‘साहित्य साधना है,व्यसन नहीं’

सजग चेतना वालों में सिसृक्षा का बीज बोने का निरंतर काम करने वाले साहित्यकार श्री आर. डी. एन. श्रीवास्तव अर्थात रूद्र देव नारायण श्रीवास्तव का जन्म 10 दिसंबर 1939 को ग्राम बैरिया, नन्दा छपरा, रामकोला, जनपद कुशीनगर (उत्तर-प्रदेश) में हुआ। उन्होंने अंग्रेजी साहित्य में एम. ए. किया परन्तु रचनाएँ हिंदी में करने लगे। उन्होंने लोकमान्य इंटर कालेज, सेवरही कुशीनगर (उत्तर-प्रदेश) से प्रधानाचार्य पद से अवकाश लिया है। उनकी रचनाओं की धार बहुत ही तीक्ष्ण होती हैं। वे अपने अंदाज़ में ग़ज़ल लिखते हैं, अपने अंदाज़ में पढ़ते हैं। उनकी कविताएँ हास्य और व्यंग्य की पिटारा हैं। ‘वक्त की परछाइयाँ’, ‘ये ग़ज़ल’, ‘कविता समय’, ‘शब्द कुंभ’, ‘सितारे धरती के’, ‘मोती मानसरोवर के’, ‘नव ग़ज़लपुर’ के अतिरिक्त ‘थाल में बाल’ (2010), दिल भी है, दीवार भी है’ (2014) प्रकाशित कृतियों में उनकी विचारधाराओं को, मानदंडों को और जीवन-मूल्यों को निरखा जा सकता है। समय-समय पर अन्य पत्र-पत्रिकाओं के अतिरिक्त आकाशवाणी एवं दूरदर्शन से हमेशा प्रसारित होते रहने वाले श्री श्रीवास्तव वर्तमान समय में गोरखपुर में रहते हुए आज भी अनेक साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े रहते हैं।
श्री आर. डी. एन. श्रीवास्तव की ग़ज़लें जहाँ अपने मतला, रदीफ़ और काफि़या की बुनावट के लिए समीक्षकों को आकर्षित कर लेती हैं, वहीं अपने विषय-शिल्प, शब्द-संयोजन और चित्र-प्रस्तुति के कारण पाठकों और श्रोताओं को अपना बना लेती हैं और उनका हो जाती हैं। वे जितने ही सुलझे व्यक्ति हैं उतने ही एक लोकप्रिय प्रधानाचार्य भी रह चुके हैं। उनकी सोच विलक्षण और भावात्मक होने के साथ-साथ सामाजिक प्रतिबिंब को प्रदर्शित करती हैं। ‘कुत्ता और कर्फ्यू’ का कुत्ता किसी रईस के घर का दुलारा टाॅमी या चीकी, पीकी नहीं है, वह सर्वहारा वर्ग का प्रतिनिधित्व करता हुआ अपने शोषण के विरूद्ध आवाज बुलंद करता है। आज का कुत्ता केवल दुम हिलाता अनुकरण और स्नेह-प्रदर्शन नहीं कर रहा है, वह चीख-चीखकर चिल्लाता है और सामने वाले की मानसिकता को ललकारता भी है।
कलमकार की सार्थकता सामाजिक सोच की दृष्टि पर ही निर्भर करती है। कलमकार समाज को अपनी ही दृष्टि से देखता है और समाज के सामने उसी का चित्रांकन करता है। श्री आर. डी. एन. श्रीवास्तव अपने समाज के नव-रचनाकारों को पहचानते भी है, तैयार भी करते हैं और आगे बढ़ाने का कार्य भी करते हैं। उनकी ग़ज़लें जितना चमत्कृत करती हैं, उनके व्यंग्य उससे अधिक अवाक्। उनके व्यंग्य समाज के दर्पण तो हैं ही, यथार्थ का चित्रण भी है। सीधे शब्दों की मारक क्षमता बड़ी तीखी होती है। सहज शब्दों का ऐसा चमत्कार देखना हो तो उनकी किसी भी कविता को देखा जा सकता हैं। –
‘वह आदमी पूर्णतया ईमानदार है।
एकदम खरा सोना है
बिलकुल बेकार है।’
सौभाग्य से मुझे दो दिनों तक उनका सानिध्य मिला। मैं उन क्षणों का पूर्णतः सुख लेना चाहता था। आज्ञा मिली तो साहित्य के विविध मुद्दों पर उनका विचार जानना चाहा। प्रस्तुत है उनसे लिया गया मेरा साक्षात्कार –
प्रश्न – सर, आप मूलतः अ्रगेजी विषय के प्राध्यापक रहे हैं। अंग्रेजी विषय के साथ ही आपको हिंदी में रचना के प्रति रूचि और साधना की प्रेरणा कब, किससे और कैसे मिली?
