सांसो बा हमार उधार

सांसो बा हमार उधार के कुछो बचल बा का
खुलल आँखे लूटा गइनी शोर मचल बा का

एक साँझ में हम रईस से फकीर हो गइनी
कुछ रद्दी रहे बाचल तबो जेब कटल बा का

जिन्नगी के किताब के पन्ना उ पलट देहलें
लोग ताकता की पनन्वा बीचे फटल बा का

उहे साज कहीं दूर से बाज रहल बा शायद
जवन गीत रहे उ भइल आज गजल बा का

कुछ ठंडा बयार देख बस चलल आईनी हम
महक रहे जे बिसराइल उ इंहा बसल बा का

आगे बढ़े के जब भइनी त सोचत रह गइनी
एगो अउर नश्तर दिल में कहीं हलल बा का

 

© श्री दामोदराचारी मिश्रा
सिवान में जन्म, बीएचयू से स्नातक, परास्नातक (इतिहास),
साहित्य, सिनेमा, अनुवाद और लोक संस्कृति में अभिरुचि।
विदेशी रचनाकारन के कविता के भोजपुरी अनुवाद में विशेष रुचि।

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