शरारत

विचित्र जीव हो तुम
कई बार अनचाहे ही
बजाने लगती हो
यादों का ‘डोर बेल’
घुस आती हो
दिल-ओ-दिमाग में
और उदास चेहरे पर भी
अंकित कर देती हो
एक मुस्कान की शरारत।
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– केशव मोहन पाण्डेय

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