दुनिया छोड़नी ही थी। और उनके लिए तो दावा किया जा सकता है कि स्वर्ग में ही गए होंगे। जब हत्यारे, पापी, चोर, बलात्कारी, मांसभक्षी आदि स्वर्गवासी हो सकते हैं तो जनक ने तो सीधी राह के एक सरल मुसाफिर की तरह जीवन को जीया था। धार्मिक दृष्टि से भी पूरी तरह से आस्तिक थे। मांस-मदिरा क्या? लहसून-प्याज से भी दूर। घर में प्रतिबंध नहीं था, सिर्फ जनक को नहीं भाता था।
खबर देने पर दोनों भाई दीपेन्द्र और राजेन्द्र भी सूतक-गृह में आये। संयोग की प्रबलता देखिए कि मुखाग्नि भी सौरभ को ही देना पड़ा था। अभागा, बीमार पड़ने पर मुँह में दवा, जूस, निवाला खिलाने वाला अंत में उसी मुँह में अग्नि भी अर्पित किया।
जनक का श्राद्ध-कर्म अभी-अभी संपन्न हुआ है। बड़े भाई मौन साधे थे परन्तु श्राद्ध-कर्म के समय खूब रोये। सौरभ उन्हें पहली बार इस प्रकार रोते हुए देखा था। भावनाओं की बेगवती धारा में उसके भी धैर्य का बाँध टूट गया। वेदना की बाढ़ बढ़ चली। कंठ खुल गया। उस समय तक छोटे सौरभ से सबको सहानुभूति हो चली थी। बहुत किया था जनक के लिए। उसे इस प्रकार निढाल होकर रोता देख दोनों बहनें रो पड़ीं। सभी रिश्तेदार रो पड़े। सौरभ जिन रिश्तेदारों की उपेक्षा करता रहता, आज पहली बार उनसे राग जोड़ पाया था। उसे लगा कि वे रो नहीं रहे, दुख बाँट रहे हैं। उसका मन शांत होने लगा।
समय अपनी स्वभाविक गति से बढ़ता जा रहा था, मगर सौरभ अपने पापा को बिसार नहीं पा रहा था। रात की अंधकार में भी वे आँखों में चमकने लगते तो सुबह होते ही फूलों के रंगों में रंगीन हो उठते। तपती दोपहरी में भी खेतों के कोने को कूदाल से मिलाते कर्मशील पापा दिखायी देने लगते तो बाजार से सब्जी लेकर लौटते किसी राही में भी सौरभ को अपने जिम्मेदार पापा की सूरत दिखायी देती। वे याद आते तो घर-परिवार के साथ ही अस्पताल में पड़े जनक भी याद आते। भाइयों का स्वार्थ याद आता। वे भाई जो नौकरी खोने के डर से पापा को खो चुके थे। दीपेन्द्र ने दया कर के माँ की सेवा-सुश्रुषा के लिए अपनी पत्नी को घर छोड़ दिया था। बडे़ भाई ने मुँह भी नहीं खोला। बहनों की विदाई।….. घर का खर्च। ….. खेती डँवाडोल। – बिखर सा गया था सौरभ। टूट गया उसका हृदय। बिखर गए स्नेह के पारद-कण। अब उन्हें चुटकियों में भी नहीं पकड़ा जा सकता था।
सौरभ सबको छोड़कर कहीं दूर चला जाना चाहता है। इस पूरे समाज से, रिश्तों के बंधन से, परिवार से, सबसे दूर। माँ, गौरी, भाभी, दीपेन्द्र, राजेन्द्र, सबसे दूर। कहीं एकांत में। अपरिचित जीवन बिताने। गौरी समझाती – ‘किससे दूर जाएँगे? जन्म देने वाली माँ से? …. अपने सहोदर भाइयों से? …. सात फेरे लेकर सात जन्मों तक साथ निभाने का प्रण लेने वाले आप मुझसे दूर जायेंगे? …. सब तो आपके ही हैं। समय के साथ सब सुधर जाएगा। अपने भुलाए नहीं जा सकते।’
जब सौरभ झल्लाता तो बहने समझातीं – ‘पापा के बाद माँ के लिए अब तुम्हीं तो हो। तुम तो देखते ही हो, दोनों बड़े तो पैसा कमाने में लगे हैं। तुम भी छोड़ दोगे तो इस बुढ़िया का सहारा कौन होगा? गौरी को कौन देखेगा? …. पापा के बाद तुम पर तो और भी जिम्मेदारियाँ आ गईं हैं।’
सौरभ चिल्लाकर अपने अंदर की तपती आग को निकालना चाहता – ‘मैंने जिम्मेदारियों का ठेका ले रखा है क्या? …. सब कुबेर का खजाना बटोरें और मैं फक्कड़ बना रहूँ? क्यों??’
