समय के साथ कदम मिलाती हिंदी

     समाजशास्त्र के अनुसार गतिशीलता से अभिप्राय व्यक्ति का एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुँचने से होता है। जीवविज्ञान में ऊर्जा का प्रयोग करके स्वयं को जगह-से-जगह हिला पाने की क्षमता को गतिशीलता कहते हैं। जब एक स्थान से व्यक्ति दूसरे स्थान को जाता है तो उसे हम साधारणतया आम बोलचाल की भाषा में गतिशील होने की क्रिया मानते हैं। जीवन के रूप में हम जिसे भी जानते हैं, उसमें गति निहित है। गतिशीलता में आकर्षण होता है। सुन्दरता होती है। समृद्धि होती है। आज हिंदी भाषा में भी आकर्षण है, सुन्दरता है औ समृद्धि है। कहते हैं कि समय बड़ा बलवान होता है। जो समय को महत्त्व नहीं देता, समय उसे बिसार देता है। समय के उसी परिणाम के लिए अगर हम विश्व की सभ्यता के विकास पर दृष्टि डालने से ज्ञात होता है कि आज हम जहाँ खड़े हैं, उसके लिए मानव ने तीन सबसे उपयोगी चींजें खोजी। आग, पहिया और भाषा। आग की ऊर्जा ने जहाँ हमें हर परिस्थिति में प्रभावित किया है, वहीं पहिए की गति से मानव-सभ्यता जंगली, बर्बर जीवन से चलकर आज अतिगतिशील समय तक पहुँच गया है। पहिए का ही प्रभाव है कि समय को टक्कर देते हुए, समय से प्रतिस्पर्धा करते हुए हम अपने अतिगतिशील जीवन को और गतिशील बनाने में लगे हैं। बुलेट-ट्रेनों, जेट-विमानों और अंतरिक्ष-यानों को प्रतिदिन नई गति दे रहे हैं। और जहाँ तक भाषा का प्रश्न है, हम तो जानते ही हैं कि अपनी भावनाओं को अभिव्यक्ति देने के लिए मानव वर्षों तक तत्पर रहा। भाषा की खोज से उसकी भावनाएँ और संभावनाएँ, दोनों मुखर हो गईं। भाषा से मानव का अस्तित्व सही अर्थों में सिद्ध होने लगा। उसी भाषाओं के आधार पर भाषा-परिवार का उदय हुआ। उस भाषा-परिवार की दृष्टि से हिंदी को भारोपीय परिवार का माना जाता है। भारोपीय परिवार की सभी भाषाओं में हिंदी सर्वप्रिय और सबसे अधिक प्रयोग होने वाली भाषा है।
    अगर हम देखें तो लगभग चालीस लाख केंद्रीय कर्मचारी हमारे देश में कार्यरत उनमें से अधिकतर कर्मचारियों को अपनी सेवा के दौरान अलग-अलग भाषाई क्षेत्र में जाना पड़ता है। बात करने के लिए कोई कुछ भी कह ले, परन्तु उस दौरान वे कार्मचारी आम तौर पर हिंदी का ही सहारा लेते हैं। आज रोजगार की तलाश में जिस तरह से एक अच्छी-खासी आबादी का पलायन हुआ है, हो रहा है, उस पलायन ने आपसी संवाद में हिंदी को बढ़ाया है। बंगलौर, चेन्नई या गुवाहाटी से दिल्ली, मुंम्बई, चंडीगढ़ या अहमदाबाद में आया हुआ कोई आईटी इंजीनियर या प्रोफेशनल मैंनेजर सिर्फ अंग्रेजी या अपनी क्षेत्रीय भाषा के सहारे अपना काम नहीं चला सकता है। इसके साथ ही अगर उसे हिंदी आती है तो वह अहमदाबाद में गुजराती, चंडीगढ़ में पंजाबी, मुंबई में मराठी, बंगलौर में कन्नड़, चेन्नई में तमिल और कोलकाता में बंगाली जाने बिना भी अपना सामान्य-से-सामान्य काम चला सकता है।
