सागर

सागर
रखता है
असीमित नीर
फिर भी
देखकर
चाँद को
हो जाता अधीर
उछलता भी है
मचलता भी है
कई बार
मानव चित्त सा
बडवाग्नि में
जलता भी है
मगर अपनी सीमा में
सिमट जाता है
कहाँ कभी
बँट जाता है?
जब कभी
तोड़ता है सीमा
सुनामी-सा
किसी रूप में
तब नहीं बच पाती
उसकी गरिमा भी तो।
——–

– केशव मोहन पाण्डेय

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