उत्तर – प्रिय केशव मोहन जी, अंग्रेजी के प्रति छात्र जीवन से ही मेरा स्वाभाविक रूझान रहा। और हिंदी तो अपनी मातृभाषा ही है। मैं सन 1951-53 में हाई स्कूल का छात्र था। तब विज्ञान विषय प्रारंभिक अवस्था में था। विज्ञान पढ़ने वाले छात्र स्वयं को शेष छात्रों से श्रेष्ठ मानते तथा शेष छात्र उनको अछूत। कला-साहित्य का बोलबाला था। अंताक्षरी स्वस्थ मनोरंजन का साधन था। आगे चलकर जो ‘क्रेज़’ क्रिकेट का बना, वही उन दिनों अन्ताक्षरी का था। विद्यालयों में अंतरजनपदीय प्रतियोगिताएँ भी होती थीं। गीत, कविताएँ, दोहे, चैपाइयाँ, कुण्डलिया आदि रटना, याद करना अनिवार्य सा था। सिनेमा के गीत चोरी-चोरी गाये जाते थे। मुझे भी काफी कविताएँ कंठस्थ हो गई थीं। इंटर व बी.ए. कक्षाओं में शेरो-शायरी से भी परिचय हो गया। उनको भी जमकर पढ़ा। ज़ाहिर है प्याला भरेगा तो छलकेगा ही।
प्रश्न – आपकी कविताओं का दो अलग रूप देखा जाता है। एक व्यंग्य और दूसरा ग़ज़ल। इस समन्वय को कुछ स्पष्ट कीजिए।
उत्तर – सही है, मैं हास्य-व्यंग्य की कविताएँ भी करता हूँ और ग़ज़लें भी करता हूँ। व्यंग्य का प्रवेश तो हर जगह है क्योंकि समाज में अन्याय और असमानता कहाँ नहीं है। क्रौंच-बध के कारूणिक दृश्य ने ही आदि कवि के क्रोध को कविता का रुप दिया। यदि वाल्मीकी जी ने क्रोध में आकर शिकारी की हत्या कर दी होती तो क्रौच-बध अथवा वाल्मीकी को कोई नहीं जानता। यह व्यंग्य ही है जो कलमकार को कलम और चित्रकार को तूलिका उठाने की अभिप्रेरणा देता है। कविता, नाटक, निबंध, उपन्यास, कहानी – व्यंग्य की पहुँच कहाँ नहीं है। कविताएँ स्कूली दिनों में लिखता था। ग़ज़ल पढ़ते रहने के साथ-साथ ग़ज़ल लिखने का कार्य स्वतः शुरू हो गया।
प्रश्न – सर आपकी कविता का विषय कुछ भी हो, परन्तु उसकी गति बहुत तीक्ष्ण होती है। अपने अनुभवों से पाठकों को भी परिचित कराइए।
उत्तर – आपने कहा कि मेरी कविता की गति बहुत तीक्ष्ण होती है। जब कोई बात मन को छू जाती है, कोई अन्याय भीतर से झकझोर देता है तो उसकी सहज प्रतिक्रिया होती है। बात निकल जाती है। विचार करता हूँ तो लगता है इसके लिए मुझे ‘सेक्सपीयर’ या ‘जाॅन ड्राइडन’ का ऋणि होना चाहिए। कभी-कभी लगता है कि यह तीक्ष्णता स्वाभाविक है, क्योंकि मित्रगण मूलतः व्यंग्यकार के रूप में ही मेरा परिचय देते हैं। जो अनुचित है उसका विरोध निर्मम होकर करना चाहिए।
प्रश्न – सर, लगभग आठ पुस्तकों में सहप्रकाशन के साथ-साथ आप आकाशवाणी से अनवरत प्रसारित और पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहे, परन्तु आपकी पहली स्वतंत्र पुस्तक ‘थाल में बाल’ 2010 में आयी। स्वचंत्र पुस्तक आने में इतने बिलंब का कोई विशेष कारण?