भाषायी जनगणना के समय प्रत्येक नागरिक दावा करता है कि उसकी मातृभाषा अलग है। तब नागरिक बंगाली, मराठी, गुजराती, पंजाबी, सिंधी, असमी, उड़िया, कश्मीरी, उर्दू, मैथिली जैसी किसी भी भाषा को अपनी मातृभाषा बताए और के बाद अपनी भाषा के क्षेत्र से बाहर निकल कर कही नौकरी करता है, तो उस स्थिति में उसकी मातृभाषा काम नहीं आती है। तब उसे समाज से संवाद स्थापित करने के लिए अंग्रेजी या हिंदी का सहारा लेना पड़ता है। वास्तविकता तो यह है कि आज इस मामले में हिंदी अंग्रेजी से कही बहुत आगे है। आज कम-से-कम भारत के परिप्रेक्ष्य में सही मायने में हिंदी ही संपर्क भाषा बन गई है।
आज हिंदी उच्च न्यायालयों से लेकर सचिवालयों तक पहुँच चुकी है। आज सरकारी कामकाज बेखटक रूप से हिंदी में किया जा रहा है। इस बुनियाद पर हम कह सकते हैं कि जल्द ही सर्वोच्च न्यायालय तक भी पहुँच जायेगी। मैं इस आशा और विश्वास के दम पर कह सकता हूँ कि वर्तमान समय में हिंदी सीखना सबकी जरूरत है। आज की हिंदी अभियांत्रिकी, चिकित्सा, प्रबंधन आदि की भी शिक्षा दे रही है। दूरसंचार और सूचना-प्रौद्योगिकी उद्योगों को भी प्रभावित कर रही है। आज हिंदी को एक विषय के रूप में विश्व के करीब 160 विश्वविद्यालयों में पढ़ाया जाता है।
     हिंदी को लेकर सामान्यतः दो तरह की बातें होती हैं। एक तो यह है कि अंग्रेजी के दबाव में हिंदी का क्षरण हो रहा है। स्कूलों में शुरू से ही अंग्रेजी माध्यम में पढ़ाई होती है, जिससे बच्चे हिंदी लिखना-पढ़ना नहीं सीख पा रहे हैं। हिंदी बोलना हीनता का लक्षण माना जाता है और हिंदी बोलने वालों को दोयम दर्जे का व्यवहार मिलता है। दूसरा पक्ष यह है कि हिंदी का विस्तार हो रहा है। मनोरंजन और सूचना माध्यमों में हिंदी की ताकत बढ़ती दिख रही है। मेरे लिए भी महत्त्व की बात यही है कि क्या हो रहा है। प्रसन्नता तो इस बात की है कि हिंदी के विकास का काम हो रहा है। हिंदी में अवसरों की वृद्धि हो रही है। आज हिंदी साहित्य के साथ व्यावसायिक भाषा होती जा रही है। हम-आप अपने घर में बैठे टीवी चैनलों का ही उदाहरण लें तो पता चलता है कि लगभग ग्यारह सौ चैनलों में से अधिकांश हिंदी टीवी चैनल हैं। वे सारे देश में ही नहीं, बल्कि कुछ अन्य देशों में भी छाए हुए हैं। आप सोचिए न कि उन पर जितने कार्यक्रम आते हैं, अधिकांश हिंदी के होते हैं। उन कार्यक्रमों का कथा-पटकथा-संवाद आदि हिंदी में ही होता है और कोई हिंदी वाला ही लिखता है। हमारे टीवी चैनलों पर आने वाले विज्ञापन भी हिंदी में बनाए जाते हैं। भले ही प्रोडक्ट का रेपर अंग्रेजी में हो लेकिन विज्ञापन हिंदी में ही होता है। यही हाल हिंदी सिनेमा का है। आज हिंदी सिनेमा का बाजार अंतर्राष्ट्रीय हो चला है। उसके लिए भी कथा-पटकथा-संवाद आदि हिंदी में ही लिखे जाते हैं।
     आज हिंदी भाषी समाज और विद्वान यह कोशिश कर रहे हैं कि हिंदी की जड़ें भी हर तरह से सुरक्षित रहें। अब बड़ी संजीदगी से सभी प्रयासरत हैं कि हिंदी के प्रचार के उत्साह में ऐसा नहीं होना चाहिए कि हिंदी स्थानीय बोलियों और भाषाओं को खत्म करने का जरिया बन जाए। आज हिंदी को स्थानीय भाषाओं और सांस्कृतिक विभिन्नताओं को सुरक्षित रखने का साधन बनाने पर भी ध्यान दिया जा रहा है। मैला आँचल, टोपी शुक्ला, नीम का पेड़, आधा गाँव, बाबा बटेसर नाथ, उत्तर-कथा आदि अनेक साहित्यिक