स्मृतियाँ

कई बार मैंने
अपनी कोमल अंगुलियों से पकड़कर
खींची थी
उनकी मूँछें,
नन्हीं दँतुलियों से
काटी थी
नाक उनकी,
दोनों पैरों पर बैठ कर
खेला था ‘घुघुआ-माना’
पेट को मुलायम गलीचा समझ
कई बार कूदा था,
कानों को पकड़
कई बार नाखून धसाया,
कई बार करता रहा सबकुछ
फिर भी वे
बाज़ार से लाते रहे
‘टाॅफी’ और ‘मिठाइयाँ’
उठाते रहे गोद में
खिलाते रहे साथ में
सुलाते रहे पास में,
और एक दिन
अकेले ही
बिना बताए चले गए
पता नहीं कहाँ?
अब मैं जानता हूँ
नहीं आएँगे वहाँ से,
परन्तु आँखें नहीं मानतीं
ताकतीं हैं रास्ता,
लेकिन आज भी मेरे पिता जी
शेष हैं मेरी स्मृतियों में।
———
– केशव मोहन पाण्डेय

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *