संस्कारहीन

‘यह बात तो एकदम सही है कि बेटी को सिर पर चढ़ाओगे तो कभी सिर उठाने के लायक नहीं रहोगे।’
‘आप सच कह रह हैं बहन जी। लड़की का मान-सम्मान उसके हर रूप में, हर क्रिया-कलाप में देखा जाता है।’
‘देखी हो सरला की फोटो? …. जब माँ इस उम्र में अपनी हया खोकर काया दिखाने में लगी है, तो बेटी तो भाई आज के जमाने की ही है। …. जब माँ ही अपना ही पैर नहीं रोक पायेगी तो बेटी के पाँव में कहाँ से बंधन लगाएगी?…..’
शाम ढल रही थी। एम.सी.डी. का सप्लाई पानी आ रहा था। छतों पर, हर टंकी के पास एक-दो बच्चे, बूढ़े या लड़कियाँ दिख रहे थे। दिल्ली का यह पाॅश इलाका है। सभी के पास एक से बढ़कर एक सुख-सुविधाएँ हैं, पर पानी के ही जीवन समझने की हुनर सबमें है। बहन जी में भी, विनिता जी में भी, आप-पास की अन्य औरतों में भी।
बहन जी जैसे ही विनिता जी के दरवाजे पर आयीं, झट से एक कुर्सी आ गई। बाकी औरतें सीढ़ी पर और दरवाजे पर ही बैठ गईं। बातें हो रही थीं। यह रोजमर्रा है इन औरतों का। अगर गली की कोई भी खबर लेनी हो तो उस बैठकी में सम्मिलित हो जाओ, सारी गाथा सुनने को मिल जाएगी। किसके घर में आज पति-पत्नी में लडाई हुई? तो क्यों वह इस समय चाय पी रही है? क्यों उसके छत पर अधिक कपड़े सूख रहे हैं? तो आज उनके घर से कूड़े वाले को क्या मिला? ….. सारी जानकारी एक स्थान पर उपलब्ध हो जाती है।
सरला रानी एक प्रतिष्ठित काॅलेज में एसोसिएट प्रोफेसर हैं। वे दिल्ली में तो पली-बढ़ी नहीं, पर लगभग अठारह वर्षों से यही हैं। शादी के बाद पति के साथ यही आयीं और यही की होकर रह गईं। दिल्ली ने उन्हें अपना बना लिया। उन्होंने भी दिल्ली को अपना लिया। प्रारंभिक चार-पाँच वर्ष तक वैवाहिक जीवन को भोगने और सहेजने में लीन रहीं, बाद में कैरियर की चिंता हुई। पीएच. डी. पूरी हुई और अपनी योग्यता को निखारकर वे आज दस वर्षों से काॅलेज में अध्यापन कर रही हैं। सरला रानी के रंग को शुद्ध-स्निग्ध कह सकते हैं। रूप में तो ऐसा आकर्षण है कि आज भी देखकर कोई कह ही नहीं सकता कि इनकी चैदह-पंद्रह साल की बेटी भी है। अधर पर अक्षय मुस्कुराहट और अपेक्षाकृत थोड़ी छोटी आँखों को अंजन से निखारी रहती हैं। गर्दन के नीचे पीठ के ऊपरी भाग को छूते लहराते बाल। बालों की लहर को देखकर लगता है कि वही से शीतल-सुगंधित हवा का जन्म होता है। ऊँची कद में गँठा शरीर आज भी आकर्षण के हर क्षोर से मोहक है। पुरुष-वर्ग की तो अलग बात है, उनकी बात-व्यवहार, उनके सलीकेदार रहन-सहन को देखकर उनसे ईष्र्या करने वाली सहकर्मी महिलाएँ भी उनका सानिध्य चाहती हैं।
सरला रानी के व्यक्तित्व का बाह्य रूप तो आकर्षक था ही, वे आंतरिक तौर पर भी कम आकर्षक न थीं। पति भी केन्द्रीय सचिवालय में एक ऊँचे ओहदे पर थे। बेटी जायसा भी अब दसवीं में पढ़ती है। माँ, बेटी और पिता, तीनों में मित्रवत व्यवहार था। इनका परिवार सबके लिए लुभावना था। उस लुभावनेपन में कई के मन में प्रतिस्पर्धा थी और कई के मन में ईर्ष्या भी, द्वेष भी।