कृतियाँ आंचलिक साहित्य का उदाहरण हैं। वर्तमान समय में हिंदी की उपयोगिता के संदर्भ में आंचलिकता का प्रभाव हिंदी सिनेमा में भी देखा जा सकता है। ‘लगान’, ‘पी के’, ‘मटरू की बिजली का मंडोला’ आदि आंचलिकता से सराबोर फिल्में भी उदाहरण हैं। हम कह सकते हैं कि हिंदी वास्तविक रूप से किसी एक प्रदेश या क्षेत्र की भाषा नहीं है, वह भारत में संपर्क भाषा की तरह विकसित हुई है और उसने अनेक भाषाओं से शब्द और मुहावरे लिए हैं। जगह-जगह की हिंदी में स्थानीय प्रभाव के कारण उसमें एक अलग तरह का रंग आ जाता है। यही विविधता हिंदी की सबसे बड़ी ताकत है। हिंदी की सामासिकी संस्कृति ने भी हिंदी को गतिशील और समृद्ध बनाया है। हिंदी ने अनेक बोलियों और भाषाओं से शब्दों को लेकर अपना बना लिया है। हिंदी की धारा बहते हुए अपने संपर्क में आने वाले हर भाषा को अपना बना लिया। अपनी गतिशील धारा के कारण ही तो आज लोकप्रिय और प्रतिष्ठित है। मानव मन गतिशील धारा वाली नदी की पूजा करता है, नहीं तो जिस नदी का पानी रूक जाता, उसे कौन पूछता है? मरी धारा का पानी सड़ जाता है। उसकी पूजा नहीं हो सकती।
     आज तेजी से विकसित होती अर्थव्यवस्था, मीडिया के वर्चस्व, वैश्वीकरण एवं उदारीकरण ने हिंदी के विकास में अहम भूमिका निभायी है। आज उदारीकरण ने हिंदी को बाजार की भाषा बनाया, क्योंकि विश्व के पूँजीवादी देशों की व्यावसायिक दृष्टि भारत को एक बड़े बाजार के रूप में देखती है और बाजार में मुनाफे के लिए हिंदी को बाजार की भाषा बनाना मजबूरी है। हिंदी के विस्तार का यही सबसे बड़ा व्यावसायिक कारण है। पिज्जा हो या बर्गर, बेचने के लिए हिंदी विज्ञापन का सहारा लेना ही पड़ता है। हिंदी के विस्तार एवं उसे लोकप्रिय बनाने में मीडिया तथा हिंदी फिल्मों का बहुत बड़ा हाथ है। विदेशी चैनलों को बहुत जल्दी यह आभास हो गया कि भारत में टेलीविजन पर केवल अंग्रेजी कार्यक्रम दिखाकर वे लाभ नहीं कमा सकते। फटाफट स्टार, जी टीवी सभी में हिंदी धारावाहिक तथा हिंदी समाचार बुलेटिन प्रस्तुत करने की होड़ लग गई। विदेशी फिल्में चाहे वे हॉलीवुड की अंग्रेजी फिल्में हों या जर्मन, फ्रैंच इत्यादि भाषा में निर्मित फिल्में, सभी हिंदी में डब होकर प्रस्तुत की जा रही हैं। सभी प्रकार के टी.वी. कार्यक्रमों में हिंदी का बोलबाला है अर्थात् टीआरपी बढ़ानी हो तो हिंदी धारावाहिक बनाने होंगे। एफ.एम. रेडियो ने खूब धूम मचायी। मीडिया तथा फिल्मों ने हिंदी भाषा के महत्त्व को बढ़ाया है।
    आज हमारी हिंदी का मुख्य लक्ष्य साहित्य की समृद्धि के साथ ही जीविकोपार्जन के विविध क्षेत्रों में प्रयुक्त होने वाले भाषा-रूपों को प्रस्तुत करना है। वर्तमान समय में हमारी हिंदी केवल सामान्य बोलचाल तथा साहित्य तक ही सीमित न रहकर प्रशासन, न्याय, पत्रकारिता, वाणिज्य, बैंक, विज्ञापन, आदि विभिन्न क्षेत्रों में भी प्रयुक्त हो रही है। आज क्रिकेट मैच की कमेंट्री भी धड़ल्ले से हिंदी में किया जा रहा है। आज हमारे नेता-राजनेता बड़े गर्व से विदेशी राजनयिकों के सामने हिंदी में अपना विचार व्यक्त करते हैं। आज संसद से लेकर सड़क तक हिंदी में कामकाज को बढ़ावा दिया जा रहा है। आज व्यापारी, पत्रकार, डॉक्टर, वकील, प्रशासक, वैज्ञानिक, इंजीनियर आदि विभिन्न व्यवसायों से संबंधित व्यक्ति अपने प्रयोजन के लिए हिंदी का भाषा आदरपूर्वक करते नजर आते हैं। आज हिंदी का उपयोग जीविकोपार्जन से सम्बद्ध विभिन्न क्षेत्रों में किया जा रहा है।
