वो जो छोर देख रहे हो

वो जो छोर देख रहे हो
वही मिलती है धरती
आकाश से
वही सपने सच होते है
और हक़ीक़त
गलबाँही करती है
सपनों को।
वो जो छोर देख रहे हो
वही है
ढेरों सफलताएँ
परंतु वहाँ जाने के लिए
पार करना पड़ता है
समय के पहाड़ को
गुजरना पड़ता है
यथार्थ के जंगल से
अनुभव के दुर्गम रास्ते से होकर
कई बार तो
निरंतरता की
सपाट जमीन मिल जाती है
और कई बार चुनौती देती है
असफलताओं की तूफानी नदी
जिसे पार होना ही है
नहीं तो
हार होना ही है
उस नदी को पार करते हैं
लोग अक्सर
परिश्रम का सेतु बनाकर
कर्म की नाव से
विश्वास के पतवार के भरोसे
तब मिल जाता है वो छोर।
वो जो छोर देख रहे हो
वही मिलती है धरती
आकाश से
और वही होता है
दौड़ पूरा
जीवन का
जीने के लिए
परंतु कोई नहीं पहुंच पाता
वहाँ तक
दौड़ पूरा नहीं कर पाता कोई
जीवन भर दौड़ने के बाद भी।
पर मुझे वही जाना है
सपनों को पाना है
सफलताओं से मिलना है
और दौड़ पूरा कर के
दिखाना है
दिखाना है मुझे
एक मेहनतकश आदमी की औक़ात।
——-
– केशव मोहन पाण्डेय

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