जब सरला रानी का परिवार माॅर्निंग वाॅक पर निकलता तो कई घरों की खिड़कियों से आँखें झाँकने लगतीं। हाफ पैंट और टाॅप में माँ-बेटी सुन्दर भी दिखतीं, आकर्षक भी और मांसल भी। तीनों उछल-कूद करते जाते और अपने स्वास्थ्य की रक्षा के लिए हमेशा जागरूक रहते। सरला रानी के जीवन में आनन्द था, उत्साह था। यहाँ प्रसन्नता का पार्क था तो स्वछंदता की सीमा रेखा। खूलेपन के वृक्ष थे, तो मुस्कुराहट के फूल और अपनेपन की लहलहाती बल्लरियाँ। यहाँ अभिव्यक्ति का घर था और साहचर्य के कमरे। साख्य-भाव की कुर्सियाँ थीं। सीधेपन के सोफे। ऐसे वातावरण में जी रही सरला रानी घर का सारा काम पहले स्वयं करती थी। अब समयाभाव के कारण दो सेविका रख लिया है। साफ-सफाई की एक और ब्रेकफास्ट, लंच, डिनर की एक। आज के कामकाजी जीवन में लंच तो अपने घर में कोई सौभाग्यशाली ही कर पाता है। अस्तु, दोनों सेविकाएँ तब आराम फरमाती हैं। वे कभी नहीं चाहतीं कि मैडम या साहब या बेटी, किसी की भी कभी छुट्टी हो। पूरे सप्ताह का कसर एक दिन की छुट्टी में निकल जाता है। उस दिन ब्रेकफास्ट में तो मक्खन-ब्रेड से ही काम चल जाता है मगर लंच में बीसों चीजें बनती हैं। कोई बहाना भी नहीं चल सकता। छुट्टी के दिन लंच पर कोई-न-कोई गेस्ट भी होता है।
सरला रानी प्रतिदिन शाम को पाँच से छह बजे तक घर आ जाती हैं। आते ही मैडम को गुनगुने पानी में नींबू चाहिए, फिर एक प्याली ग्रीन टी। यह बारहों महिने की दिनचर्या है। हाँ, कभी अधिक थक जाने पर ड्रेस भी नहीं चेंज करती और ग्रीन टी के साथ एक-दो टोस्ट भी माँगती हैं। उनके पतिदेव के लिए तो न जाने का समय निश्चित है, न आने का। बेटी है, जो कई बार षाम की चाय के साथ कुछ स्नैक्स लेकर साथ देती है।
कोई अपरिचित भी जायसा को देखकर पहली ही बार में कह सकता है कि वह सरला रानी की ही बेटी है। यूँ कहिए काॅपी-पेस्ट है अपनी माँ की। रूप में दोनों किसी से कम नहीं हैं। उतरती उम्र में सरला रानी का सौंदर्य गंभीरता लिए है तो चढ़ती उम्र में जायसा का सौंदर्य चंचलता लिए। वास्तविक तौर पर गंभीरता पूजनीय है तो व्यावहारिक तौर पर चंचलता अनुकरणीय। एक पर नजर ठहर जाती है, दूसरे को नजर निहारा करती है। एक में नदी की स्थिरता का सौंदर्य है तो दूसरी में हर बाँध को तोड़ने की बेचैन जिद्द। …… कामदेव की नजर से देखें तो एक अनुभवहीन कौमार्य ग्रहण कर रही है तो दूसरी अपने पर डंडी मारती हर नजर को पढ़ लेती है।
गली वाली स्त्रियाँ सरला रानी और जायसा से अपनी तथा अपनों की तुलना करती हैं। हर माँ को वैसी रूपवती बहु तो चाहिए, पर गुण?? राम-राम। विनिता जी ने मुँह बिचकाते हुए ओठों को त्रिकोण का रूप देते हुए कहा, – ‘माँ से चार कदम आगे निकल गई है बेटी। माँ घूटने तक लैगी पहनती है तो बेटी का पैंट कई बार समझ ही नहीं आता। ध्यान से देखो तो उसके गोरे शरीर की सारी नसों का रास्ता पता किया जा सकता है।’
‘अरे बहन जी, आपने नहीं देखा है शायद, उधर, दूसरी गली के कई लड़के-लड़कियाँ आती हैं तो ये बिटिया रानी उनके साथ गायब हो जाती हैं। कैलाश काॅलोनी के हर नुक्कड़ के आइसक्रीम और चाॅट वाले इसे पहचानते हैं।’
‘एम. ब्लाॅक के पूरे मार्केट में धमाचैकड़ी करती रहती है ये तो। ….. मैंने तो सुना है कि कई बार अपने उन्हीं दोस्तों के साथ लेट-नाइट आउटिंग भी करती है। स्पेशल पार्टी करते हैं सब। ….. माँ-बाप, दोनों जानते हैं, मगर बोल नहीं पाते।’
‘आप भी न बहन जी, ….. माँ-बाप का देखकर ही बच्चे सीखते हैं। एक संतान है, तो सिर पर चढ़ा रखा है। कही कुछ उल्टा-सीधा हो गया तो सिर उठाने के लायक भी न रहेंगे।’
‘अरे भई, ये तो पुरानी कहावत है। कोई बबूल का बाग लगाकर आम कैसे तोड़ सकता है। ……..’