   आधुनिक युग में सबकुछ आधुनिक होने को आतुर है। उस आधुनिक होने की प्रतिस्पर्धा में हमारी हिंदी बदल रही है। बोलचाल की भाषा बदल रही है। औपचारिक-अनौपचारिक भाषा बदल रही है। संवाद स्थापित करने वाली भाषा बदल रही है। जनसंचार माध्यमों की भाषा बदल रही है। उदाहरण के लिए देखें कि हिन्दी पट्टी में मराठी, पंजाबी, अंग्रेजी के मिश्रित शब्द प्रयोग होते हैं। पंजाब राज्य की हिन्दी पत्र-पत्रिकाओं में हिन्दी के साथ पंजाबी, एनसीआर के इलाके में हिन्दी के साथ अंग्रेजी और मुंबई और आस-पास के इलाके में मराठी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं की शब्दाबली का प्रयोग आमतौर पर देवनागरी लिपि में हो रहा है। उपर्युक्त सभी उदाहरण समय के साथ हिंदी की गतिशीलता और प्रासंगिकता को ही सिद्ध कर रहे हैं। सभी उदाहरण सिद्ध कर रहे है कि आज हमारी हिंदी समय के साथ बदल गई है।
    जनसंचार माध्यमों में हिंदी ने एक ओर हिंदी को न जाने कितने व्यापक भू-भाग तक फैलाया है तो दूसरी ओर हिंदी भाषा की संरचना और प्रयुक्ति में कई करवटें उपस्थित की हैं। संचार-माध्यमों की हिंदी न तो सामान्य बोलचाल की हिंदी है और न सृजनात्मक स्तर पर उपयोग में आने वाली काव्य-भाषा है। वह निजी और सार्वजनिक उपक्रमों में प्रयुक्त होने वाली शुष्क राजभाषा भी नहीं है। संचार माध्यमों की हिंदी अपने माध्यम विशेष के प्रति ईमानदार भाषा है। यही कारण है कि जनसंचार के विभिन्न माध्यमों में भाषा का प्रयोग करते समय प्रयोग करने वाले को इस बात का ध्यान रखना होता है कि उसे किस माध्यम के लिए प्रयोग करना है। निश्चय ही रेडियो की हिंदी और पत्रकारिता की हिंदी में अंतर है। विज्ञापन की हिंदी और सोशल नेटवर्किंग की हिंदी में अंतर है। सड़कों पर नजर आने वाले पोस्टरों के विज्ञापन और सिनेमा की हिंदी में अंतर है। कम्प्यूटर, टेबलेट और माईक्रोचिप्स के इस दौर में जनसंचार-माध्यमों की भाषा के रूप में हिंदी ने अपने बहुआयामी ताकत को विभिन्न-स्तरों पर इंगित किया है। यही कारण है कि भाषिक मौलिकता और प्रयुक्ति के स्तर पर जनसंचार माध्यमों में हिंदी की असीम संभावनाएँ बढ़ती जा रही हैं। आज विभिन्न प्रयोजनों और विभिन्न माध्यमों से हिंदी विश्वभर में छायी हुई है। आज माॅरीशस, फिजी, सूरीनाम, युगांडा, नेपाल, भूटान के अतिरिक्त अमेरिका, आस्ट्रेलिया, जापान, इज़रायल, चीन, पाकिस्तान, लंदन, कनाडा आदि में हिंदी से संबंधित अनेक सरकारी-गैरसरकारी संस्थाएँ काम कर रही है। हिंदी के बदले स्वरूप का ही परिणाम है कि आज अमेरिका की सरकारी बेवसाइट को हिंदी में भी विकसित किया गया है। एशिया सोसाइटी, नमस्ते अमेरिका हिंदी, हिंदी इन आस्ट्रेलिया, स्वतंत्र हिंदी लेखक मंच – कनाडा, हिंदी साहित्य परिषद कनाडा, चाइना रेडियो इंटरनेशनल हिंदी, पेरो हिंदी ट्रायडोर, इजरायल हिंदी में है। अगस्त, 2015 में पाकिस्तान से भी हिंदी के वैश्विक धमक की खबर तब मिली जब वहाँ के इतिहास में पहली बार नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ मॉर्डन लैंग्वेजेज ने शाहीन जफर नाम की एक महिला को एम. फिल. की उपाधि दी गई। यह हिंदी के बदले हुए स्वरूप का ही परिणाम है।  