सत्य को लकवा नहीं मारा

सत्य को लकवा नहीं मारा
है दलित
दमित
समय के पाषाण-खण्ड से
और उन्मत्त है असत्य
कर रहा अट्टहास
मद में विजय के
घमंड से।
सत्य चाहे कितना भी हो विचलित
गाये असत्य
चाहे कितना भी
स्व-शौर्य गीत
समय आने पर सदा
तूर्य लहराया सत्य के विजय का
गाथा बनता रहा असत्य
महा-हार का
क्षय का।
मानता हूँ
हार जाता हूँ कहीं मैं
सिद्ध नहीं कर पाता
कितना हूँ सही मैं
और कदाचित मौन होता
असत वाचाल से मैं
तिलमिला भी जाता कदाचित
समय के वक्र चाल से मैं
तो भी नहीं है उचित
कि असत्य-पथ वरण कर लूँ
आदमी हूँ
है पता तो
न आदमीयत का क्षरण कर लूँ
हारता हूँ
हार कर मैं
जीत का उद्यम करूँगा
लाख डराये असत्य पर
सत्य है
सत्य है यही
मैं नहीं डरूँगा।
— केशव मोहन पाण्डेय–

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