बहन जी कहे जा रही थीं कि जायसा रिक्सा से उतरी और ‘नमस्ते आंटी’ बोलकर अपने घर में चली गई। बहन जी ने आगे कहना प्रारंभ किया, – ‘देख रही हो, कैसे जवानी फट रही है इसकी! …… ब्रेक नहीं लगने पर गाड़ियों का भी एक्सीडेंट हो जाता है, ये तो लड़की है, लड़की।’
विनिता जी ने कहा, – ‘एकदम माँ पर गई है। ऐसे तो हवा से बात करती है, पर जब देखती है तो मन रखने के लिए हाथ जोड़ती है।’
‘मुझे तो डर है कि इनको देखकर अपनी संतानें न बिगड़ जाएँ।’
बातें सरला रानी की ही होतीं थीं। बातों में प्रशंसा तो कभी नहीं होता, निंदा से लबालब भरी ही बातें होतीं। निन्दा के उस महापुराण में सम्मिलित सभी औरतें कभी-न-कभी किन्हीं अन्य प्रयोजनों से सरला से मिलती हीं। तब सरला रानी के व्यवहार, संस्कार, ज्ञान, गौरव आदि के लिए विलक्षण-विलक्षण विषेशणों का प्रयोग करतीं। सरला रानी शर्म की प्रतिछाया बनकर सिर झुका लेती और अदब से इतना ही कह पाती, – ‘आप बड़ों को ही देखकर सीखा है।’
यह सुनकर उन्हें लगता कि अपनी ही गंदी चप्पल को अपने गाल पर मार लिया हो।
मानव स्वभाव की यह विशेषता है कि वह जो होना चाहता है, वह नहीं होने पर उसकी निंदा करता है। उससे प्रतिस्पर्धा करता है। मानव उसका साथ भी चाहता है और उससे दूर भी दिखना चाहता है। सरला रानी गली की सभी स्त्रियों के लिए साध्य भी थीं, आग्रह भी थीं। सभी स्त्रियाँ उन्हें देखना चाहती थीं। प्रत्यक्ष नहीं, छुपकर ही सही। प्रत्यक्ष व्यावहारिक क्रिया में प्रतिक्रिया बनावटी हो जाती है। वे औरतें अपनी बेटियों को जायसा के रूप में देखना चाहती थीं, मगर उन्हें लड़कों का साथ नापसंद था। लेट नाइट आउटिंग नापसंद थी। पर्सनल पार्टी करना नहीं मान्य था। आदमी अपने लिए अपनी सीमा बना लेता है और उस सीमा में ही आधुनिक वस्त्रों को स्वीकार किया जाता था। घर के बड़े-बुजुर्गों से बिना आदेष लिए बाहर नहीं जाया जा सकता था। बोलने का सलीका हो, या चलने की कला, आधुनिकता की तप्त आँच में ये कोमल भाव मुरझा जाते हैं। कोई बड़े स्कूल में पढ़े या छोटे स्कूल में, आधुनिकता के नाम पर कोई नग्नता नहीं सीखाता। सभी किताबों में लिखे काले अक्षरों को ही पढ़ते हैं। ये सब तो माँ-बाप का दिया हुआ संस्कार होता है, जो बच्चे किसी किताब में नहीं पढ़ते, देखकर सीखते हैं। जब जन्म देने वाले ही कुमार्ग पर चलेंगे तब बच्चे तो अंगुली पकड़कर अनुकरण करेंगे ही। अकेले तो बहुत सारे कीड़े-मकोड़े जी लेते हैं, समाज में रहना सबको नहीं आता। परिवार का ताना-बाना इसलिए बना है कि आदमी संस्कार सीखे, व्यवहार में आदर सीखे। जो सिर्फ पति-पत्नी और अपने बच्चों को ही परिवार समझता है, वह व्यावसायिक जीवन जी सकता है, व्यावहारिक नहीं।
गली की लगभग सभी स्त्रियों का सरला रानी के परिवार के लिए यही विचारधारा थी। कोई जायसा से नहीं बोलता। देखते ही मुँह फेर लिया जाता। वह माँ से कहती तो वे उल्टे उसे ही समझातीं, – ‘तुमने ठीक से नमस्ते नहीं किया होगा। बड़ों को हाथ जोड़कर प्रणाम करना चाहिए। बड़ों का पैर छूने से उनके अंदर की सकारात्मक शक्तियाँ हमें मिलती हैं। अभिवादनशीलस्य…..’