इतना ही नहीं, आज देश के लगभग सभी आई.आई.टी. और आई.आई.टी.एम. संस्थानों द्वारा भी हिंदी के प्रति सक्रियता इसके बदले हुए स्वरूप का ही प्रमाण है। हिंदी समिति आई.आई.टी. दिल्ली, राजभाषा समिति एन.आई.टी. सूरत आदि से स्पष्ट हो जाता है कि अभियांत्रिकी और प्रबंधन संस्थान भी हिंदी से दूर नहीं हैं। अभी दिसम्बर, 2015 में अटल बिहारी वाजपेयी हिंदी विश्वविद्यालय, भोपाल में वार्षिकोत्सव के अवसर पर हिंदी माध्यम से चिकित्सकीय शिक्षा देने पर भी जोर दिया जाना हिंदी के बदले हुए स्वरूप का ही परिणाम है। आज की हिन्दी बिहार की बोलियों, हरियाणवी तथा पंजाबी से ऊपर उठकर न केवल गुजराती, मराठी, बंगाली, उड़िया, तमिल, तेलगू आदि भाषाओं के संपर्क में आई है बल्कि इसकी पहुँच पूर्वोत्तर राज्यों की भाषाओं तक हो गई है। राष्ट्रीय स्वरुप में देखा जाए तो आज हिन्दी अपने दक्खिनी हिन्दी, हैदराबादी हिन्दी, अरुणाचली हिन्दी आदि में फैल गई है।
    आज की हिन्दी केवल साहित्य की भाषा नहीं रही। आज बदलती परिस्थितियों के कारण हिंदी में परिवर्तन आया है। आज विज्ञान-प्रौद्योगिकी से लेकर तमाम विषयों पर हिन्दी की किताबें उपलब्ध हैं। क्षेत्रीय अखबारों का प्रचलन बढ़ा है। इण्टरनेट पर हिन्दी की बेबसाइट में बढ़ोत्तरी हो रही है। सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र की कई कम्पनियों ने हिन्दी भाषा में परियोजनाएँ आरम्भ की हैं। सूचना क्रांति के दौर में कम्प्यूटर पर हिन्दी में कार्य करने की संस्कृति को बढ़ावा मिला है। सूचना एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय के प्रतिष्ठान सी-डैक ने निःशुल्क हिन्दी साफ्टवेयर जारी किया है, जिसमें अनेक सुविधाएँ उपलब्ध हैं। माइक्रोसाफ्ट ने ऑफिस हिन्दी के द्वारा भारतीयों के लिए कम्प्यूटर का प्रयोग आसान कर दिया है। आई० बी० एम० द्वारा विकसित सॉफ्टवेयर में हिन्दी भाषा के 65000 शब्दों को पहचानने की क्षमता है एवं हिन्दी और हिन्दुस्तानी अंग्रेजी के लिए आवाज़ पहचानने की प्रणाली का भी विकास किया गया है जो कि शब्दों को पहचान कर कम्प्यूटर लिपिबद्ध कर देती है। एच० पी० कम्प्यूटर्स एक ऐसी तकनीक का विकास करने में जुटी हुई है जो हाथ से लिखी हिन्दी लिखावट को पहचान कर कम्प्यूटर में आगे की कार्यवाही कर सके। आज हिन्दी के वेब पोर्टल समाचार, व्यापार, साहित्य, ज्योतिषी, सूचना प्रौद्योगिक एवं तमाम जानकारियाँ सुलभ करा रहे हैं। विश्व स्तर पर हिंदी के बदले हुए स्वरूप को बाजार और संचार माध्यम से देखा जा सकता है।