उत्तर – स्वतंत्र पुस्तक के देरी से आने के पीछे क्या सफाई दूँ। सब मेरे आलस्य का परिणाम है। यह सही है कि जीवन भर पारिवारिक जिम्मेदारियों से दबा रहा, फिर भी रचनाओं को समय से लिखकर उनको संभल तो सकता ही था। ‘एडिसन’ ने कहा है कि युद्ध की अपेक्षा आलस्य ने राष्ट्रों को अधिक क्षति पहुँचाई है। ये प्रकाशन भी यूँ ही नहीं आये हैं। मित्रों ने क्या नहीं कहा? केवल मारा-पीटा नहीं। आज इन संग्रहों को देखकर मित्रों के प्रति आँखें कृतज्ञता से नम हो जाती हैं। दिनकर जी ने सच ही कहा है, –
‘मित्रता बड़ा अनमोल रतन
कब उसे तौल सकता है धन’
प्रश्न – आने वाले समय में कौन-सी कृति हमें पढ़ने को मिलेगी? उसकी विधा और विशय-वस्तु पर प्रकाश डालिए।
उत्तर – ‘थाल में बाल’ के बाद ‘दिल भी है, दीवार भी है’ ग़ज़ल-संग्रह अगस्त में आया है। फिर एक दोहा संग्रह। साथ में हाइकु कविताओं का संग्रह निकालने की चेष्टा होगी। धार तो व्यंग्य की ही रहेगी।
प्रश्न – सर, देखा जाता है कि आज का साहित्यकार कहीं न कहीं राजनीति से प्रेरित होता रहा है। साहित्य के राजनीतिकरण पर आपका क्या दृष्टिकोण है?
उत्तर – राजनीति को मौकापरस्त, कुटिल लोगों ने बदनाम कर दिया है। यहाँ तक की उसकी परिभाषा ही बदल डाली है। राजनीति और धर्म एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। धर्म कहता है सत्य पर चलो। राजनीति कहती है असत्य से जूझो। फिर तो राजनीति धर्म का सक्रिय रूप है। सामाजिक मूल्यों की स्थापना के लिए निरंतर होने रहने वाले संर्घष का नाम धर्म है तथा उसी प्रयोजन हेतु काल विशेष में होने वाले संघर्ष का नाम राजनीति है। जब राजनीति के वर्तमान स्वरूप राजनीति में ही नहीं होना चाहिए तो साहित्य में उसके होने का क्या औचित्य है? मेरे विचार से युग-पुरुष दो प्रकार के होते हैं, – एक तो वे जो निधन के बाद भी युगों-युगों तक याद किए जाते हैं। दूसरे वे जो केवल अपने युग के पुरुष होकर समस्त भोगों का रस लेते हैं और निधन के बाद अतीत के अंधकार में विलीन हो जाते हैं। राजनीति करने वाले साहित्यकार न तो अपना भला करते हैं और न तो साहित्य का ही।
प्रश्न – यह कहा जाता है कि साहित्यकारों, विषेशकर मंचीय कवियों में बहुत ही गुटबंदी देखी जाती है। आप अपने आप को कहाँ पाते हैं?
उत्तर – जो गुटबंद है, वह साहित्यकार नहीं है। वह तो साहित्य के ‘कार’ पर सवार सुविधाभोगी लिखने वाला है। जहाँ तक मेरा प्रश्न है, मुझको मेरे इस शेर से देख लें, –
‘न समीकरण मैं बना सका, न अदावतें ही निभा सका
मैंने खुद को देखा हर एक में, मुझे ग़म नहीं कि सिफ़र में हूँ।’
प्रश्न – साहित्य को समाज का दर्पण कहा जाता है। आज का कवि वातानुकूलित कमरों में बैठकर ग्रामीण जीवन का चित्र खींचने लगता है। इस पर आप क्या कहेंगे?