आज भी वही हुआ। जायसा ने अपनी गलती मानी और हाथ जोड़कर माँ को चुप कराया, नहीं तो पता नहीं कितनी सुभाषितानि वाली सूक्तियाँ सुननी पड़तीं।
जाते मई की जलती संध्या में गली की सभी स्त्रियाँ विनिता जी के द्वार पर ही बैठी थीं। हवा थेड़ी नम सी उठी। देखते-देखते आकाश में काले बादलों ने मज़मा जमा लिया। बूँदा-बाँदी शुरू हो गई। कुछ पल बाद सड़क पर पानी पड़ने के कारण मिट्टी से सोंधी गंध उठने लगी। बारिश कुछ तेज होने के मूड में लगी तभी विनिता जी को याद आया कि ऊपर छत पर उनके पति के कपड़े हैं। उन्होंने सूखने के लिए डाला था। भागती गईं। बाकी औरतें मजे ले रही थीं। बहन जी पति के लिए समर्पित विनिता जी की तारीफ कर रही थीं। सीढ़ी गिली हो गई थी। शीघ्रता में सावधानी का ध्यान नहीं रहा। पैर फिसला और वे चैबीस सीढ़ी नीचे आ गईं। कई जगह चोट लगी थी। एक जगह सिर फट गया था। नाक से भी खून बह रहा था। सभी औरतें चीखकर घबड़ाहट में भागने लगीं। जायसा बालकनी में थी। आ रही बारिश की बूँदों से खेल रही थी। शोर सुनकर दौड़ी और माँ को पुकारा।
सरला रानी ने स्वयं ड्राइव कर के विनिता जी को अस्पताल लाया। बाकी सभी औरतें देख रही थीं। जायसा ने किस होशियारी से अपनी सेविका के साथ विनिता जी को गाड़ी में चढ़ाया, वह देखने लायक बुद्धिमत्ता थी।
आज चार दिन से विनिता जी अस्पताल में पड़ी हैं। सरला रानी दिन रात उनके पास रहती हैं। उनकी एक सेविका भी वही रहती है। विनिता जी के पति आॅफिस के काम से बंगलौर गए थे। आज सुबह आये। सुने तो अस्पताल आये। गली की अन्य स्त्रियाँ भी आयी थीं। बहन जी भी थीं। सरला रानी कपड़े बदलने घर गई थीं। घर से अस्पताल कोई बहुत दूर नहीं है। मेट्रो का दूसरा स्टेशन।
पति को सामने देखकर विनिता जी की आँखें छलक आयीं। पति को भी अपनी पत्नी की इस स्थिति में उसके पास न होने का दुख था। बहन जी विनिता जी के पति से कहने लगीं, – ‘हम तो समझते थे कि ये सरला माँ-बेटी आधुनिकता में मानव जीवन को भोगने वाली जीव हैं, पर ये दोनों तो कुछ और निकली।’
‘सच में भाई साहब, ये दोनों नहीं होतीं तो पता नहीं इनका क्या हुआ होता!’
‘हम तो डर गए। अक्ल ने साथ छोड़ दिया था। हम सभी वहाँ से भाग गई थीं।’
सरला रानी आयीं तो सभी चुप हो गए। साथ में जायसा भी थीं। दोनों माँ-बेटी पर्ची में देख-देखकर दवा देने लगीं। जायसा ने विनिता जी को सिर पकड़कर उठाया। विनिता ने उसका हाथ पकड़ लिया। जायसा के कोमल गालों को सहलाते हुए बोलीं, – ‘भगवान सबको ही ऐसा संस्कारवान परिवार दे।’
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– केशव मोहन पाण्डेय

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