    आज हिंदी में अवसरों का भी सृजन हो रहा है। आज प्रत्येक विभाग में एक से अधिक हिंदी अधिकारी का पद होता है। सभी सरकारी-गैरसरकारी विभागों में भाषा अधिकारी, भाषा-वैज्ञानिक का पद है। आज प्रत्येक बैंक से लेकर अब अर्धसरकारी क्षेत्रों के साथ ही बहुराष्ट्रीय कंपनियों में भी उक्त पदों को सृजित किया गया है। अध्यापन से लेकर प्रशासन तक में, अनुवादक से लेकर प्रशिक्षक तक, हिंदी की योग्यता आवश्यक समझी जा रही है। अब लगभग प्रत्येक प्रतियोगी परीक्षाओं में हिंदी के प्रश्नों को सम्मिलित किया जा रहा है। अब हमारी हिंदी भी पूर्णरूपेण अर्थोन्मुखी हो रही है। निसंदेह वर्तमान समय में हिन्दी भाषा को एक नवीन प्रतिष्ठा मिली है। इसके बाद भी एक वर्ग मानता है कि अपने बदले हुए स्वरूप में हिंदी की दशा और ही खराब हो गई है। उनका मानना है कि हिंदी के साथ बाज़ार, तकनीक और हमारे आदि से हिंदी की भाषा खराब हुई है। उनका मानता है कि हमारे साहित्यकारों के व्यवहार से, नई तकनीक के व्यवहारों से वर्तमान युग में हिंदी और आहत हो रही है। उनका मानना है कि शिक्षा के व्यवसायिकरण के कारण हिंदी पर न शिक्षाविद् जोर दे रहे हैं और न ही छात्रों में रूचि पैदा हो रही है। एक वर्ग यह भी मानता है कि वैज्ञानिक और तकनीकि शब्दों ने हिंदी को और बोझिल कर दिया है। सम्मेलन कर के हिंदी के प्रति चिंता जतायी जाती है।
    सच्चाई तो यह है कि किसी भी व्यक्ति के ज्ञान को पूर्ण विकसित करने के लिए शिक्षा तभी सबसे अधिक कारगर हो सकती है, जब उसकी अपनी मातृभाषा में दी जाए। सच्चाई यह भी है कि व्यक्तित्व को कारगर बनाने के लिए मातृभाषा के साथ एक वैश्विक संपर्क की भाषा सिखनी चाहिए। हमें भी अपने स्तर पर हिंदी के विकास का काम करना चाहिए। अगर सरकारी काम-काज में जब तक बाध्यता न हो तब तक हिंदी का ही उपयोग करना चाहिए। आज हिंदी हमारी मातृभाषा होने के साथ-साथ कार्यालयीय भाषा भी है। हिंदी का उपयोग हमारे लिए सुविधाजनक भी है। हिंदी हमारी भारतीयता की पहचान होने के साथ ही हमारा स्वाभिमान भी है। अपने बदले स्वरूप के साथ हिंदी आज भले ही विश्व-पटल पर अपनी पहचान बना चुकी है, भले ही हमारे देश के प्रधानमंत्री महाशक्तियों के मंच से सीना ठोककर हिंदी में अपनी बातें रख रहे हैं, परन्तु आज भी हर एक नागरिक को हिंदी के उत्थान के लिए प्रयास करना चाहिए। हिंदी को हमेशा राजनीति से अलग रखकर जनसमुदाय से जोड़ने का प्रयास करना चाहिए। व्याकरण के कठिन नियमों में लचीलापन लाना चाहिए। हिंदी के कठिन शुद्ध साहित्यिक तत्सम शब्दों के स्थान पर दूसरी भाषाओं के लोकप्रचलित शब्दों को उपयोग करने की छूट दी जानी चाहिए। दूसरी भाषाओं से आए लोकप्रिय शब्दों के साथ भेदभाव के स्थान पर सहजता से प्रयोग में रखना चाहिए। इंटरनेट व मोबाइल पर हिंदी के उपयोग को और सरल बनाया जाना चाहिए। कंप्यूटर पर सरल व तेज टाइपिंग के लिए जरूरी साॅफ्टवेयर विकसित किया जाना चाहिए। साहित्य का सृजन केवल कथा, कविता साहित्य तक ही नहीं रखना चाहिए। साहित्य-सृजन में अत्याधुनिक मुद्दों को भी सम्मिलित किया जाना चाहिए। तब निश्चय ही हिंदी के बदले स्वरूप की सार्थकता सिद्ध होगी।
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– केशव मोहन पाण्डेय

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