उत्तर – साहित्य को समाज का दर्पण कहा जाता है। अरे यार, साहित्य समाज का दर्पण है। कहा जाता क्या होता है? स्वस्थ साहित्य लिखने के लिए संवेदना सहित अन्तर्दृष्टि चाहिए। अब लिखने वाला चाहे वातानुकूलित कक्ष में हो या छोटी सी कोठरी में। न्यायप्रियता और ईमानदारी आवश्यक है।
प्रश्न – आज का कवि बड़ी संख्या में सोसल-साइट्स पर आने लगा है। वहाँ प्रकाशित भी होने लगा है। बहुत सार्थक टिप्पणियाँ भी पाता है। काव्यत्व के इस बदलाव पर आपकी क्या प्रतिक्रिया है?
उत्तर – आज ‘इलेक्ट्राॅनिक मीडिया’ के युग में जब वे सारी चीजें व्यापक प्रचार-प्रसार पा रही हैं, जिनको कमरे के बाहर कत्तई नहीं आना चाहिए तो साहित्यकार का प्रचार-प्रसार स्वाभाविक भी है और उचित भी। वैसे रचना ही उसी यशस्वी बनाएगी, प्रचार-प्रसार नहीं।
प्रश्न – सर, आपके विचार से आज की कविता का भविष्य क्या है?
उत्तर – कविता का भविष्य तो सदैव से उज्ज्वल रहा है और रहेगा भी। जब तक मानव रूपी जीव के सीने में हृदय रूपी विध्वंसकारी यंत्र रहेगा, कविता होती रहेगी। अब तो ज़ेहन के भी उसके साथ रहने की बात होती है। अपना ही एक मतला पेश है, –
‘बात खुश्बू है तो फिर उसको बिखरनी चाहिए
दिल में उतरे तो ज़ेहन में भी उतरनी चाहिए।’
इसके आगे की सोच तो यह कहती है कि जो ज़ेहन में उतर रहा है उसे दिल में भी उतरना होगा। तभी मानव समान और मानवीय मूल्य क़ायम रह पायेंगे।
प्रश्न – आपके विचार से आज की कविता पर किस विचार धारा का प्रभाव है?
उत्तर – एक शब्द है ‘मार्क्सवाद’ जो भावना के स्वरूप् में कार्ल मार्क्स के पूर्व भी था आज भी है और आगे भी रहेगा। सामान्य व्यक्ति के द्वारा व्यवस्था की बुराइयों का खुल कर विरोध कब नहीं हुआ है। कवि सदा से क्रांतिकारी और व्यवस्था विरोधी रहा है। आज के विप्र समाज को गोस्वामी तुलसीदास पर नाज़ है, वैसे तुलसी पर नाज़ किसे नहीं होना चाहिए, वही समाज उनके जीवन-काल मेें तुलसीदास का सबसे बड़ा शत्रु था। आज आदमी को खुलकर जूझने का शऊर तो कार्लमार्क्स ने ही दिया। कहा जाता है कि जो जवानी में कम्यूनिष्ट नहीं है, वह जवान ही नहीं है और जो बुढ़ापे में भी इसे पाले है, तो उसे क्या कहेंगे? …….. मूर्ख?? पूँजीवाद अपने साजि़स में काफी हद तक सफल होता दिख रहा है। नौजवान ‘पैकेज’ का लोभ संवरण नहीं कर पा रहे हैं। जज़्बातों की ऐसी हत्या? अब आप भले ही मार्क्सवादी न हो, फिर यदि आप आदमी हैं तो विरोध का स्वर मुखर होना चाहिए।
प्रश्न – आज के लेखकों और साहित्य-प्रेमियों के लिए आपका कोई संदेश?
उत्तर – मेरी तो यही सलाह है कि आज के लेखक खुब पढ़ने की आदत डालें। शीघ्रातिशीघ्र छपने और मशहूर होने की बीमारी से बचें। साहित्य साधना है, व्यसन नहीं। न तो धंधा है।
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– केशव मोहन पाण्डेय

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