मानसिक दबाव में आदमी अगर संभल नहीं पाता तो या तो पागल हो जाता है या गलत रास्ता अपना लेता है। आज कल सौरभ भी उन्हीं परिस्थितियों से गुजर रहा था। महीनों मंथन करने के बाद एक दिन वह बिना किसी को कुछ बताए वह चला गया। सबको छोड़कर। माँ को भी। …… उस माँ को, जिसने नौ माह तक बोझ ढोकर आँचल से अमृत पिलाया था। कहे जिसे जो है कहना। कर्ण का क्या हुआ? भ्रातृ-मोह में अर्जुन को छोड़कर सबको जीवन-दान देने वाला अंत में उसी अर्जुन से मारा गया। ……उस पत्नी को, जो एक अजनबी रिश्ते के निर्वहन के लिए मृत्यु तक सिंदूर का बोझ ढोती है। जो सिर्फ एक के निमित्त अपने माँ-बाप, अपने कुनबे को छोड़कर पति के होकर रह जाती है। जिसका सब कुछ पति का हो जाता है। ….. कहे जिसको जो कहना है! सौरभ भी पूछेगा कि गर्भवती पत्नी को वन में भेजने वाले को भी भगवान क्यों कहा जाता है? ….. नवजात शिशु के साथ शयन करती पत्नी को छोड़कर जाने वाले को तथागत क्यों कहा जाता है? ….. क्या उनकी जिम्मेदारियाँ नहीं थीं? …. वे तो समाज के श्रेष्ठ लोग थे? उन्हें तो दिव्य-पुरुष कहा जाता है, और मैं??
एक वर्ष का समय गुजर गया। सौरभ रानीखेत में रहता है। वह एक रेस्टोरेन्ट में बरतन धोने का काम करता है और रोज माॅल रोड से आगे निकल कर वह ‘घंटियों वाले मंदिर’ में जाकर घंटों बैठा रहता है। एकदम मौन। माँ दुर्गा के इस छोटे-से शांत मंदिर में श्रद्धालु मन्नत पूरी होने पर छोटी-बड़ी घंटियाँ चढ़ाने आते हैं। यहाँ बँधी हजारों घंटियों को देख कर कोई भी अभिभूत हो सकता है। अगर हवा का एक तेज झोंका चलता है तो उन असंख्य घंटियों की ध्वनि से सारा वातावरण मुखरित हो जाता है। देवदार और बलूत के वृक्षों की हरियाली में भी सौरभ एकदम शांत भाव से बैठा रहता और अपने में ही खोया रहता।
आज एक वर्ष बाद सौरभ को पता नहीं क्यों घर की याद आयी। घर की याद आयी तो फोन किया। फोन किया तो पता चला कि बड़े भाई के बेटी की शादी है। सौरभ उसे बहुत मानता है। उसकी शादी की बात सुनते ही घर के लिए चल पड़ा।
गौरी ने डोर-बेल सुना तो कमरे में चली गई। पति के सामने नहीं जाना चाहती है। वह अब बदरंग हो गई है। उस सद्यः विकसित पुश्प का लावण्य मुरझा गया है। महीनों बाद पति घर आया है। तो क्या? नहीं बोलेगी। पत्नी का यहीं तो अधिकार है। यहीं तो हथियार है। सौरभ ने आकर पीछे के कंधा दबाया तो रोक नहीं पायी स्वयं को। प्रत्युत्तर में गलबाँही डालकर फफक पड़ी – ‘मुझसे दूर गए थे? अपनी पत्नी से? कह दिए होते तो मैं ही गड़-धँस गई होती।’
माँ सूख गई है। पाँव छुआ तो इतना ही बोली -‘मैं तूझे बोझ लगती हूँ न? … क्या करूँ? ….. ऊपर वाला उठाता ही नहीं।’
सौरभ की दृष्टि ताजे फूलों की माला से सजी पापा के चित्र पर गई। वह कहीं खो सा गया। जैसे जनक माथे पर हाथ फेरते हुए कह रहे हों – ‘पारिवारिक उलझने किसको नहीं सतातीं? इस तनाव में भी रहने का एक अलग आनन्द है। इन सामाजिक व्यवस्थाओं को अस्वीकार कर वैराग्य लेने वाला मानवता का पोशक नहीं हो सकता। … इसे त्याग नहीं, कायरता कह सकते हैं।’
‘परिवार में तनाव है, कष्ट है, तो अपनत्व भी है, स्नेह भी तो कम नहीं है।’ …… इन्हीं विचारों में खोया सौरभ माँ की गोद में अपना सिर रखकर बैठ गया। माँ की आँखों से स्नेह और हर्ष मिश्रित एक प्रपात फूट पड़ा। गौरी का मस्तक दर्प से दीप्त हो उठा।
……….
– केशव मोहन पाण्डेय

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